Wednesday, September 30, 2020
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डर का माहौल है… क्योंकि हिंदुत्व बड़ी निर्दयी चीज है, इससे ज्यादा लचक तो आतंकवाद में है

‘कंटकेनैव कंटकम्’ मतलब ये कि काँटा, काँटे से ही निकलता है, कॉटन से नहीं। इन कुतर्की लोगों को इन्हीं की भाषा में जवाब देना होगा। ये तभी संभव है जब भारत का नागरिक जागरूक और न्यायशील बनेगा।

एक छोटा बच्चा घर में अकेला है। उसके साथ खेलने के लिए बाकी बच्चे नहीं हैं। इसलिए बेचारा वही अकेला चोर-सिपाही सबके रोल बारी-बारी से निभाता है और अपने मन को बहलाता है। उसने अपने मुँह पर चादर ढकी, एक तरफ खड़े होकर डराने के अंदाज़ में जोर से ‘हाऊ’ बोला, फिर भागकर दूसरी तरफ जाकर दुबक कर बैठ गया और डरने का नाटक करने लगा।

बच्चे के खेल तक सब ठीक है, लेकिन यही खेल कुछ बड़े लोग भी खेल रहे हैं। खेल कुछ इस तरह है- यथार्थ से एंड्रॉमेडा गैलेक्सी (Andromeda Galaxy) जितनी दूर की बातों की कपोल कल्पना करें, फिर उन्हें बंगलुरु सोनिक बूम जैसे रहस्यमय विस्फोटक स्वर में व्यक्त कर दें और ये लीजिए ‘डर का माहौल’ तैयार है। अब बस उसे तहे दिल से महसूस कराना बाकी है। इसके लिए आप लंबी-गहरी साँस लें और एक अन-अनुभूत पीड़ा के साथ संजीदा आवाज में बोलें- ‘चारों ओर डर का माहौल है’। आज इससे ज्यादा क्रांतिकारी कुछ और नहीं हो सकता। 

डर के माहौल के इन सुरों को अगर ठीक से सुनना है तो आपको 7.1 Surround Sound System वाले ध्वनि यंत्र का प्रयोग करना चाहिए। ताकि आप इस multi-channel audio को ठीक से सुन सकें। तब आपको पता चलेगा कि इस महाभीति गान का प्रथम स्वर ‘सा’ वाममार्गियों के कोने से आता है, ‘रे’ कॉन्ग्रेस व अनुषंगी पार्टियों से, ‘ग’ अति जागरूक पत्रकारों से, ‘म’ मुंबई वाले कलाकारों से, ‘प’ का पंचम स्वर पाकिस्तान वाली दिशा से, ‘ध’ धमाके वाले शांतिदूतों से, ‘नि’ निर्मल हृदय छात्र-छात्राओं की ओर से।

इस तरह ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ की विशुद्ध संगीतमयता के साथ छद्म मानवाधिकार, उदारता, सेक्युलरिज्म आदि थीम के गीत गाए जाते हैं। इनका सुर एक इसलिए है क्योंकि इन सबको, चाहे वो पाकिस्तान हो या हमारे देश की सेवाभावी पार्टियाँ, इन्हें एक ही चीज से खतरा है और वो है हिंदुत्व।

गजब की बात ये है कि इन लोगों को हिन्दुओं के खिलाफ कोई भी प्रोपेगेंडा करने के लिए अतिवादी हिंदुत्व या उग्र हिंदुत्व जैसी औपचारिकता की भी जरूरत नहीं पड़ती है। सीधे हिंदुत्व शब्द में ही वो दहशत समेट दी जाती है जो इस देश के करोड़ों अल्पसंख्यकों में डर का माहौल दिखाने और दुनिया भर में इसे बदनाम करने के लिए पर्याप्त है। लेकिन आप ये भी न सोचें कि सभी हिंदू खतरनाक हैं।

