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‘यथास्थिति बहाल रखी जाए’: पटना के वक्फ भवन को लेकर सुप्रीम कोर्ट का आदेश, HC ने कहा था – 1 महीने में गिराओ

बिहार के सुन्नी वक्फ बोर्ड की दलील है कि अगर प्रोजेक्ट पर सरकारी आर्किटेक्ट का हस्ताक्षर है तो फिर इसके लिए पटना म्यूनिसपैलिटी से अनुमति लेने की कोई आवश्यकता नहीं है।

पटना हाईकोर्ट ने बिहार की राजधानी में बन रहे वक्फ भवन को ध्वस्त करने का आदेश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने अब यथास्थिति बहाल रखने का आदेश दिया है। बता दें कि उक्त वक्फ भवन अभी निर्माणाधीन है और इसे पटना हाईकोर्ट के परिसर के बगल में ही बनाया जा रहा है। पटना हाईकोर्ट की सेंटेनरी बिल्डिंग इसके ठीक बगल में स्थित है। उच्च-न्यायालय ने इसे वक्फ एक्ट, बिहार म्युनिसिपल एक्ट और बिहार बिल्डिंग कानूनों का उल्लंघन करार दिया था।

इस मामले में ‘बिहार स्टेट सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड’ और ‘बिहार स्टेट बिल्डिंग कॉर्पोरेशन (BSBCC)’ सुप्रीम कोर्ट पहुँचा था, जहाँ जस्टिस यूयू ललित की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। सुप्रीम कोर्ट अब 18 अक्टूबर को इस मामले की सुनवाई को आगे बढ़ाएगी। सुन्नी वक्फ बोर्ड ने कहा कि ये कार्य नियमानुसार ही हो रहा है और एक सरकारी आर्किटेक्ट से इसकी अनुमति ली गई थी।

बोर्ड की दलील है कि अगर प्रोजेक्ट पर सरकारी आर्किटेक्ट का हस्ताक्षर है तो फिर इसके लिए पटना म्यूनिसपैलिटी से अनुमति लेने की कोई आवश्यकता नहीं है। साथ ही जानकारी दी कि बिहार के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय द्वारा ये भवन बनवाया जा रहा है। साथ ही उसने कहा कि पटना हाईकोर्ट की आपत्ति के बाद इमारत के उन हिस्सों को ध्वस्त करने के लिए वो राजी हो गया था। हालाँकि, हाईकोर्ट ने इसे डैमेट कंट्रोल के लिए देरी बताते हुए नकार दिया था।

बता दें कि पटना हाईकोर्ट की नई बिल्डिंग के उत्तरी भाग के नजदीक बन रहे 4 मंजिला ‘वक्फ भवन’ को ध्वस्त करने के आदेश उच्च न्यायालय में 4:1 के जजमेंट के साथ पास कर दिए गए थे। इससे पहले यह मामला अदालत के मुख्य न्यायाधीश के निर्देशों पर जनहित में दायर हुआ था। इस मामले पर पाँच जजों की विशेष पीठ ने सुनवाई की थी। पीठ में जस्टिस अश्विन कुमार सिंह, विकास जैन, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, राजेंद्र कुमार मिश्रा और चक्रधारी शरण सिंह शामिल थे।

मामले की सुनवाई में पीठ के चार जजों ने हाई कोर्ट के पास बने निर्माण को हटाने के पक्ष में फैसला दिया था जबकि अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने इस मामले में अपनी असहमति जताई थी और निर्माण को बस नियम विरुद्ध बताया और उसे अवैध मानने से इनकार किया था। इसके अलावा, उन्होंने टिप्पणी की थी कि उल्लंघन ऐसा नहीं है कि पूर्ण विध्वंस के लिए कहा जाए, उन्होंने प्रस्ताव दिया कि उप-नियम का उल्लंघन करने वाली 10 फीट की ऊँचाई को, अनियमितता को ठीक करने के लिए ध्वस्त किया जा सकता है।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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