4 पीढ़ियों ने 70 साल तक अदालतों के काटे चक्कर, अब जाकर SC ने 15.5 बीघा जमीनी विवाद में सुनाया फैसला: जानें क्या है उत्तराखंड का ये केस?

सुप्रीम कोर्ट ने 70 साल पुराने जमीनी विवाद पर अंतिम फैसला सुनाकर चार पीढ़ियों से चल रही कानूनी लड़ाई को खत्म कर दिया है। यह मामला इतना पुराना था कि जिस 1957 की ब्रिक्री विलेख (Sale Deed) से विवाद शुरू हुआ था, उस समय फैसला सुनाने वाले दोनों जजों का जन्म भी नहीं हुआ था। फैसला सुलाने हुए कोर्ट ने 04 जून 1957 की बिक्री विलेख को पूरी तरह वैध माना और निचली अदालतों के फैसलों को रद्द कर दिया।

दरअसल, यह मामला उत्तराखंड के हरिद्वार जिले के नरसीपुर कलां गाँव की 15.5 बीघा जमीन से जुड़ा था। इस जमीन को वर्ष 1957 में शराफत अली के परिवार के पूर्वजों ने खरीदा था। परिवार का कहना था कि खरीदने के बाद से जमीन पर उनका कब्जा रहा लेकिन समय के साथ जमीन के मालिकाना हक को लेकर विवाद खड़ा हो गया और मामला अलग-अलग अदालतों में चलता रहा। इस दौरान परिवार की चार पीढ़ियाँ न्याय के लिए कोर्ट के चक्कर लगाती रहीं।

साल 1999 में समेकन (Consolidation) अधिकारी ने बिक्री विलेख को सही तरीके से साबित न होने और उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम 1950 की धारा 154 का हवाला देते हुए इसे अमान्य मान लिया था। इसके बाद अपीलीय प्राधिकरण, पुनरीक्षण प्राधिकरण और उत्तराखंड हाई कोर्ट ने भी इसी फैसले को बरकरार रखा।

हालाँकि जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि निचली अदालतों ने कानून की गलत व्याख्या की। कोर्ट ने साफ किया कि पंजीकृत बिक्री विलेख को केवल तकनीकी कारणों से अमान्य नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी पक्ष ने यह आरोप नहीं लगाया कि बिक्री विलेख फर्जी थी या धोखे से तैयार कराई गई थी। ऐसे में वैध रूप से दर्ज दस्तावेज को खारिज करने का कोई आधार नहीं था।

सुप्रीम कोर्ट ने 1957 की बिक्री विलेख को वैध घोषित करते हुए सभी पुराने फैसलों को रद्द कर दिया। इसके साथ ही लगभग 70 वर्षों से चल रहे इस जमीन के विवाद का अंत हो गया। यह मामला देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में शुरू हुआ था और अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में जाकर समाप्त हुआ।