मौसमी हिंदुत्व को इससे बचाकर रखा गया है। मौसमी हिंदुत्व, मौसमी जनेऊ, मौसमी ब्राह्मण ये तो दुनिया के सबसे भोले-भाले प्राणी हैं। ये प्राय: उच्च राजवंशी, जगदद्धारक, अवतारी महापुरुष होते हैं, जिन्हें स्वयं ब्रह्मा ने इस धरा के कल्याण के लिए भेजा है। इसलिए इस लेख में जब भी हिंदुत्व की बात हो तब आप मौसमी हिंदुत्व को उससे बाहर ही रखें, क्योंकि ऐसे भोले-भाले प्राणियों को हिंदुत्व के लपेटे में लाने से अहिंसा के व्रत का उल्लंघन हो जाता है।

तो हम बात कर रहे थे कि हिंदुत्व बड़ी निर्दयी चीज़ है। इससे ज्यादा लचक तो आतंकवाद में पाई जाती है। अच्छा आतंकवाद, बुरा आतंकवाद, भटके हुए बच्चे, तरक्की और वाजिब तालीम से महरूम नौजवान, डरे-सहमे युवा, एशियन पेंट्स के पास भी इतना विविधतापूर्ण शेडकार्ड मिलना मुश्किल है।

हिंदुत्व का खतरा इतना सर चढ़कर बोल रहा है कि हाल ही में पहले तो पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने ट्वीट कर बताया कि उन्होंने पीएम मोदी की इस्लाम विरोधी, हिंसक और क्षेत्रीय अस्थिरता वाली हिंदुत्ववादी या द्रविड़ ऐसी ही किसी विचारधारा के खिलाफ अनेक बार संयुक्त राष्ट्र संघ और अंतर्राष्ट्रीय इस्लामिक संगठनों से शिकायत की है। फिर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने ट्वीट करके चिंता जाहिर की कि तानाशाह मोदी की सरकार न केवल भारत के अल्पसंख्यकों, जो कि इस समय भारत में दोयम दर्जे के नागरिक हैं उनके लिए, बल्कि क्षेत्रीय शांति के लिए भी खतरा है।

इमरान खान के पास खतरा भाँपने की छठी इन्द्रियनुमा कौन सी तकनीक है पता नहीं, जो खतरे की इतनी पक्की पूर्वसूचना दे देते हैं। इतनी पक्की सूचना के लिए वाकई या तो अच्छी तकनीक चाहिए या फिर खतरे का तूफ़ान खुद ये सूचना दे कि वो आ रहा है तब वो सही होगी। मिनिमम-मैक्सिमम वाली घटना के बाद इनकी तकनीक पर तो भरोसा नहीं किया जा सकता, इसलिए खतरे के आने की सूचना खुद खतरे ने दी है यही मानना पड़ेगा।

क्षेत्रीय शांति के लिए खतरे के तूफ़ान का अभी एक वीडियो भी पाकिस्तान से आया था जिसमें वो पूर्वसूचना दे रहा है कि हम आ गए हैं कश्मीर में, गजवा-ए-हिंद के लिए निकल पड़े हैं, बिल्कुल इमरान खान की सूचना से मेल खाता हुआ।

पता नहीं पाकिस्तान में ऐसे कौन से फ़िल्टर लगे आईने बेचे जाते हैं, जिसमें उन्हें अपना चेहरा बड़ा सुहाना नज़र आता है। पूरी की पूरी माइनॉरिटी के गायब होने से बने गड्ढे और जगह-जगह पर उभरते आतंरिक विद्रोहों के बर्बरता पूर्वक कुचले गए अपने ही चेहरे के फोड़े नज़र नहीं आते। खुद के दामन पर लगे बलूचियों, अहमदियों, हिंदुओं के संहार के छींटें नज़र नहीं आते। या हो सकता है उनके दाग अच्छे हों, क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय राजनैतिक दाँव-पेंचों के सर्फ में सब धुलते रहते हैं।

जिस हिंदुत्व का रोना रोकर पाकिस्तान से लेकर भारत तक ये वाममार्गी इसे खतरनाक जताने की कोशिश करते हैं उसका न तो दहशतगर्दी का अतीत है, न वर्तमान। फिर भी वही है खतरा। सवाल तो ये उठना चाहिए कि अगर इस्लाम पाकिस्तान सहित कितने ही दूसरे देशों का आधिकारिक धर्म हो सकता है और बहुत से देशों का राष्ट्रीय धर्म ईसाई धर्म है, तो हिंदुत्व भारत का आधिकारिक धर्म क्यों नहीं हो सकता? वो भी तब जब देश का बँटवारा हुआ ही धर्म के नाम पर था।

