Sunday, May 16, 2021
Home विचार राजनैतिक मुद्दे वामपंथियों का खोखलापन, लिब्रहान रिपोर्ट की इन बातों पर साध लेते हैं चुप्पी

वामपंथियों का खोखलापन, लिब्रहान रिपोर्ट की इन बातों पर साध लेते हैं चुप्पी

रिपोर्ट में कहा गया है कि बँटवारे के बाद 'सर्वश्रेष्ठ' नेतृत्व भी साम्प्रदायिकता उखाड़कर फेंकने में फेल हो गई। आज़ादी के बाद नेताओं ने हिन्दुओं और मजहब विशेष के बीच खाई को मिटाने की कोई बड़ी कोशिश नहीं की।

6 दिसंबर 1992 को उत्तर-प्रदेश के अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढहा दिया गया। घटना के 10 दिन बाद पीवी नरसिम्हाराव के नेतृत्व वाली तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार ने मामले की जाँच के लिए लिब्रहान आयोग का गठन किया था। इसके बाद 17 साल तक चली मामले की जाँच के बाद आयोग ने अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंप दी थी।

लिब्रहान की इस रिपोर्ट ने भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर ढाँचा गिराने के मामले में उंगली उठाई गई थी। यही वजह है कि लिबेरल्स के लिए यह एक पसंदीदा विषय है, मगर इस रिपोर्ट के कई अन्य पहलुओं को वे देखकर भी अनदेखा कर देते हैं। अपनी इस रिपोर्ट में जस्टिस लिब्रहान ने जो लिखा है, उसमें से बहुत कुछ ऐसा है जिस पर लोकतंत्र की दुहाई देने वाला कोई भी लिबरल सहमत नहीं होता। जबकि दूसरी तरफ उन बातों से पूरा इत्तेफाक रखता है, जिन्हें वह भुनाना चाहता है।

रिपोर्ट के मुताबिक यह एक ऐतिहासिक तर्क है कि हिन्दू और मजहब विशेष, दोनों के ही रिश्ते हमेशा से ही तनावपूर्ण रहे हैं। अपनी रिपोर्ट में लिब्रहान ने माना है कि इस घटना के बाद हिन्दू समाज के भीतर हिन्दू राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से लेकर हिन्दू राष्ट्र की संकल्पना सुदृढ़ होती चली गई।

अपनी इस रिपोर्ट में लिब्रहान ने ज़ोर दिया है कि हिंदुत्व के बढ़ने में भले हिन्दू और मजहब विशेष के सांप्रदायिक तनाव का योगदान रहा हो मगर इसे पूर्णतः सच नहीं कहा जा सकता। दरअसल हिंदुत्व की ताकत दुनिया भर में उभरते हुए देश हैं। जबकि यह तनाव धार्मिक समुदायों के बीच आपसी संबंधों की स्थिति से तय हुआ है।

जस्टिस लिब्रहान ने अपने आयोग की रिपोर्ट में यह स्वीकार किया था कि देश में आज़ादी के पहले भी हिन्दू और दूसरे समुदाय के बीच तनाव था। दोनों समुदायों के बीच की यह कड़वाहट हाल-फिलहाल में नहीं बनी बल्कि लम्बे समय से चली आ रही है।

दोनों समुदायों के बीच तनाव बढ़ने के उच्चतम स्तर पर जाने के बाद पाकिस्तान बनने जैसे हालात हुए। पाकिस्तान ने खुद को एक इस्लामिक देश घोषित कर दिया। अपना संवैधानिक स्वरुप भी वैसा ही बना लिया जबकि विविधताओं का सम्मान करते हुए भारत ने खुद को एक सेकुलर, बहु-धार्मिक देश बनाया जहाँ कई क्षेत्र और कई राज्य अस्तित्व में आए। रिपोर्ट में कहा गया कि पार्टीशन के ज़ख्म आज भी लोगों के अन्दर जिंदा हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि ऐसी घटनाएँ भयावह थीं और शायद कभी भुलाई न जा सकें।

