Tuesday, June 25, 2024
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दुर्घटना का शिकार होते शिक्षक, क्लास में बेहोश होती छात्राएँ, बेंच-बोरिंग-बैग घोटाला, न गर्मी छुट्टी-न होली की… क्या शिक्षा व्यवस्था का और दम घोंट रहे KK पाठक?

शिक्षकों ने हमसे बात करते हुए बताया कि शिक्षकों का वेतन न काटने पर जिला के पदाधिकारियों का वेतन कटता है, इसीलिए वो भी मज़बूरी में शिक्षकों का वेतन काटते हैं। शिक्षकों का कहना है कि ग्रामीण इलाकों में वाहन जल्दी नहीं मिलते, ऐसे में हल्का-फुल्का लेट हो जाता है। उनका कहना है कि इसी कारण शिक्षक दुर्घटना का भी शिकार हो रहे हैं।

बिहार के मुजफ्फरपुर में एक सरकारी शिक्षक को गिरफ्तार कर लिया गया, क्योंकि उसने छात्रों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वोट न देने के लिए कहा था। इसे चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन बताया गया। जिला शिक्षा अधिकारी की शिकायत पर FIR दर्ज की गई। मामला कुरहनी ब्लॉक के अमरख स्थित सरकारी माध्यमिक विद्यालय का है और उक्त शिक्षक का नाम हरेंद्र रजक है। उक्त शिक्षक ने मोदी को वोट न देने की अपील करते हुए कहा कि राशन योजना के तहत जो खाद्यान्न मिल रहा है वो उपयोग के लायक नहीं है।

वैसे ये सही बात है कि बिहार में लंबे समय तक स्कूल अव्यवस्था से बहाल रहे, न इंफ़्रास्ट्रक्चर की सुविधा थी, न बच्चे आते थे और न शिक्षक पढ़ाते थे। लेकिन, व्यवस्था में सुधार के नाम पर सिर्फ एक वर्ग पर नियम-कानून लादना और बाकी चीजों को ऐसे ही छोड़ देना कहाँ तक उचित है? बिहार के कुछ गाँवों में जान शिक्षक अच्छे थे, वहाँ 80-90 के दशक में भी अच्छी पढ़ाई होती थी। लेकिन, धीरे-धीरे हालात बिगड़ते गए और जैसे जैसे अपराध और जंगलराज का बोलबाला बढ़ा, पलायन बढ़ा, स्कूलों की स्थिति भी बदतर होती चली गई।

मुजफ्फरपुर में शिक्षक को किया गिरफ्तार, DM-DEO-थानेदार सब लगे

प्रशासन की तरफ से बताया गया है कि सरकारी कर्मचारियों का चुनाव के दौरान किसी पार्टी के पक्ष या विपक्ष में बोलना आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन है, इसीलिए ये गिरफ़्तारी हुई है। कक्षा के लड़के-लड़कियों ने भी इसकी पुष्टि की कि उक्त शिक्षक द्वारा मोदी को वोट न देने के लिए कहा गया। अभिभावकों को भी इससे नाराज़गी थी। मनियारी थानेदार उमाकांत सिंह ने गिरफ़्तारी की पुष्टि की। शिक्षक ने राशन को सड़ा-गला बताते हुए कहा था कि कमल छाप का बटन न दबाएँ।

ये मामला थोड़ा संदिग्ध भी लगता है। कक्षा में शिक्षक पढ़ाने के दौरान कई तरह की बातें करते हैं, वो सिर्फ अनुवादक नहीं होते। किसी विषय पर चर्चा होती है तो वो अपने व्यक्तिगत अनुभवों का जिक्र कर सकते हैं, किताबी ज्ञान के अलावा वास्तविक ज्ञान भी दे सकते हैं। हरेंद्र रजक उन शिक्षकों में हैं, जो सुबह 6 बजे स्कूल की टाइमिंग किए जाने का विरोध कर रहे हैं। क्या इसी कारण BEO ने तुरंत शिकायत दर्ज करा दी, थानेदार ने FIR लिख कर गिरफ्तार कर लिया और DM तक को बयान देना पड़ा?

