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फाइनल ईयर की परीक्षा पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर, कहा- इसके बिना छात्रों को पास नहीं किया जा सकता

सर्वोच्च न्यायालय में आदित्य ठाकरे समेत अन्य कई लोगों ने इस मुद्दे पर याचिका दायर की थी। याचिका में उनका कहना था कि कोरोना वायरस महामारी को देखते हुए परीक्षाएँ रद्द कर दी जाएँ। महाराष्ट्र, ओडिशा, दिल्ली और पश्चिम बंगाल समेत कुछ केंद्र शासित प्रदेशों ने भी इसका समर्थन किया था।

देश में कोरोना वायरस की वजह से विश्वविद्यालय और कॉलेज में पढ़ने वाले छात्रों की परीक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुना दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में कहा कि अंतिम वर्ष और अंतिम सेमेस्टर के छात्रों की परीक्षा होगी। न्यायालय ने यह भी कहा अगर किसी राज्य को ऐसा लगता है कि वह परीक्षाएँ नहीं करवा सकते हैं तो वह इस संबंध में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) से संपर्क कर सकते हैं। लेकिन कोई भी राज्य बिना परिक्षा लिए अंतिम वर्ष के छात्रों को प्रमोट नहीं कर सकते हैं।   

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायाधीश अशोक मूर्ति, न्यायाधीश आर सुभाष रेड्डी और न्यायाधीश ने एम आर शाह की खण्डपीठ ने इस मुद्दे पर फैसला सुनाया। पीठ ने अपने निर्णय में कहा चाहे राज्य हों या केंद्र शासित प्रदेश उनके पास छात्रों को बिना परीक्षा लिए आगे बढ़ाने का अधिकार नहीं है। खंडपीठ ने कहा कि यूजीसी के दिशा-निर्देशों को ख़त्म करने का निवेदन अस्वीकार कर दिया गया है। किसी भी राज्य में परीक्षाओं को रद्द करने के मामले में आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के आदेश यूजीसी से ऊपर होंगे।    

लेकिन आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के पास छात्रों को परीक्षा में पास करने का अधिकार नहीं है। इसके बाद खंडपीठ ने कहा कि अगर किसी राज्य में महामारी के विपरीत हालातों के चलते परीक्षा संभव नहीं है तो वहाँ की राज्य सरकार यूजीसी से निवेदन कर सकती है कि परीक्षाओं का समय बढ़ा दिया जाए। न्यायालय का बेहद स्पष्ट तौर पर कहना है कि परीक्षाओं की तिथियों में बदलाव हो सकता है, लेकिन परीक्षाएँ टाली नहीं जा सकती हैं।  

सर्वोच्च न्यायालय में आदित्य ठाकरे समेत अन्य कई लोगों ने इस मुद्दे पर याचिका दायर की थी। याचिका में उनका कहना था कि कोरोना वायरस महामारी को देखते हुए परीक्षाएँ रद्द कर दी जाएँ। याचिका में दलील दी गई थी कि कॉलेज और विश्वविद्यालय बंद होने की वजह से पढ़ने वाले छात्रों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। उनका कहना था जिन छात्रों का अंतिम वर्ष या अंतिम सेमेस्टर है उनका Cumulative Grade Point Average or CGPA होता है। उसे आधार बना कर छात्रों को अंतिम परीक्षा में अंक दिए जा सकते हैं।

महाराष्ट्र, ओडिशा, दिल्ली और पश्चिम बंगाल समेत कुछ केंद्र शासित प्रदेशों ने भी इसका समर्थन किया था। इनके अलावा राहुल गाँधी ने भी परीक्षा रद्द करने की माँग उठाई थी।    

दरअसल विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने 6 जुलाई को राज्यों को 30 सितंबर तक परीक्षा कराने का आदेश दिया था। इस आदेश को जारी करते हुए यूजीसी ने कहा कि आदेश छात्रों के शैक्षणिक भविष्य को देखते हुए जारी किया गया है। यह भी कहा कि अंतिम वर्ष के छात्रों को बिना डिग्री दिए प्रमोट नहीं किया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान यूजीसी ने यह भी कहा राज्य यह तय नहीं कर सकते हैं कि अंतिम वर्ष के छात्रों को बिना परीक्षा आगे बढ़ाया जा सकता है। हालाँकि एक बात पहले भी कही गई थी कि राज्य 30 सितंबर की तारीख आगे बढ़ा सकते हैं। इस बात पर सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने आदेश में सहमति जताई है।     

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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