कमीशन की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि बँटवारे के बाद सर्वश्रेष्ठ नेतृत्व भी साम्प्रदायिकता उखाड़कर फेंकने में फेल हो गई। आगे चलकर जाति, धर्म और क्षेत्र इसी साम्प्रदायिकता का कारण बने। आज़ादी के बाद नेताओं ने हिन्दुओं और मुसलामानों के बीच खाई को मिटाने की कोई बड़ी कोशिश नहीं की।

लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट में माना गया है कि भगवान राम का जन्म अयोध्या में ही हुआ था। अपनी इस रिपोर्ट में हिन्दू धर्म ग्रन्थ रामायण के आधार पर लिब्रहान कमीशन ने इस राम और अयोध्या दोनों के अस्तित्व को स्वीकार किया है। वहीं उन वामपंथी इतिहासकारों से पूछा जाना चाहिए कि जिस लिब्रहान आयोग का हवाला वे देते हैं, इस रिपोर्ट के राम और अयोध्या को मानने के बावजूद वे दोहरा रवैय्या क्यों रखते हैं।

रिपोर्ट ने कहा है कि बाबरी मस्जिद एक्शन कमिटी में एक भी मजहब विशेष का शख्स शामिल नहीं था जबकि इस कमिटी का गठन ही तब हुआ था जब मंदिर का ताला खोलकर हिन्दुओं को पूजा करने के लिए इजाज़त दी गई थी।

दरअसल यह बात किसी से छिपी नहीं है कि लिबरल अक्सर समुदाय विशेष से ज़हर उगलने वाले नेताओं को बढ़ावा देते आए हैं। इनमें जमा मस्जिद के शाही इमाम जैसे शामिल हैं जिन्होंने 1987 में खुले-आम दंगे भड़काने की बात कही थी। वहीं रिपोर्ट में शहाबुद्दीन ओवैसी (असदुद्दीन ओवैसी के पिता) का भी नाम है जिसने गणतंत्र दिवस के बहिष्कार का भी ऐलान किया था।

आयोग भले आम आदमी की भागीदारी से इनकार करे मगर रामजन्म भूमि आन्दोलन एक बहुत ही व्यापक आन्दोलन था, इस तथ्य से कतई इनकार नहीं किया जा सकता। देश की राजनीति पर किसी भी आन्दोलन का इतना प्रभाव नहीं पड़ा जितना कि देश की राजनीति पर इस मुद्दे से पड़ा।

लिहाज़ा आयोग का यह कहना पूरी तरह से गलत है कि इस आन्दोलन में आम आदमी की कोई भागीदारी थी ही नहीं। यह एक तथ्य है जो सभी को ज्ञात है कि राम मंदिर के लिए इस आन्दोलन में आम आदमी ने बढ़-चढ़कर भूमिका निभाई थी। जन्मभूमि के अन्दोलन में जनसमर्थन इस हद तक था कि लोगों को संभालने में सेकुलर सरकार की मशीनरी खुद ही फेल हो गई।

मीडिया खुद अपनी भूमिका पर उठने वाले सवालों पर चुप्पी साध लेता है। आयोग की इस रिपोर्ट में मीडिया की गैर-जिम्मेदाराना रिपोर्टिंग पर टिप्पणी की गई है। लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट में तमाम झुकावों के बावजूद यह भी साफ़ हो गया कि मीडिया ने अहम तथ्यों को अपनी रिपोर्टिंग से ही गायब कर दिया। वहीं आयोग की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाना लाजिमी है क्योंकि व्यापक जनसमर्थन वाले इस आन्दोलन में कमीशन ने तो जनता के होने से ही इनकार कर दिया था।

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K Bhattacharjee
Black Coffee Enthusiast. Post Graduate in Psychology. Bengali.

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