क्या एक शिक्षक द्वारा क्लास में राजनीतिक टिप्पणी कर देना इतना बड़ा मामला है कि जिसमें DEO, DM और थाना प्रभारी को लगा दिया जाए? वो भी उस बिहार में, जहाँ अपराध अब भी थम नहीं रहे हैं। ये वही मुजफ्फरपुर है जहाँ पिछले साल प्रॉपर्टी डीलर आशुतोष शाही की 2 बॉडीगार्ड्स समेत और इस साल उनके भाई की हत्या कर दी गई। फरवरी 2024 में दुकान की उद्घाटन के दौरान ही पिता-पुत्र दोनों को मार डाला गया। ये सब छोड़ कर पुलिस-प्रशासन एक शिक्षक पर कार्रवाई करने को लगा है।

बिहार में शिक्षकों को किया जा रहा प्रताड़ित, KK पाठक से नाराज़गी

बिहार में आजकल एक नाम बड़ा सुर्ख़ियों में है – KK पाठक। केक पाठक के फरमानों को ‘तुगलकी’ बताया जाता है। कभी वो होली जैसे त्योहार पर शिक्षकों को विद्यालय आने का आदेश दे देते हैं, तो कभी वो बिहार के महापर्व छठ पर दी गई छुट्टी रद्द कर देते हैं। कई बार बिहार के शिक्षा विभाग को विरोध के कारण अपने फैसले वापस लेने होते हैं, उसकी फजीहत होती है। KK पाठक बिहार के शिक्षा विभाग में एडिशनल चीफ सेक्रेटरी हैं, नामी IAS अधिकारी रहे हैं।

अब ताज़ा मामला देखिए। उन्होंने फरमान जारी किया है कि गर्मियों में शिक्षकों को सुबह 6 बजे विद्यालय पहुँचना होगा। स्कूल अब सुबह 6 बजे से दोपहर डेढ़ बजे तक खुल रहे हैं। यानी, शिक्षकों को सुबह 4-5 बजे के बीच जागना होता है। फिर उन्हें इस गर्मी में चिलचिलाती धूप में दोपहर को वापस लौटना होता है। शिक्षकों की जब नींद ही पूरी नहीं होगी तो वो क्या पढ़ाएगा? ऊपर से गर्मी के कारण उनका स्वास्थ्य बिगड़ेगा तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?

सबसे अधिक समस्या महिला शिक्षकों को हो रही है। कई शिक्षिकाएँ अपने घर में भोजन पका कर स्कूल के लिए निकलती हैं। अगर खाना बनाने में 1 घंटे का समय भी मान लें तो महिलाओं को 3-3:30 के करीब उठना होगा। वो उठ कर घर की साफ़-सफाई करेंगी, खाना बनाएँगी, नहा-धो कर तैयार होंगी और फिर स्कूल के लिए निकलेंगी। KK पाठक को समझना चाहिए कि शिक्षक भी एक आम मनुष्य ही हैं, नौकरी के अलावा भी उनका व्यक्तिगत जीवन है, परिवार है, नौकरी का मतलब ये नहीं है कि इनकी कीमत पर वो नौकरी करें।

एक शिक्षक की तस्वीर वायरल हुई है। इस सामूहिक तस्वीर में दिख रहा है कि उन्होंने अपने दोनों पाँव में अलग-अलग चप्पल पहने हुए हैं। स्पष्ट है, सुबह उठ कर स्कूल पहुँचने की हड़बड़ी में ये गलती हुई होगी। नियम बना दिया गया है कि सुबह उठ कर सवा 6 में सभी शिक्षक अपनी ग्रुप फोटो और रजिस्टर में उपस्थिति के रिकॉर्ड भेजें। तस्वीर में देखा जा सकता है कि उक्त शिक्षक के एक पाँव में जहाँ खाकी रंग की चप्पल है, वहीं दूसरे पाँव में शायद उन्होंने नीले रंग की कोई लेडीज चप्पल पहन ली है।

ऐसा नहीं है कि जो भाजपा समर्थक हैं उन्हें KK पाठक से नाराज़गी नहीं है क्योंकि बिहार सरकार में BJP भी शामिल हैं। उदाहरण के लिए स्कूलों की नई टाइमिंग को लेकर भाजपा के MLC जीवन कुमार को ही सुन लीजिए, जो कहते हैं कि शिक्षक बुद्धिजीवी वर्ग है ऐसे में इसके साथ मजदूरों वाला व्यवहार मानसिक प्रताड़ना है। उन्होंने पूछा कि तड़के अँधेरे में महिलाएँ निकलेंगी और कोई अनहोनी हुई तो KK पाठक जिम्मेदारी लेंगे? लोकसभा चुनाव 2024 के बीच उन्होंने KK पाठक को चेताया कि वो सरकार को बदनाम करने का प्रयास न करें।

