Saturday, June 12, 2021
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लेफ्ट मीडिया नैरेटिव के आधार पर लैंसेट ने PM मोदी को बदनाम करने के लिए प्रकाशित किया ‘प्रोपेगेंडा’ लेख, खुली पोल

लैंसेट ने बिना भारतीय शासन व्यवस्था को समझे एक ऐसा लेख प्रकाशित किया है जो वर्तमान मोदी सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना के उद्देश्य से ही लिखा गया है। लैंसेट जर्नल द्वारा प्रकाशित यह लेख सीधे तौर पर राजनैतिक उद्देश्यों से प्रेरित दिखता है न कि चिकित्सकीय।

मेडिकल क्षेत्र के जर्नल लैंसेट ने शनिवार (08 मई) को एक लेख प्रकाशित किया जहाँ भारत में कोरोना वायरस संक्रमण के बढ़ते संक्रमण का पूरा ठीकरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर फोड़ दिया गया। हालाँकि, यह पहली बार नहीं है जब लैंसेट ने भारत की वर्तमान सरकार का विरोध किया हो। इसके पहले लैंसेट कश्मीर से अनुच्छेद 370 के उन्मूलन का विरोध भी कर चुका है।

अपने लेख में लैंसेट जर्नल ने भारत सरकार से यह माँग की है की सरकार कोरोना वायरस से संबंधित सभी आँकड़े सत्यता के साथ प्रकाशित करें और संक्रमण को रोकने के लिए सम्पूर्ण लॉकडाउन जैसे उपायों पर विचार करे। हालाँकि संक्रमण की रफ्तार पर लॉकडाउन का कितना असर होता है, यह निश्चित तौर पर कहा नहीं जा सकता है।

भारत में इस समय अधिकांश आबादी या तो आंशिक लॉकडाउन या पूर्ण लॉकडाउन में पहले से ही है। विशेषज्ञ भी इस बात से सहमत नहीं हैं कि लॉकडाउन के कारण संक्रमण में बहुत ज्यादा कमी आ सकती है। उदाहरण के लिए 19 अप्रैल को दिल्ली में लॉकडाउन किया गया। 1 मई को दिल्ली में संक्रमण की दर 31.10% थी जो शनिवार (08 मई) को 23.34% पहुँच गई। हालाँकि विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली में संक्रमण में कमी का प्रमुख कारण हो सकता है दूसरी लहर की पीक का आना जो कि दिल्ली में आ चुकी है।  

लैंसेट जर्नल के प्रकाशित किए गए लेख की एक सबसे बड़ी समस्या है उसके द्वारा दिए गए आँकड़ों के सोर्स। भारत में होने वाली मौतों के संबंध में अनुमान व्यक्त करने के लिए लैंसेट द्वारा इंस्टिट्यूट ऑफ हेल्थ मैट्रिक्स एण्ड इवैल्यूएशन (IHME) के आँकड़ों का उपयोग किया गया है जिसने 1 अगस्त तक भारत में 1 मिलियन से अधिक मौतों का अनुमान लगाया है।

सोर्स : IHME

IHME के आँकड़े बिल्कुल भी विश्वसनीय नहीं दिखते है क्योंकि IHME ने अनुमान लगाया की भारत में Covid-19 के कारण सितंबर 2020 में 195,135 मौतें हो चुकी हैं जबकि वास्तविकता में मौतों की संख्या लगभग 66,000 ही थी। वर्तमान आँकड़ों की बात करें तो IHME के अनुसार कोरोना वायरस के संक्रमण के कारण होने वाली मौतें 734,238 हैं जबकि अधिकारिक आँकड़ों के अनुसार यह संख्या 242,362 ही है।

इसका मतलब यह है कि IHME का अनुमान तीन गुना है। इस हिसाब से IHME ने अगस्त तक भारत में सबसे बुरी स्थिति में 1.6 मिलियन मौतों, सबसे अच्छी स्थिति में 1.3 मिलियन मौतों और वर्तमान परिस्थितियों के हिसाब से 1.46 मिलियन मौतों का अनुमान लगाया है। IHME ने तो नवंबर 2020 में रोजाना 1000 मौतों का अनुमान व्यक्त किया था जबकि उस समय भारत में संक्रमण की दर कम हो रही थी। 

