‘प्लीज़ GDP वाली वीडियो पूरी देखो’ कहने वाले रवीश-भगत जब चलाते हैं PM मोदी की अधूरी क्लिप

आदर्श लिबरल, रवीश का पूरा वीडियो ढूँढकर लाना चाहते थे, ताकि 'आधी सच्चाई' की जगह 'पूरी सच्चाई' सामने लाई जा सके। अब वही लिबरल पीएम मोदी की इसरो वैज्ञानिकों से मुलाक़ात के वीडियो का एक संस्करण लेकर मैदान में उतरे हैं ताकि...

सोशल मीडिया ने राजनीति को एक अध्याय और प्रयोग से उठाकर सड़क पर ला पटका है। अब इसका कोई नीयत सिलेबस नहीं है ना ही यह कुछ गिने-चुने लोगों की चर्चा तक सीमित रह गया है। बीते समय के राजनीति के महान चिंतक अगर आज होते तो राजनीति को सोशल ट्रेंड्स का हिस्सा बनता देख जरूर अपने हाथ पीछे खींच लेते।

यह बुरा भी नहीं है कि लोग पिछली लोकसभा चुनाव के बाद से राजनीतिक रूप से खूब सक्रिय हुए हैं। इंटरनेट और तकनीक ने हर व्यक्ति को यह अधिकार उपलब्ध करवाया है कि वह समसामयिकी से सिर्फ प्रभावित ही न हो बल्कि उस पर अपनी राय भी रख सके। लेकिन यह सब बहुत आपा-धापी में हुआ है।

राजनीति में पक्ष और विपक्ष अब आम आदमी का भी व्यक्तिगत मुद्दा बन गया है। यह हास्यास्पद तब हो जाता है जब दूसरे पक्ष को भक्त, मूर्ख और बेहूदा साबित करने वाले खुद किसी दिन उसी विषय को भुनाता हुआ नजर आता है।

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देखा जाए तो प्रोपेगेंडा का मुख्य उद्देश्य दूसरे विचार को निर्जीव साबित करना ही होता है। लेकिन इस उद्देश्य की सबसे बड़ी बेईमानी इसमें किसी से भी किसी तरह की शालीनता और राहत की उम्मीद करना होता है। इस खेल में पक्षधर कभी शिकार होते हैं तो कभी शिकारी होते हैं।

हाल ही में NDTV के प्रोपेगेंडा पत्रकार रवीश कुमार का एक वीडियो सोशल मीडिया पर खूब शेयर किया जा रहा था। इस वीडियो में एक ही रवीश कुमार एक ही GDP के आँकड़ों पर दो तरह के बयान देते हुए नजर आ रहे थे। इस वीडियो पर लोगों ने रवीश कुमार के लिए अल्ताफ राजा के वो गाने भी याद दिलाए जिसमें पिछले दशक के मशहूर गायक गाते थे- “वो साल दूसरा था, ये साल दूसरा है।” रवीश के इस वीडियो से लोगों के कॉन्सेप्ट जीडीपी पर तो गड़बड़ा गए लेकिन रवीश को लेकर एकदम स्पष्ट होने लगे।

यह सब अपनी आँखों के सामने घटित होता देखकर रवीश-भगत मंडली ने तुरंत अपनी-अपनी पोजीशन ली और सत्यान्वेषी पत्रकार रवीश कुमार का साल 2013 का पूरा वीडियो पोस्ट करने की माँग की। जीडीपी वाले इस वीडियो को बिना डेंगू के इतना वायरल होता देख रवीश-भगत फूट-फूटकर रोए। और आखिर में कुछ सच्चे कर्तव्यनिष्ट सेवक उस पूरे वीडियो को लाकर उसकी समीक्षा करते हुए नजर आने लगे तब जाकर कहीं रवीश-भगत मण्डली की जान में जान आई। हालाँकि यह ‘पूरा वीडियो’ तब भी रवीश की एक ही जीडीपी की दो परिभाषों के बेच तालमेल बैठाने में असफल ही रहा।

समय करवट बदलता है और कुछ दिन बाद चंद्रयान 2 राष्ट्रीय मुद्दा बन जाता है। अब सोशल मीडिया पर हम देखते हैं कि वही आदर्श लिबरल, जो रवीश का पूरा वीडियो किसी भी हाल में ढूँढकर लाना चाहते थे, ताकि ‘आधी सच्चाई’ की जगह ‘पूरी सच्चाई’ सामने लाई जा सके, पीएम मोदी को उनकी इसरो (ISRO) वैज्ञानिकों से मुलाक़ात के वीडियो का एक संस्करण लेकर मैदान में उतरते हैं।

चंद्रयान-2 की लैंडिंग से सम्बंधित कुछ निराशाजनक ख़बरों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इसरो वैज्ञानिकों का हौंसला बढ़ाने वाला वीडियो लोकप्रिय होने लगा। चंद्रयान-2 की ‘विफलता’ की खबरों से उत्साहित लेफ्ट-लिबरल वर्ग की खुशियाँ ज्यादा देर तक नहीं बनी रह सकीं। इसके बाद शुरू हुआ इस देश के लेफ्ट लिबरल्स का प्रलाप और प्रपंच।

पीएम मोदी द्वारा इसरो वैज्ञानिकों की पीठ थपथपाने और उनका हौंसला बढ़ाने वाले वीडियो की काट के लिए मीडिया गिरोह और उनके अनुयायियों ने इस वीडियो के अलग-अलग चरण सोशल मीडिया पर पूरी सामर्थ्य के साथ पोस्ट करने शुरू कर दिए।

आज मीडिया गिरोह का मुद्दा चंद्रयान से ज्यादा मोदी की छवि को ख़राब करना था। इनके अन्नदाता राहुल गाँधी चुनावों से पहले कुछ इसी तरह की कसम खाते नजर आए थे कि उनकी जिंदगी का मात्र एक ही मकसद है- नरेंद्र मोदी की छवि खराब करना। और सबसे बड़ी बात ये कि यही मीडिया गिरोह अक्सर शिकायत करता नजर आता है कि देश में घटने वाली किसी भी घटना में नरेंद्र मोदी आखिर कैसे सबसे मुख्य चेहरा बन जाते हैं?