भाजपा के विधान पार्षद जीवन कुमार ने कहा कि KK पाठक ऐसे-ऐसे फरमान जारी कर रहे हैं क्योंकि उनका परिवार नहीं है, उनके बाल-बच्चे नहीं हैं और ऐसे में वो परिवार चलाने वालों की समस्या को नहीं समझ पा रहे हैं। जीवन कुमार का कहना है कि KK पाठक जनप्रतिनिधियों का इम्तिहान ले रहे हैं। उनकी बातों से लगता है कि भाजपा भी फ़िलहाल चुनाव के कारण चुप है, चुनाव बाद कुछ कदम उठाए जाएँगे। KK पाठक को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का पसंदीदा अधिकारी माना जाता है।

KK पाठक भले IAS अधिकारी हैं, लेकिन शायद उन्हें बिहार के ग्रामीण भूगोल का नहीं पता। उन्होंने फरमान जारी कर दिया कि बच्चे अपने पंचायत के हाईस्कूल में ही पढ़ेंगे। जबकि बिहार में ये संभव है कि घर के पास जो स्कूल है वो दूसरे पंचायत में आता हो। यानी, बच्चे कई किलोमीटर दूर जाएँ पढ़ने लेकिन पास के स्कूल में नहीं पढ़ सकते। इस कारण 9वीं में छात्राएँ एडमिशन लेने से बच रही हैं। इस कदम से शिक्षक नहीं, बल्कि अभिभावक भी नाराज़ हुए।

बिहार: ये कैसा ‘सुधार’ जहाँ घोटाले ही घोटाले

सुधार का तो स्वागत होना चाहिए। लेकिन, बिहार की शिक्षा व्यवस्था में ये कैसा सुधार हो रहा है जहाँ घोटाले ही घोटाले हो रहे हैं? उदाहरण के लिए, बिहार में बेंच-डेस्क खरीद के लिए 900 करोड़ रुपए का बजट लाया गया, प्राइवेट कंपनियों को इसका टेंडर दिया गया। लेकिन, हो क्या रहा है? बेंच-डेस्क ऐसे हैं कि कुछ ही दिन छात्र उस पर बैठ रहे हैं और वो टूट जा रहा है। बैग वितरण, किताब वितरण और किट वितरण तक में घोटालों की खबर है।

शिक्षकों ने हमें बताया कि 2500 रुपए में एक अच्छा बेंच-डेस्क खरीदा जा सकता है, लेकिन कई जगह इसके लिए दोगुनी राशि तक चुकाई जा रही है। ये हवा-हवाई बातें नहीं हैं, जमुई के एक स्कूल में 2100 रुपए के बेंच-डेस्क के लिए 2900 रुपए खर्च किए गए। ये पैसा किन लोगों के पॉकेट में जा रहा है? कई स्कूलों के भवन तक नहीं हैं, वहाँ बेंच-डेस्क भेजे जा रहे हैं लेकिन बाहर रखे-रखे खराब हो रहे हैं। बच्चों के बैठते ही बेंच टूट रहे हैं। KK पाठक को हर एक सप्लाई की जाँच करा लेनी चाहिए, इसका पता चल जाएगा।

यहाँ तक कि राजधानी पटना में भी स्थिति ठीक नहीं है। चिरैयाटाँड राजकीय कृत उच्च माध्यमिक विद्यालय में घटिया बेंच-डेस्क की सप्लाई की शिकायत सामने आई तो इसकी जाँच की गई, BEO की जाँच में ये आरोप सही निकला। तत्पश्चात सप्लाई करने वाली उस एजेंसी को ब्लैक लिस्ट में डाला गया। लेकिन, इससे क्या हो गया? जो घोटाला होना था वो कर लिया गया। अब क्या इसके लिए भी शिक्षकों का ही वेतन काटा जाएगा? वहाँ 50 में सब के सब बेंच-डेस्क टूट गए। अब एक बेंच-डेस्क पर 3 की जगह 2 बच्चों को ही बैठने के लिए कहा जा रहा है।

