क्या इंदिरा गाँधी इसी तरह मैदान छोड़कर भागतीं जिस तरह ‘इंदिरा 2.0’ भागी है?

कॉन्ग्रेस वर्तमान लोकसभा चुनाव नतीजे सामने आने से पहले ही हार गई है। ये बुजुर्ग पार्टी किसी भी तरह से ICU में लेटे रहकर बस स्वयं के जिन्दा होने का प्रमाण देना चाह रही है कि आज नहीं तो कल इसके अच्छे दिन आएँगे। हालाँकि, अच्छे दिनों के लिए उन्हें परिवारवाद की लालसा से बहार निकला ही होगा लेकिन ये काम अहंकार में डूबे हुए राजनीति के इस खानदान विशेष के लिए संभव नहीं है।

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान माहौल को याद करें तो हम पाएँगे कि ये वो समय था जब देश भर में मोदी लहर अपने चरम पर थी। जनता ‘अराजकतावादी’ कॉन्ग्रेस के भ्रष्टाचार, आत्मुग्धता में डूबे एकतरफा संवाद और सत्तापरस्ती से ऊब चुकी थी। ऐसे समय में लोगों को नरेंद्र मोदी के रूप में शायद पहली बार एक ऐसा चेहरा मिला, जिसमें हर किसी ने खुद की परछाईं देखी।

वहीं, दूसरी ओर सदियों से ही परिवारवाद में लिप्त कॉन्ग्रेस के सामने ऐसे माहौल में चिरयुवा राहुल गाँधी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बताकर 2014 के चुनाव में जुआ खेलना बहुत बड़ा चैलेंज बन गया था। इसका कारण बहुत ही सीधा सा था! कॉन्ग्रेस कभी नहीं चाहती कि वो पहले से ही हारी हुई लड़ाई में अपने सबसे पसंदीदा और दुलारे राजकुमार को हारने के लिए आगे खड़ा करती। ऐसे में कॉन्ग्रेस ने इन्तजार करना बेहतर समझा और अपने जीतने की तैयारियों से ज्यादा ऊर्जा पार्टी के पारंपरिक अध्यक्ष राहुल गाँधी को सुरक्षित करने और उनकी छवि बनाने पर झोंक दी।

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कॉन्ग्रेस के सामने यही प्रश्न फिर खड़ा हो गया कि क्या राहुल गाँधी मुख्य चेहरा बनाए जाने लायक तैयार हो चुके हैं? इसका जवाब खुद राहुल गाँधी हैं। आलू से सोना बनाने जैसी विधियों से देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का दावा करने वाले और झूठे कागजों के आधार पर मोदी सरकार को घोटालों में लिप्त बताने की नादान कोशिश करने वाले देश की सबसे बुजुर्ग राष्ट्रीय पार्टी के चिरयुवा अध्यक्ष राहुल गाँधी शायद पार्टी की उम्मीदों पर आज भी खरे नहीं उतर रहे हैं। हालाँकि, ये भी दिलचस्प बात है कि इससे उनके पार्टी अध्यक्ष होने और पार्टी में निर्विवाद रूप से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार होने पर कोई सवाल खड़ा नहीं होता है।

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ऐसे समय में अब गाँधी परिवार के पास आखिरी विकल्प था राहुल गाँधी की बहन प्रियंका गाँधी! आखिरकार वो दिन भी आ ही गया जब कॉन्ग्रेस ने प्रियंका गाँधी को पूर्ण रूप से राजनीति में उतारने का फैसला लिया। इस फैसले के बाद एक ऐसा गिरोह अचानक सक्रिय हो गया, जो 2014 के आम चुनावों के बाद से, या कहा जाए तो कॉन्ग्रेस के हाथों से सत्ता छिन जाने से अपनी हर उम्मीद और आशा हारकर लगभग शिथिल पड़ चुका था।