इन अलग-अलग वीडियो के जरिए यह साबित करने का प्रयास सोशल मीडिया पर तेजी से किया जा रहा है कि पीएम मोदी कैमरा के सामने वैज्ञानिकों से अलग तरह से बर्ताव करते हैं और कैमरा हटने के बाद दूसरी तरह से। यहाँ पर यही लेफ्ट-लिबरल विचारक वर्ग चाहता है कि मोदी इसरो वैज्ञानिकों को गले लगाएँ और फिर कभी छोड़ें ही नहीं। लेफ्ट-लिबरल विचारक वर्ग यहाँ तक कहते देखा जा रहा है कि आखिर वैज्ञानिक रो कैसे सकता है या फिर भावुक कैसे हो सकता है?

अब विषय पर वापस आकर हमें पता चलता है कि मोदी की छवि को खराब करने की कोशिश करने वाले वही लोग हैं जो रवीश कुमार की जीडीपी वाली क्लिप से परेशान और बदहवास नजर आ रहे थे। ये वही लोग हैं जो ऑड दिवस पर ‘मीडिया की पारदर्शिता’, ‘फेक न्यूज़’ जैसे मुहावरे उछालते हैं और इवन दिवस पर खुद इन्हीं हथकंडों को अपना रहे होते हैं।

चंद्रयान मिशन के ‘फेल’ होने पर वैज्ञानिकों के भावुक होने पर प्रश्न करने वाले लोगों की राय में भावुक होने का अधिकार सिर्फ दैनिक सस्ते इंटरनेट से विज्ञान के ही आविष्कार मोबाइल-इंटरनेट द्वारा देश की हर दूसरी घटना पर अपनी विचारधारा और प्रोपेगेंडा का जहर उगलने वालों तक ही सीमित होना चाहिए।

दरअसल, इन लोगों की कोई विचारधारा नहीं है। इनका मुद्दा पीएम मोदी की छवि से ही घृणा होना बन चुका है। इस घृणा में ये लोग इतने आगे निकल चुके हैं कि अब ये मीडिया गिरोह हर उस आदमी से नफरत करता है जो नरेंद्र मोदी से जुड़ा हुआ है या फिर मोदी का समर्थन करता है। लोगों का यही समूह हर उस संस्थान, व्यक्ति, घटना से नफरत करते हुए नजर आता है जो किसी भी तरह से मोदी के समर्थन में नजर आता है। यह मात्र कहने की बात नहीं बल्कि यही लोग इस तथ्य को खुद साबित करते आए हैं।

इस प्रगतिशील लेफ्ट-लिबरल विचारक वर्ग ने सुप्रीम कोर्ट से लेकर डिस्कवरी चैनल तक से नफरत जाहिर की है और कारण स्पष्ट है कि किसलिए! इन लोगों ने भारतीय सेना की कर्तव्यनिष्ठा और क्षमता तक पर सवाल करने शुरू किए जब यह पीएम मोदी के साथ खड़े नजर आई। यह वर्ग हर उस मीडिया और विचार से नफरत करता है, जो मोदी को एक अच्छी छवि में दिखाता है।

विरोध को ही अपना स्वर बताने वाला यह पक्ष हमेशा एक समानांतर निंदा में सिमट कर रह गया है और यही वजह है कि यह देशवासियों के निशाने पर आ गया है। बदले में यह वर्ग अपनी कुंठा निकालत हुए उसे ‘ट्रोल’ और ‘भक्त’ होने की गालियाँ देता है। असल में यह प्रगतिशील लेफ्ट-लिबरल वर्ग का कभी भी सकारात्मक विचार था ही नहीं। यह वर्ग मात्र निंदा और घृणा से पैदा हुआ कुंठित लोगों का एक समूह है। अब विचार करने की जरूरत यह है कि आखिर इस वर्ग का यह नकाब कब तक इन्हें सच्चाई से दूर रख पाता है।

हाल ही में कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम नरेश और शशि थरूर ने यही बात रखी थी कि हर मामले में नरेंद्र मोदी को खलनायक बना देने वाले लोगों को आत्मचिंतन की जरूरत है। अब ‘पूरी सच्चाई’ माँगने वाले ‘आधी सच्चाई’ शेयर करते हुए जब भी देखे जाएँ तो जरूर स्मरण करें कि क्या ऐसा करने से पहले उन्होंने आत्मचिन्तन किया है? वह यह भी खुद फैसला करें कि कहीं भक्त, ट्रोल और गोदी मीडिया, इन सभी विशेषणों के पहले हकदार वो खुद ही तो नहीं?

नरेंद्र मोदी और इसरो वैज्ञानिकों से मुलाक़ात का वह वीडियो, जिसके जरिए सत्यान्वेषी विचारक अपना ध्येय सिद्ध करते हुए अपनी नंगई का उदहारण पेश करते नजर आ रहे हैं –


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