घटिया लकड़ी से बचे बेंच-डेस्क सप्लाई किए जा रहे हैं। एजेंसी ने ढाई लाख रुपए के बिल पर उक्त स्कूल के प्रधानाध्यापक से हस्ताक्षर भी करा लिया था। अकेले पटना में 68,000 बेंच-डेस्क की सप्लाई हुई, सोचिए घोटाला कितने बड़े स्तर का है। स्कूलों में इसी तरह समरसेबल बोरिंग और हैंडवॉश स्टेशन लगाने का भी आदेश है, इसमें भी लाखों का घोटाला हो रहा है। यहाँ हम सुपौल का उदाहरण देकर बात शुरू करते हैं। वहाँ यहाँ न निविदा निकाली गई, न कोटेशन जारी किया गया, सीधा ठेकेदारों को काम दे दिया गया।

इसके लिए भी विभिन्न विभाग आपस में लड़ते हुए एक-दूसरे पर दोषारोपण कर रहे हैं। HM विभाग और शिक्षा विभाग एक-दूसरे को दोष दे रहा है। कई जगह काम अधूरा पड़ा हुआ है। प्रति स्कूल समरसेबल और पानी टंकी लगाने के लिए 1.91 लाख रुपए का खर्च तय किया गया था, लेकिन शिक्षकों में दबी जुबान से चर्चा है कि इसमें 5 लाख रुपए तक खर्च किए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि अधिकारी अपने चाहते ठेकेदारों में सब बाँट दे रहे हैं। हेडमास्टरों को नियमों की जानकारी ही नहीं है, उन्हें फुसरत कहाँ हाजिरी बनाने से।

इसी तरह का कुछ पूर्वी चम्पारण में भी हुआ है। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो शुद्ध पेयजल योजना को लूट योजना बना दिया गया है। घटिया सामग्रियाँ और पाइप लगाई जा रही हैं। मोतिहारी के शिक्षकों ने बताया कि या तो छुट्टी के दिन या फिर रात में जानबूझकर काम किया जाता है, ताकि उनका घोटाला पकड़ा न जाए। अरेराज में तो रातोंरात घटिया बोरिंग डाल दी गई। 1500 रुपए की जगह 500 रुपए की पाइप का इस्तेमाल किया जा रहा है। एक BEO ने बताया कि उन्हें इन कार्यों की जानकारी तक नहीं है।

यहाँ तक कि घटिया माल लगाने की अगर कोई शिकायत की जाती है तो परेशान किया जाता है। पूर्वी चम्पारण के भी कई प्रखंडों में बिना चयन के ही संवेदक द्वारा काम किया जा रहा है। आइए, लगे हाथ मुजफ्फरपुर का हाथ भी बता देते हैं। वहाँ भी प्रशासनिक स्तर पर अनियमितताओं की जाँच चल रही है। वहाँ भी यही आरोप – घटिया समाग्रियों का इस्तेमाल। पश्चिम चम्पारण के शनिचरी में तो ग्रामीणों ने ही आक्रोशित होकर काम रोक दिया।

किट घोटाले के बारे में अब क्या ही बात करें, इसे तो लालू यादव के चारा घोटाला से भी बड़ा बताया जा रहा है। सोचिए, बच्चों को दी जाने वाली साधारण बैग, पेंसिल, औजार बॉक्स समेत अन्य छोटी-मोटी चीजों में भी स्कैम हो रहा है। शिक्षकों ने हमें बताया कि 200-250 रुपए की किट के लिए 1000-1500 रुपए तक भुगतान किए जा रहे हैं। किट की गुणवत्ता ठीक नहीं है, वो घटिया हैं। कई स्कूलों में कम बैग मिले, सवाल पूछने पर मुँह बंद रखने की धमकी दी गई।

ये सब तो छोड़िए, KK पाठक के बारे में इसीलिए भी कहा जा सकता है कि अपने विभाग के अधिकारियों को दुरुस्त करने की बजाए वो शिक्षकों की प्रताड़ना वाले फरमान जारी कर रहे हैं, क्योंकि छुट्टियों से लेकर एरियर और प्रमोशन तक के लिए हर विभाग में रेट तय है। बक्सर के स्कूलों में 60% बच्चे किट से वंचित रह गए, ये पैसे कहाँ गए? इसी तरह पटना में भी 100 बच्चों के बीच मात्र 5 बैग मिले। क्या इसके लिए भी शिक्षकों की छुट्टी काटी जाएगी या उनका वेतन?