प्रियंका गाँधी के नाम की घोषणा होते ही अचानक से इस गिरोह में शक्ति का संचार फूट पड़ा। मीडिया से लेकर समाचार पत्रों तक में एक नए उत्साह का संचार देखने को मिला। इनमें सबसे ज्यादा जोर उन लोगों ने लगाया, जो मोदी विरोध में अवार्ड वापस करना चाहते थे, लेकिन उनके पास वापस करने के लिए अवार्ड ही नहीं थे।

मीडिया ने यह बताने का हर संभव प्रयास किया कि प्रियंका गाँधी इंदिरा गाँधी की ही अवतार हैं। प्रियंका गाँधी की साड़ी से लेकर उनकी नाक, कान और बालों तक को इंदिरा के रंग में रंगने की कोशिश की जाने लगी। यहाँ तक भी चर्चा की जाने लगी कि प्रियंका गाँधी चलती भी अपनी दादी इंदिरा गाँधी की ही तरह हैं।

सारा गाँधी परिवार और उनके सिपहसालार ये बात अच्छे से जानते हैं कि भाई राहुल के सुनहरे राजनीतिक करियर के लिए उनकी बहन प्रियंका का प्रत्यक्ष रूप से राजनीति में आना ही उनके लिए सबसे बड़ी बाधा हो सकती है। फिर भी यह बड़ा निर्णय लिया गया और पार्टी महासचिव पद उन्हें सौंपकर मैदान में उतारा गया। यहीं से असल खेल शुरू हुआ।

प्रियंका गाँधी की छवि एक आदर्श भारतीय नारी के रूप में बनाने की तैयारियाँ की जाने लगीं। मीडिया ने प्रियंका गाँधी द्वारा अपने पति को लेकर दिए गए बयानों को मुख्य पेज पर छापा। कभी वो कहती सुनी गईं कि वो हर हाल में अपने पति, यानी मनी लॉन्ड्रिंग मामले में रोजाना ED ऑफिस के चक्कर काट रहे रॉबर्ट वाड्रा के साथ खड़ी रहेंगी, तो कभी वो मंच से अपने बच्चों का परिचय करवाती हुई नजर आईं।

मोदी लहर के सामानांतर ही ऐसी हवा बनाने का प्रयास किया गया जो इंदिरा गाँधी से मिलती-जुलती हो। ऐसा करते हुए विपक्ष ने बेवकूफी में यह भी साबित कर दिया कि उनके पास मोदी के बराबर तो क्या, उनके आस-पास ठहरने वाला तक कोई समकालीन नेता नहीं है और इसी कारण से उसे प्रियंका गाँधी में ही इंदिरा गाँधी की छवि ठूँसकर 2019 के चुनाव के लिए तैयार करना पड़ रहा है। कुछ समय तक ऐसी भी ख़बरें मैदान में उतारी गईं कि बनारस से नरेंद्र मोदी को टक्कर देने के लिए सीधा प्रियंका गाँधी ही अब मुकाबले में उतारी जाएँगी। लेकिन, कल बनारस में प्रधानमंत्री नरेंद्र की रैली में बिना ‘फोटोशॉप तस्वीरों’ के उमड़े जनसैलाब ने विपक्ष की हवा टाइट कर डाली।

इंदिरा गाँधी वर्जन-2 की छवि गढ़ने की प्रक्रिया युद्ध स्तर पर चल ही रहीं थी कि अचानक एक दिन मुंगेरीलाल ने सपना देखते-देखते अपने एकमात्र दूध के घड़े पर भी लात दे मारी और उसे भी फोड़ दिया। इस तरह से मीडिया गिरोह से लेकर तमाम मोदी विरोधियों के सपने और अरमानों का शीघ्रपतन हो गया।

प्रियंका गाँधी के मोदी के खिलाफ बनारस से चुनाव लड़ने की बात कॉन्ग्रेस का एक और जुमला साबित हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में आज भी कोई कमी नहीं है, यही देखकर कॉन्ग्रेस ने अपनी आखिरी उम्मीद, यानी इंदिरा गाँधी जैसी दिखने वाली प्रियंका गाँधी को पीछे खींचना ही उचित समझा। और कल शाम तक उस तमाम मीडिया गिरोह में सन्नाटा छा गया, जिसने पिछले 2 महीने प्रियंका गाँधी के रूप में इंदिरा गाँधी से 2019 का आम चुनाव लड़ाने का सपना देखा था।

