Saturday, September 19, 2020
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पाकिस्तान का ‘डीप स्टेट’ चाहता है कि मोदी PM बनें – क्रिस्टीन फेयर के खोखले तर्क

पाकिस्तान के दृष्टिकोण से इस्लामी आइडेंटिटी 'हिन्दू बहुल भारत' के विरोध पर ही टिकी है इसलिए उनका ‘डीप स्टेट’- जो कि आईएसआई और पाकिस्तानी फ़ौज का मिश्रण है- इस आइडेंटिटी को भुनाता है।

सी क्रिस्टीन फेयर भारत पाकिस्तान मामलों की एक जानी-मानी विश्लेषक हैं। ‘फाइटिंग टू दी एंड: पाकिस्तान आर्मीज़ वे ऑफ़ वॉर’ पाकिस्तानी फ़ौज पर लिखी उनकी बहुचर्चित पुस्तक है। अच्छी बात यह है कि एक अमरीकी होने के बावजूद उन्हें हिंदी भी आती है। बीबीसी की वेबसाइट पर हाल ही में प्रकाशित एक लेख में क्रिस्टीन फेयर ने लिखा है कि मोदी के जीतने से पाकिस्तान के ‘डीप स्टेट’ को फायदा होता है।

क्रिस्टीन फेयर के अनुसार जब मोदी भारत में जीतते हैं तो पाकिस्तानी फ़ौज को अपनी जनता को यह समझाने में मदद मिलती है कि हिंदुस्तान में एक हिंदूवादी सरकार है और इस तरह पाकिस्तानी फ़ौज खुद को पाकिस्तान की जनता का रक्षक साबित करती है। ग़ौरतलब है कि दशकों से पाकिस्तानी हुक्मरानों ने अपनी जनता के भीतर भारत (विशेषकर हिन्दू) विरोधी भावनाओं का संचार किया है। इसलिए अपनी जनता पर नियंत्रण रखने के लिए उन्हें भारत की कथित ‘हिंदूवादी सरकार’ का भय दिखाना ज़रूरी हो जाता है।  

दूसरे शब्दों में कहें तो पुलवामा में पाकिस्तानी आतंकियों ने CRPF के काफिले पर हमला इसलिए करवाया था ताकि मोदी सरकार पाकिस्तान के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करे जिसके बाद भारत की जनता के बीच मोदी सरकार की अच्छी इमेज बने और नरेंद्र मोदी को आगामी चुनाव में फायदा मिले।

चुनाव में मोदी की विजय से हिंदूवादी सरकार का भय पाकिस्तानी जनता में बरकरार रहेगा जिससे सुरक्षा की गारंटी पाकिस्तानी फ़ौज अपनी जनता को देती है। क्रिस्टीन फेयर के अनुसार इस तर्क का यह अर्थ बिल्कुल भी नहीं है कि पुलवामा हमले का मोदी से कोई संबंध है लेकिन वो यह बताना चाहती हैं कि मोदी की जीत पाकिस्तानी सेना की ज़रूरत है।  

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दरअसल पाकिस्तानी फ़ौज पश्तूनों और बलूचों पर जो अत्याचार करती है उसे छुपाने के लिए वो किसी भी हद तक जा सकती है। ग़ौरतलब है कि आज पाकिस्तान के एक बड़े हिस्से में विद्रोह की स्थिति है। पाकिस्तान में बलूचिस्तान, सिंध, गिलगित (POK) समेत कई प्रांतों में ऐसी स्थिति है कि वहाँ के लोग पाकिस्तान से अलग होना चाहते हैं। ऐसे में पाकिस्तानी फ़ौज ही एकमात्र ताक़त है जो हिंसा के प्रयोग से ही सही लेकिन पाकिस्तान के भूभाग को एक रखने में अहम भूमिका निभाती है। ऐसे ही विचार एक अन्य अमरीकी चिंतक स्टीफेन कोहेन के भी हैं किंतु इस निष्कर्ष के अन्य पहलुओं पर भी ध्यान देना ज़रूरी है।

हम इतिहास को देखें तो पाकिस्तान का जन्म ही मज़हबी आधार पर हुआ था। पाकिस्तान का आधिकारिक नाम ‘इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ पाकिस्तान’ है। इसलिए उसे अपने अस्तित्व को क़ायम रखने के लिए इस्लामी आइडेंटिटी को डिफेंड करना पड़ता है। चूँकि पाकिस्तान के दृष्टिकोण से इस्लामी आइडेंटिटी ‘हिन्दू बहुल भारत’ के विरोध पर ही टिकी है इसलिए उनका ‘डीप स्टेट’- जो कि आईएसआई और पाकिस्तानी फ़ौज का मिश्रण है- इस आइडेंटिटी को भुनाता है।  