क्या कहते हैं आक्रोशित शिक्षक, बात-बात पर हो रही कार्रवाई

बिहार में शिक्षकों के इस आक्रोश का खामियाजा भाजपा को भी भुगतना पड़ सकता है, क्योंकि ऐसा माहौल बनेगा कि भाजपा सत्ता में रहने के बावजूद कोई कदम नहीं उठा रही है। इन फरमानों की जगह अगर क्लासरूम के इंफ़्रास्ट्रक्चर को सुधारने और बच्चों की उपस्थिति-दर को बढ़ाने पर जोर दिया गया होता तो कोई बात होती। सैकड़ों स्कूलों में बेंच-डेस्क तक गड़बड़ हैं। गर्मी से छात्राएँ बेहोश हुई हैं। शिक्षिकाओं को बासी रोटी और फ़ास्ट फूड खाकर पढ़ाना पड़ रहा है। हड़बड़ी में शिक्षकों की दुर्घटना भी हो सकती है।

हमने इस संबंध में बिहार के कुछ शिक्षकों से भी बातचीत की, जिन्होंने अपनी समस्याओं के बारे में बताया। इन शिक्षकों का कहना है कि सुबह 6 बजे आने की हड़बड़ी में दुर्घटनाएँ हो रही हैं। असल में उनका कहना है कि 5:45 तक उन्हें स्कूल में उपस्थित रहना पड़ता है, क्योंकि हाजिरी बनाने में जरा भी देर हुई तो उसके लिए भी उस दिन अनुपस्थित मान कर वेतन काट लिया जाता है। शिक्षकों का कहना है कि पदाधिकारियों को निर्देश है कि हर दिन शिक्षकों का वेतन काटा जाए।

उक्त शिक्षकों ने बताया कि उन्हें आदेश दिया गया है कि अगर कोई छात्र 3 दिन विद्यालय नहीं आते हैं तो उनका नाम काट कर हटा दिया जाए। शिक्षकों का कहना है कि ये 2009 के RTE (शिक्षा का अधिकार) कानून का उल्लंघन है, क्योंकि आप किसी भी बच्चे को शिक्षा से वंचित नहीं कर सकते, उसका नाम काट कर स्कूल से नहीं हटा सकते। परीक्षा में हिस्सा में न लेने पर उसे फेल किया जा सकता है, नाम नहीं काटा जा सकता। शिक्षकों का कहना है कि नए फरमानों से बच्चों को भी परेशानी है।

शिक्षकों ने हमसे बात करते हुए बताया कि शिक्षकों का वेतन न काटने पर जिला के पदाधिकारियों का वेतन कटता है, इसीलिए वो भी मज़बूरी में शिक्षकों का वेतन काटते हैं। शिक्षकों का कहना है कि ग्रामीण इलाकों में वाहन जल्दी नहीं मिलते, ऐसे में हल्का-फुल्का लेट हो जाता है। उनका कहना है कि इसी कारण शिक्षक दुर्घटना का भी शिकार हो रहे हैं। मुंगेर के बरियारपुर प्रखंड में तो शिक्षकों को 5:45 तक पहुँचने का आदेश दिया गया और 6:15 तक उन्हें तस्वीरें भेजने को कहा गया।

शिक्षकों का कहना है कि एक-एक मिनट इस तरह से गिना जाना ठीक नहीं हैं। एक और बड़ा मुद्दा है गर्मियों की छुट्टी। स्कूलों में गर्मी की छुट्टियाँ सामान्यतः जून-जुलाई में दी जाती रही है, लेकिन इस बार KK पाठक के आदेशानुसार अप्रैल महीने में ही गर्मी की छुट्टियाँ दे दी गईं और उनमें भी शिक्षकों को उपस्थित करने को कहा गया, साथ ही पढ़ाई में कमजोर बच्चों को भी उपस्थित रहने के लिए कहा गया। शिक्षकों का पूछना है कि अगर मई में ठंडी की छुट्टी दे दी जाए तो कैसा लगेगा?

इसी तरह अगर स्कूल में 90% बच्चे उपस्थित नहीं रहते हैं तो इसके लिए भी शिक्षकों का वेतन काटे जाने का आरोप लगा है। शिक्षकों ने बताया कि छात्राओं में एनीमिया की कमी हो जाती है, दूर पैदल या साइकिल से कड़ी धूप में स्कूल से लौटने के चक्कर में उनकी स्थिति खराब हो जाती है। बच्चों को लू लग रहा है, वो बेहोश होते हैं। दोपहर के 1 बजे सबसे अधिक तापमान रहता है। जब अन्य कर्मचारियों को गर्मी छुट्टियाँ नहीं मिलतीं तो शिक्षकों को क्यों मिलनी चाहिए? इसके जवाब में शिक्षक अन्य सरकारी कर्मियों को मिलने वाले साल में 33 EL (अर्जित अवकाश) उन्हें एक भी नहीं मिलते।