लैंसेट जर्नल में प्रकाशित लेख के लिए पत्रकार अनु भूयन के लेख को भी आधार माना गया है। भूयन के उस लेख में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा की गई रैलियों का जिक्र था लेकिन बाकी रैली करने वालों का कोई वर्णन नहीं था। हालाँकि, भूयन के लेख में स्पष्ट तौर पर प्रधानमंत्री मोदी या केंद्र सरकार को भारत में कोरोना वायरस के संक्रमण के लिए दोषी नहीं ठहराया गया लेकिन उस लेख में यह जरूर कहा गया की 2021 के प्रारंभ में भारत में यह धारणा प्रबल रूप से प्रचारित हुई थी कि भारत ने कोरोना वायरस संक्रमण पर जीत हासिल कर ली है और लोगों में हर्ड इम्यूनिटी विकसित हो गई है।

लैंसेट जर्नल ने अनु भूयन के इस लेख को भी एक सोर्स के रूप में प्रकाशित किया और बताया कि यदि भारत में इस प्रकार के विचार प्रचारित हो रहे थे तो मोदी सरकार ही इस राष्ट्रीय आपदा की जिम्मेदार होगी।  

लैंसेट जर्नल में दूसरे सोर्स के तौर पर ब्लूमबर्ग के लेख का जिक्र किया गया है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के तीन पहलू हैं। पहला है कि इस लेख में 18 से 45 वर्ष की आयु के लोगों के लिए टीकाकरण कार्यक्रम शुरू करने से भीड़ की स्थिति निर्मित हो गई है। हालाँकि की मीडिया समूहों द्वारा यह माँग की जा रही थी कि भारत में 18 से 45 वर्ष की आयु के लोगों के लिए टीकाकरण शुरू कर देना चाहिए लेकिन जब यह शुरू कर दिया गया तो अब यह आरोप लगाया जा रहा है कि इससे भीड़ उत्पन्न हो रही है।

लेख का दूसरा पहलू यह है कि इसमें विपक्षी पार्टियों द्वारा शासित राज्यों की शिकायत है कि महामारी से सीधे निपटने की बजाय सारा भार राज्यों पर स्थानांतरित कर दिया गया है। जबकि सच तो यह है कि यही राज्य महामारी से निपटने के लिए अधिक शक्तियों की माँग कर रहे थे।

ब्लूमबर्ग के लेख का तीसरा पहलू हरिद्वार के कुम्भ मेला से जुड़ा हुआ है। ब्लूमबर्ग ने भीड़ इकट्ठी करने के लिए कुम्भ मेला का तो जिक्र किया लेकिन महीनों से चल रहे किसान आंदोलन पर कुछ भी कहने से बचता रहा। हालाँकि, यह सभी को ज्ञात है कि ब्लूमबर्ग मात्र एक प्रोपेगेंडा फैलाने वाला मीडिया हाउस है।

लैंसेट जर्नल में अल-जजीरा और न्यूयॉर्क टाइम्स का भी जिक्र किया गया है। अल-जजीरा ने जहाँ यह कहकर उत्तर प्रदेश सरकार की आलोचना की कि सरकार उन अस्पतालों को धमका रही है जो ऑक्सीजन की कमी पर आवाज उठाना चाहते हैं। हालाँकि उत्तर प्रदेश सरकार ने ऐसी ही खबरों के बारे में कहा था कि अफवाह फैलाने वालों पर कार्रवाई की जाएगी। इसके अलावा जब मोदी सरकार ने ट्विटर से फेक न्यूज हटाने के लिए कहा था तब न्यूयॉर्क टाइम्स ने प्रोपेगंडा चलाया था कि मोदी सरकार महामारी पर नियंत्रण करने के स्थान पर आलोचना को दबा रही है।  

इससे यह साफ पता चलता है कि लैंसेट ने बिना भारतीय शासन व्यवस्था को समझे एक ऐसा लेख प्रकाशित किया है जो वर्तमान मोदी सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना के उद्देश्य से ही लिखा गया है। लैंसेट जर्नल द्वारा प्रकाशित यह लेख सीधे तौर पर राजनैतिक उद्देश्यों से प्रेरित दिखता है न कि चिकित्सकीय।  

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K Bhattacharjee
Black Coffee Enthusiast. Post Graduate in Psychology. Bengali.

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