क्रिस्टीन फेयर के दृष्टिकोण से बालाकोट में जैश ए मोहम्मद के ठिकानों पर भारत द्वारा की गई दंडात्मक कार्यवाही का विश्लेषण करें तो ढेर सारे प्रश्न सामने आते हैं, जिनमें पहला यह है कि क्या भारत ने नियंत्रण रेखा के पार एयर स्ट्राइक कर गलती की है? क्या भारत की एयर स्ट्राइक से पाकिस्तानी फ़ौज का दबदबा अपनी जनता पर बढ़ा है? इसका जवाब देना इतना कठिन भी नहीं है। यदि भारत की जवाबी कार्यवाही के कारण पाकिस्तान की जनता अपनी फ़ौज से जवाब माँगती है जिसके बदले में फ़ौज जनता को भारत के खतरे से सुरक्षा की गारंटी प्रदान करती है, तो वहीं दूसरी तरफ भारत में नरेंद्र मोदी का कद भी बढ़ा है।

वस्तुतः भारत एक दशक (2004-2014) तक एक मज़बूत राष्ट्रीय नेतृत्व के अभाव में रहा है। ऐसे में निर्णायक कदम उठाने में सक्षम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर यदि भारत की जनता पुनः विश्वास जताती है तो यह भारत के लिए भी अच्छा होगा। यह न केवल भारत की जनता बल्कि देश की ग्लोबल छवि के लिए भी अच्छा होगा कि नरेंद्र मोदी पुनः प्रधानमंत्री बने। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि पाकिस्तान द्वारा जारी छद्म युद्ध के विरुद्ध भारत ने पहले कभी एयर स्ट्राइक का प्रयोग नहीं किया था। भारत को एक कमज़ोर देश समझा जाने लगा था जो लगातार आतंकी हमले झेलने को अभिशप्त है।

अब भारत अपनी इस छवि से बाहर आ चुका है। उसने दुनिया को दिखा दिया है कि यदि हम पर हमला हुआ तो हम हर संभव जवाबी कार्यवाही करेंगे। नरेंद्र मोदी द्वारा अपने सम्बोधनों में सवा सौ करोड़ भारतीयों का उल्लेख करना यह दर्शाता है कि केंद्र में एक मज़बूत सरकार कड़े फैसले लेने में सक्षम होती है। और यदि ऐसी सरकार एक से डेढ़ दशक तक भी सत्ता में रह जाती है तो देश की व्यवस्था में ऐसे बदलाव कर सकती है जिससे पाकिस्तान द्वारा छेड़े गए छद्म युद्ध से लंबे समय तक लड़ने की क्षमता विकसित की जा सके।

ऐसे में क्रिस्टीन फेयर का आकलन पूरी तरह सही नहीं है। हालाँकि लेख में उनका अपना मत है जिसे प्रकट करने के लिए वे पूरी तरह स्वतंत्र हैं। यह संभव है कि भारत में हिंदूवादी नेतृत्व का भय दिखाकर कुछ समय के लिए पाकिस्तानी फ़ौज अपनी जनता का असली रक्षक बनने का दिखावा करे लेकिन यह रणनीति दीर्घकाल तक कामयाब होगी इसकी संभावना नगण्य है।

क्रिस्टीन फेयर का एक और आकलन है कि जब भारत में कॉन्ग्रेस की सरकार होती है तब पाकिस्तानियों में कॉन्ग्रेस की जीत उस तरह से हिंदू अंध-राष्ट्रवादी भारत- जिसमें मुस्लिम हाशिये पर हों- का डर पैदा नहीं कर पाती है। यह तर्क देते हुए क्रिस्टीन फेयर यह भूल जाती हैं कि कॉन्ग्रेस की सरकार होने पर स्वयं भारत की सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है। मुंबई हमले (26/11) के बाद मनमोहन सिंह की अकर्मण्यता इसकी गवाह है। जिस राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था की नींव अटल सरकार में रखी गई थी उसे मज़बूत संस्थागत स्वरूप देने में मनमोहन सरकार विफल रही थी।

मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री रहते जिस प्रकार भारत-पाक के बीच सॉफ्ट बॉर्डर और सियाचिन के विसैन्यीकरण जैसी बातों पर अमल करना लगभग प्रारंभ ही कर दिया था उससे भारत की ही अखंडता और सुरक्षा पर प्रश्न खड़े हो गए थे। ऐसे में यह कहना कि कॉन्ग्रेस के राज में पाकिस्तान अधिक असुरक्षित होता है, तर्कसंगत नहीं लगता। पाकिस्तानी फ़ौज या डीप स्टेट की सबसे बड़ी ताक़त वह सामरिक विचारधारा है जो ब्रिगेडियर एस के मलिक की क़िताब “क़ुरानिक कंसेप्ट ऑफ़ वॉर” से निकलती है। इसका उल्लेख क्रिस्टीन फेयर ने भी अपनी पुस्तक में किया है।

भले ही आज पाकिस्तानी जनरलों के कब्जे में पाकिस्तान की सत्ता और अर्थतंत्र दोनों है लेकिन एक मज़बूत भारत की तरक्की और तल्ख़ी उन्हें अपनी जनता से अलग ही करती है। पाकिस्तान की जनता के भीतर भारतीयों से प्रतिस्पर्धा की भावना बहुत तगड़ी है। वे हर परिस्थिति में तेज़ी से आगे बढ़ते भारत से होड़ करना चाहते हैं। इसलिए हर चीज के लिए अपनी फ़ौज पर निर्भरता आने वाले दिनों में बढ़ने की अपेक्षा घटेगी ही।

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