ये तो उल्टा मुस्लिम देशों से उत्पीड़ित होकर आए हिन्दुओं को भी भारत में शरण देने का विरोध कर रहे हैं। फिर हिंदू किस देश में जाएगा? CAA के विरोध में ये लोग सड़कों पर ऐसे जम गए जैसे इस सड़क के संवैधानिक बैरिकेड्स हों। इस विरोध का सीधा सपाट मतलब यही है कि पाकिस्तान ने तुम्हें निकाल दिया, हिन्दुस्तान में हम तुम्हें रहने नहीं देंगे।

सारा मानवाधिकार गधे के सींग की तरह गायब हो गया। या हिंदू मानव की श्रेणी में नहीं आता? या भारत को शुरू में ही हिंदू राष्ट्र न बनाना गलती थी? बन जाता तो कम से कम आज उन उत्पीड़ित हिन्दुओं के लिए इस दुनिया में कहीं तो जगह होती। इतने स्पष्ट विरोधाभासों के बावजूद जो लोग उदारवाद के नाम पर इन घनघोर अनुदारवादी विचारों के पक्षधर बन जाते हैं, उनका सच और न्याय से कोई नाता नहीं है। ऊपर से धर्म निरपेक्षता और अभिव्यक्ति की आजादी के ढिंढोरे के शोर में चलती तुष्टिकरण की छेनियाँ देश की अखंडता को तार-तार करने पर तुली हैं, लेकिन फर्क किसे पड़ता है?

जिसे देखो वही हमें बिन माँगी सीख देने आ जाता है। अतिथि बनकर दूसरों के घर में लूट मचाने वाले अंग्रेज हमें कहते रहे कि हम असभ्य हैं, इसलिए वो हमें सभ्यता सिखाने आए हैं और हम में से बहुत से मान भी गए। जिस भारत ने दुनिया को विकसित हड़प्पा सभ्यता दी, उस पर हड़पने की सभ्यता थोंप दी गई और उस पर भी तुर्रा ये कि हम पिछड़े और वो सभ्यता के ब्रह्मा, विष्णु, महेश।

अब सामने हैं चरमपंथी, उग्रवादी, अराजक वाममार्गी जो सर्वाधिक सहिष्णु हिंदुत्व को उदारता और धर्म निरपेक्षता सिखा रहे हैं। जिन्हें चार गाँवों में बहुसंख्यक होते ही अपना अलग वर्चस्व चाहिए वो देश की अस्सी प्रतिशत धर्म निरपेक्ष आबादी को असहिष्णु बता रहे हैं। जैसी सभ्यता और उदारता इन लोगों के द्वारा औरों को सिखाई जा रही है, उसका एक अंश भी कोई इस्तेमाल कर ले तो धरती से शांति सदा के लिए गायब हो जाएगी।

दिल्ली दंगों में ताहिर हुसैन की जगह किसी हिंदू के खिलाफ चार्जशीट दाखिल हो जाती तो क्या कोहराम मच जाता, इसकी आप कल्पना कर सकते हैं। लेकिन अब ये रोना शुरू हो चुका है कि उसे मुसलमान होने की सजा मिल रही है। कुछ लोगों ने हथिनी का भी धर्म देख लिया, लेकिन अब जब गिरफ्तार आरोपितों के नाम सामने आ गए तो दोहरे मानदंडों वाले विश्लेषक इस पूरे केस को हाथी के साइज से घटाकर चींटी जितना बना डालेंगे। ऐसे आचरण को विशुद्ध हिंदी भाषा में पाखंड कहते हैं।

इस भारत धरा पर अब एक पाखंड खंडिनी ध्वजा राजनैतिक और सामाजिक क्षेत्र में भी गाड़ने की जरूरत है, ताकि इन दोहरे मानदंडों के पाखंड को सोचने पर मजबूर किया जा सके। ‘कंटकेनैव कंटकम्’ मतलब ये कि काँटा, काँटे से ही निकलता है, कॉटन से नहीं। इन कुतर्की लोगों को इन्हीं की भाषा में जवाब देना होगा। ये तभी संभव है जब भारत का नागरिक जागरूक और न्यायशील बनेगा।

