बांग्लादेश में फाँसी की सजा पाए बाबर-अब्दुस सलाम-अजहरुल इस्लाम बने माननीय, मिली चुनावों में जीत: कोई आतंकी तो कोई नरसंहार का दोषी, जानें- तीनों का खौफनाक इतिहास

बांग्लादेश के आम चुनाव 2026 के नतीजों ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। खालिदा जिया की पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने दो-तिहाई बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की है और जमात-ए-इस्लामी को करारी शिकस्त दी है।

लेकिन इस जीत से ज्यादा चर्चा उन तीन चेहरों की हो रही है, जो कभी मौत की सजा पाए ‘आतंकी’ और अपराधी थे और अब सांसद बनकर देश की संसद में बैठने जा रहे हैं। शेख हसीना के देश छोड़ने के बाद बनी अंतरिम सरकार के दौरान कोर्ट से रिहा हुए ये तीनों नेता अब लोकतंत्र के मंदिर में कानून बनाएँगे।

फाँसी की कोठरी से संसद तक: लुत्फोज्जामन बाबर की वापसी

इस फेहरिस्त में सबसे बड़ा और चर्चित नाम BNP का नेता लुत्फोज्जामन बाबर का है। उन्होंने नेत्रकोना-4 सीट से 1 लाख 60 हजार से ज्यादा वोटों से जीत हासिल की है। बाबर का इतिहास बेहद विवादित रहा है। वह 2001 से 2006 के बीच खालिदा जिया सरकार में गृह राज्य मंत्री थे।

साल 2014 में बाबर को 2004 के ‘ढाका ग्रेनेड हमले’ के लिए मौत की सजा सुनाई गई थी, जिसमें शेख हसीना को निशाना बनाया गया था और 23 लोग मारे गए थे। इसके अलावा, 2018 में उन्हें चटगाँव हथियार तस्करी मामले में एक और मौत की सजा मिली।

आरोप था कि लुत्फोज्जामन बाबर ने भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के विद्रोहियों के लिए 10 ट्रक हथियार मँगवाए थे। हालाँकि, जनवरी 2025 में हाई कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया और अब वह एक माननीय सांसद हैं।

भारत विरोधी आतंकी कनेक्शन: अब्दुस सलाम पिंटू की जीत

BNP के एक और कद्दावर नेता अब्दुस सलाम पिंटू ने भी राजनीतिक पुनर्जन्म लिया है। उन्होंने टांगैल-2 सीट से करीब 2 लाख वोटों से जीत दर्ज की है। पिंटू को भी 2004 के ग्रेनेड हमले में शामिल होने के लिए 2016 में मौत की सजा सुनाई गई थी।

अब्दुस सलाम पिंटू पर पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन ‘हरकत-उल-जिहाद-अल-इस्लामी’ (HuJI) को समर्थन देने के गंभीर आरोप थे। गौर करने वाली बात यह है कि इसी संगठन ने भारत के वाराणसी कोर्ट (2006), अजमेर शरीफ दरगाह (2007) और दिल्ली (2011) में हुए बम धमाकों को अंजाम दिया था। शेख हसीना के जाने के बाद, 24 दिसंबर 2025 को उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया था।

युद्ध अपराधों का आरोपित: ATM अजहरुल इस्लाम का उदय

तीसरा नाम जमात-ए-इस्लामी के नेता ATM अजहरुल इस्लाम का है, जिन्होंने रंगपुर-2 सीट से करीब 1 लाख 39 हजार वोटों से जीत हासिल की है। अजहरुल इस्लाम पार्टी का महासचिव रह चुका हैं। अजहरुल इस्लाम पर 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान 1,256 लोगों की हत्या और 13 महिलाओं के साथ दुष्कर्म जैसे संगीन आरोप थे।

साल 2014 में इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल ने अजहरुल इस्लाम को इन युद्ध अपराधों के लिए फाँसी की सजा सुनाई थी। लेकिन 2024 के विद्रोह के बाद स्थितियाँ बदलीं और पिछले साल 27 मई को सुप्रीम कोर्ट ने अपराधी को बरी कर दिया। आज वह बांग्लादेश की नई संसद का हिस्सा बनने के लिए तैयार हैं।

बांग्लादेश में एक ‘खतरनाक’ राजनीतिक मोड़

बांग्लादेश की राजनीति में आया यह बदलाव केवल सत्ता परिवर्तन नहीं है, बल्कि एक गहरी वैचारिक और सुरक्षा संबंधी चिंता का विषय है। जिन चेहरों को कोर्ट ने मानवता के खिलाफ अपराध और आतंकवाद के लिए ‘फाँसी’ के लायक समझा था, उन्हें जनता का समर्थन मिलना लोकतंत्र के लिए एक जटिल पहेली है।

खासकर भारत के लिए यह स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि इनमें से दो नेताओं के तार सीधे तौर पर भारत विरोधी आतंकी गतिविधियों और हथियारों की तस्करी से जुड़े रहे हैं। मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के दौरान कोर्ट द्वारा इन लोगों को दी गई ‘क्लीन चिट’ ने अब इन्हें सत्ता की चाबी सौंप दी है। क्या ये नेता अपने पुराने रास्ते छोड़ेंगे या बांग्लादेश एक बार फिर कट्टरपंथ और अस्थिरता के पुराने दौर में लौट जाएगा? यह सवाल अब पूरी दुनिया, खासकर पड़ोसी देश भारत के सामने खड़ा है।