शिक्षकों का कहना है कि वो मजदूर नहीं हैं, बच्चों को रोचक तरीके से पढ़ाने के लिए उन्हें घर पर पहले खुद पढ़ना पड़ता है और जो विषय पढ़ाया जाना है उसकी तैयारियाँ करनी पड़ती है। उन्होंने कहा कि घर पर भी उन्हें नौकरी के लिए समय देना होता है, ऐसे में स्कूल जाकर सीधे पढ़ा देने में दिक्कत आती है और इससे पढ़ाई में व्यवधान आता है। शिक्षक NEP 2020 (नई शिक्षा नीति) का भी हवाला देते हैं, जिसके तहत उन्हें सप्ताह में 29 घंटे पढ़ाने और माह में 2 शनिवार की छुट्टी का आदेश है, जबकि उनसे हफ्ते में 45 घंटे काम कराया जा रहा है।

देश में हर प्रकार के कर्मियों के अपने-अपने संघ हैं, लेकिन शिक्षकों पर बिहार में मामूली बातों पर कार्रवाई की जा रही है। उनका कहना है कि संघ बनाने, सोशल मीडिया पर कुछ शेयर करने या फिर अपनी आवाज़ उठाने के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शनों तक से उन्हें वंचित रखा गया है। व्हाट्सएप्प पर कुछ शेयर करने पर भी कार्रवाई कर दी जाती है। अपने मुद्दों से संबंधित किसी फेसबुक पोस्ट को लाइक करने पर भी कार्रवाई हो जाती है। शिक्षक इसे मानसिक प्रताड़ना बताते हैं।

कई शिक्षकों का कहना है कि वो फ़ास्ट फ़ूड खा-खा कर पढ़ा रहे हैं, शहरों के स्कूलों में सुबह-सुबह 6 बजे बच्चे नहीं आ पाते और यहाँ तक कि गाँवों में भी बच्चे भोजन कर के स्कूल नहीं आ रहे हैं। इससे उनकी तबीयत बिगड़ रही है। गर्मी में भूखे पेट रहने के कारण चमकी बुखार जैसी बीमारियों का खतरा रहता है जिससे बिहार पहले भी जूझता रहा है। शिक्षकों का कहना है कि बच्चों को लंच में कुछ मिल भी गया तो शिक्षक दिन भर भूखे ही रह जाते हैं, जो बैचलर हैं उनके लिए और समस्या है क्योंकि उन्हें भोजन खुद पकाना पड़ता है।

दुर्घटना का शिकार हो रहे शिक्षक, स्वास्थ्य पर पड़ रहा असर

सुबह-सुबह 5 बजे निकलना और दोपहर के 2 बजे घर पहुँचना, इस चक्कर में शिक्षकों की दिनचर्या और उनका स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है। आइए, हाल के दिनों में हुई घटनाओं को उदाहरण के साथ समझते हैं ताकि ये बातें हवा-हवाई न लगे। मधुबनी के लौकहा थाना क्षेत्र के डूबरबोना गाँव में 52 वर्षीय शिक्षक मोहम्मद मुजक्कर हुसैन सड़क हादसे में घायल हो गए। अररिया के त्रिवेणीगंज-पिपरा मार्ग में स्थित गंभीरपुर गाँव लहरनियाँ निवासी शिक्षिका बाइक से गिर कर घायल हो गई।

कुछ ऐसे वीडियो भी सामने आए हैं जिनमें स्कूलों में बच्चे सुस्त दिख रहे हैं, उन्हें नींद आती है। अकेले भागलपुर प्रमंडल की बात करें तो 10 महीने में 1303 शिक्षकों का वेतन कटा है। गया के मोहनपुर ब्लॉक में एक शिक्षक सड़क दुर्घटना में घायल हुआ। सीवान के पूरबपट्टी बलेथा गाँव में दलित समाज की एक छात्रा बिना भोजन किए स्कूल आने की वजह से बेहोश हो गई। वहीं रघुनाथपुर के दयाछपरा में एक शिक्षिका बेहोश हो गई। इसकी भी जाँच होती है कि शिक्षक कक्षा की पूर्व तैयारी कर के आए हैं या नहीं। उन्हें चुनावी ड्यूटी में भी लगाया जाता है।

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