हर व्यक्ति अपने स्तर से इस पाखंड का खंडन करे, किसी भी माध्यम से, चाहे आपको सुनने वाले एक या दो लोग ही क्यों न हों। याद करें अपने बचपन के जज्बातों को। तब हममें से किसने नहीं चाहा था कि हम भी देश के लिए कुछ करना चाहते हैं। जागरूक होना और दूसरों को भी जागरूक बनाना उस कुछ करने का सबसे अनिवार्य हिस्सा है, लोकतंत्र का सबसे बड़ा हथियार है और हर एक के वश की बात है।

ऋषि दयानंद ने मनुष्य की परिभाषा बताते हुए लिखा है, “मनुष्य उसी को कहना जो मननशील होकर अपने समान औरों के सुख-दुःख और हानि-लाभ को समझे। अन्यायकारी बलवान से कभी न डरे और धर्मात्मा निर्बल से भी डरता रहे।” इसलिए मनुष्य बनें और बिना डरे अपनी अभिव्यक्ति की आजादी का उपयोग करें। हमारी स्वाभाविक उदारता, अतिथि सत्कार और सहिष्णुता का मानव मूल्यों से रहित स्वार्थी ताकतों ने हमेशा गलत फायदा उठाया है। हमें ये सुनिश्चित करना है कि अब ऐसा न हो।

एक गुणी व्यक्ति ही किसी दूसरे के गुण की कीमत समझ सकता है। स्वार्थी व्यक्ति नहीं। इसलिए इससे पहले कि ये प्रोपेगेंडा संचालित लोग अपने कुतर्कों से आपको अपने से ही नफ़रत करना सिखा दें, आपको जागना होगा। अपनी विशेषताओं को पहचानें और खुद पर लग रहे आरोपों का थोड़ा तुलनात्मक अध्ययन करें, वरना ये ‘उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे’ का खेल यूँ ही चलता रहेगा और आप खुद को चोर समझने भी लगेंगे।

हो सकता है कि कुछ युवाओं को इस जागरूकता अभियान में शामिल होना पिछड़ापन लगे, क्योंकि ज्यादातर पढ़े-लिखे युवा ही इस वामपंथी मायाजाल में जकड़े हुए हैं। लेकिन हमें ये भी याद रखना चाहिए कि बदलाव के मोड़ पर ये संशय एक आम बात है, जिसमें व्यक्ति का निर्णय ही उसे सही या गलत साबित करता है। 

आइए अंत में एक विचार पवित्र वेद संहिता का भी सुनते चलें। जो वेद हमें सहिष्णुता सिखाते हैं, वही हमें ये भी सिखाते हैं कि असामाजिक तत्वों का क्या समाधान करना है। क्रांति के नाम पर दंगे भड़काने वाले अराजक तत्वों के प्रति राज्य का क्या कर्तव्य है। इसके लिए वेद में लिखा गया है,

विजानीहि आर्यान् ये च दस्यवो बर्हिष्मते रन्धया शासदव्रतान्।
शाकी भव यजमानस्य चोदिता विश्वेत्ता ते सधमादेषु चाकन।।

इसका मतलब है, “हे शासक! अपने राज्य के अच्छे सृजनशील लोगों और निर्माण की अपेक्षा ध्वंसात्मक कार्यों में रूचि रखने वालों अर्थात् इन दोनों ही प्रकृति के लोगों को जानो। यजनशील कार्यों यानी परहित में लगे व्यक्तियों की रक्षा करो और कुत्सित अर्थात् निंदनीय कार्यों में संलिप्त लोगों को कठोर दंड दो। प्रजा पालन के लिए राजा को राज्य के भीतर के दस्युओं को दंड देना है और बाह्य शत्रुओं से युद्ध करना है। इस कर्तव्य को शक्तिशाली शासक ही निभा सकता है, इसलिए तुम शक्तिशाली बनो।”

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Dr. Amita
डॉ. अमिता गुरुकुल महाविद्यालय चोटीपुरा, अमरोहा (उ.प्र.) में संस्कृत की सहायक आचार्या हैं.

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