पूरे 5 साल तक कॉन्ग्रेस पार्टी अध्यक्ष राहुल गाँधी जनता से झूठे सबूतों के आधार पर सिर्फ गिनी-चुनी बातें कहता आया है। जैसे, चौकीदार चोर है, देश में अराजकता फैला रहा है, संविधान खत्म कर रहा है, देश में साम्प्रदायिकता बढ़ा रहा है, अम्बानी को देश बेच दिया। और अब इसी अध्यक्ष ने चुनाव के वक़्त बनारस में अजय राय नामक घिसापिटा प्रत्याशी मोदी के सामने उतारा है। सवाल सीधा सा है, यदि राहुल गाँधी के अनुसार मोदी देश की संपदा बेच रहा है, हत्यारा है, चोर है, कॉर्पोरेट का दलाल है, तो राजनैतिक शिष्टाचार के नाम पर उन्हें संसद में आखिर क्यों भेज रहे हो? जब अन्य राजनीतिक दल अपने प्रत्याशी चुन रहे होते हैं, तब कॉन्ग्रेस बलि के बकरे तलाशने में ही अपनी सारी शक्ति लगा देती है।

सोशल मीडिया पर कल शाम का मंजर निराश कर देने वाला था। प्रियंका गाँधी से उम्मीद लगाए हुई तमाम मोदी विरोधी खुद को कोड़े मारते नजर आए। इनकी प्रतिक्रियाएँ देखकर स्पष्ट था कि इन सबके लिए अपनी कुंठा को छुपा पाना अब संभव नहीं है। सब्र का बाँध ऐसा टूटा कि 5 साल तक अंधाधुंध तरीके से मोदी विरोध करने वाले यह तक कहते देखे गए कि प्रियंका गाँधी से ज्यादा दम तो अरविन्द केजरीवाल में था, जो कम से कम अपने कहे के अनुसार वाराणसी से मैदान छोड़कर भागा तो नहीं।

जाहिर सी बात है कि कॉन्ग्रेस वर्तमान लोकसभा चुनाव नतीजे सामने आने से पहले ही हार गई है। ये बुजुर्ग पार्टी किसी भी तरह से ICU में लेटे रहकर बस स्वयं के जिन्दा होने का प्रमाण देना चाह रही है कि आज नहीं तो कल इसके अच्छे दिन आएँगे। हालाँकि, अच्छे दिनों के लिए उन्हें परिवारवाद की लालसा से बहार निकला ही होगा लेकिन ये काम अहंकार में डूबे हुए राजनीति के इस खानदान विशेष के लिए संभव नहीं है।

एक और जनता का नेता खड़ा है और अगर कॉन्ग्रेस सोच रही है कि वंशवाद के हथियार से वो इस महामानव का मुकाबला कर पाएगी, तो यह बहुत ही बचकानी बात होगी। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि जनता इस स्नेह से आखिरी बार खुद को सिर्फ महात्मा गाँधी से ही जोड़ पाई थी। यदि गाँधी आजादी से पहले के महामानव थे, तो नरेंद्र मोदी आजादी के बाद के महामानव हैं।

फ़िलवक़्त, प्रियंका गाँधी को वाराणसी से चुनाव न लड़वाकर कॉन्ग्रेस ने एक तरह से ‘इंदिरा गाँधी 2.0’ फिल्म के फ्लॉप होने की घोषणा कर दी है। एक आखिरी सवाल जरूर बनता है कि क्या प्रियंका गाँधी जैसी दिखने वाली उनकी दादी इंदिरा भी इसी तरह से मोदी के सामने मैदान छोड़कर भाग जातीं, जिस तरह से ‘इंदिरा 2.0’ भागी हैं? जवाब एक ही है, “मोदी है, तो मुमकिन है।”

एक नजर मीडिया गिरोह विद्यालय के ‘कुलपतियों’ द्वारा की गई उन तमाम क्यूट कोशिशों पर, जो नाकाम रहीं


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