Sunday, June 16, 2024
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वो चुनाव आयुक्त, जो 90 के दशक में लालू यादव के सामने भी नहीं झुका: अब सुप्रीम कोर्ट ने भी माना लोहा, कहा – नियुक्ति समिति में CJI भी हों

वो 12 दिसंबर 1990 से 11 दिसंबर, 1996 तक भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर रहे। इस दौरान उन्होंने चुनाव को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने की कोशिश की थी।

देश के धाकड़ चुनाव आयुक्त रहे टीएन शेषन (T N Seshan) एक बार फिर से चर्चा में है। दरअसल, जस्टिस केएम जोसेफ की अध्यक्षता वाली 5 जजों की संवैधानिक बेंच ने चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया चिंता जाहिर की है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने टी एन शेषन का संदर्भ देते हुए कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त ऐसे चरित्र का होना चाहिए, जो खुद को दबने नहीं दे।

पीठ ने कहा कि टी एन शेषन जैसा व्यक्ति कभी-कभी कभार ही होता है। चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रणाली में सुधार की माँग करने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए जस्टिस केएम जोसेफ, अजय रस्तोगी, अनिरुद्ध बोस, हृषिकेश रॉय और सी टी रविकुमार की 5 सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा कि संविधान ने सीईसी (CEC) और चुनाव आयुक्त के ‘नाजुक कंधों’ पर विशाल शक्तियाँ डाल रखी हैं।

जस्टिस जोसेफ ने कहा, “योग्यता के अलावा, महत्वपूर्ण है कि आपको सख्त चरित्र वाले किसी व्यक्ति की आवश्यकता है, कोई ऐसा व्यक्ति जो खुद को दबने न दे। ऐसे में सवाल यह है कि इस व्यक्ति की नियुक्ति कौन करेगा? नियुक्ति समिति में मुख्य न्यायाधीश की उपस्थिति होने पर कम से कम दखल देने वाली व्यवस्था होगी। हमें लगता है कि उनकी मौजूदगी से ही संदेश जाएगा कि कोई गड़बड़ नहीं होगी। हमें सबसे अच्छा आदमी चाहिए और इस पर कोई मतभेद नहीं होना चाहिए।”

टी एन शेषन तमिलनाडु कैडर से 1955 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के ऑफिसर थे। टी एन शेषन ने भारत के 18वें कैबिनेट सचिव के रूप में 27 मार्च, 1989 तक सेवा दी। वो 12 दिसंबर 1990 से 11 दिसंबर, 1996 तक भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर रहे। इस दौरान उन्होंने चुनाव को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने की कोशिश की थी।

टी एन शेषण को भारतीय चुनाव प्रक्रिया में सख्ती से सुधार लाने के लिए जाना जाता है। भारत में मतदाता पहचान पत्र की शुरुआत शेषन के द्वारा ही की गई थी। उन्होंने अपने कार्यकाल में बोगस वोटिंग और बूथ कैप्चरिंग पर भी लगाम लगाई थी। 80 के दशक में जब बिहार में लालू यादव की सरकार के साथ पश्चिम बंगाल में ज्योति बसु की मार्क्सवादी सरकारें काम कर रही थीं तो ये देखा गया था कि चुनाव के दौरान इन सरकारों की दंबंगई के आगे चुनाव आयोग भी कुछ नहीं कर पाता था।

इन राज्यों से बड़े पैमाने पर चुनाव के दौरान धाँधलियों की खबरें आती थीं। केंद्रीय बल उन दिनों चुनाव के दौरान तैनात नहीं होते थे। अगर होते भी थे तो बहुत छोटी संख्या में उनकी उपस्थिति होती थी। शेषण ने ही इसे देखते हुए मतदान के दौरान केंद्रीय बलों को तैनात करना शुरू किया था।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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