Wednesday, July 24, 2024
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कॉन्ग्रेस के इस मर्ज की दवा नहीं: ‘श्वेत पत्र’ में तलाश रही ऑक्सीजन, टूलकिट वाली वैक्सीन से खोज रही उपचार

कॉन्ग्रेस नेताओं को यह समझने की आवश्यकता है कि वैकल्पिक नीति और दुष्प्रचार दो अलग-अलग बातें हैं। कोरोना पर नियंत्रण पाने के लिए चलाया जा रहा टीकाकरण अभियान लगभग हर मायनों में पहले चलाए गए ऐसे किसी भी अभियान से पूरी तरह से भिन्न है।

वृहद टीकाकरण अभियान के पहले दिन (21 जून 2021) 86 लाख से अधिक लोगों को टीके दिए गए। इसमें एनडीए शासित राज्यों का योगदान अधिक रहा। यदि आँकड़ों को देखें तो पाएँगे कि एनडीए शासित सात बड़े राज्यों का हिस्सा 60 प्रतिशत से भी अधिक था। संख्या को देखते हुए यह निश्चित रूप से एक उपलब्धि थी और इसकी सराहना उपलब्धि के तौर पर ही हुई।

दूसरे दिन यह संख्या लगभग 54 लाख की रही जो निश्चित तौर पर पहले दिन की अपेक्षा कम थी पर इतनी भी कम नहीं थी कि वरिष्ठ कॉन्ग्रेसी नेताओं द्वारा इसका मजाक उड़ाया जाए। पर यहाँ कॉन्ग्रेस नेताओं की बात हो रही है। ऐसे में यह अपेक्षा शायद उचित नहीं थी। चिदंबरम ने ट्वीट कर अभियान के पहले दो दिनों में टीकाकरण के आंकड़ों पर फब्ती कसते हुए लिखा, “रविवार को जमा करो, सोमवार को टीकाकरण करो और फिर मंगलवार को उसी स्थिति में लौट आओ। यही एक दिन में टीकाकरण का विश्व कीर्तिमान स्थापित करने के पीछे का राज है।”

चिदंबरम के ये ट्वीट पढ़कर आश्चर्य नहीं होता। जबसे कोरोना आया है, उसका सबसे अधिक प्रभाव कॉन्ग्रेसी नेताओं पर ही दिखाई दिया है। ये कभी कहते हैं कि इन्हें देशी टीकों पर विश्वास नहीं है तो कभी पूछते हैं कि देशी टीकों को बाहर क्यों भेजा गया? कभी कहते हैं कि राज्य सरकारों को टीके खरीदने और टीकाकरण की नीति बनाने की स्वायत्तता दी जाए तो स्वायत्तता मिलने के बाद कहते हैं कि केंद्र सरकार ने अपनी जिम्मेदारियों से मुँह मोड़ लिया।

केंद्र द्वारा राज्यों के साथ लगातार रखे गए संवाद के बावजूद कॉन्ग्रेसी नेता यह कहने में जरा भी समय नहीं लगाते कि मोदी सेकंड वेव का पूर्वानुमान लगाने में विफल रहे। जैसे किसी वायरस द्वारा संक्रमण की नहीं बल्कि किसी समुद्री तूफ़ान के पूर्वानुमान की बात कर रहे हैं। इन्हें कोरोना की रोकथाम के लिए बने टीके और पोलियो की दवा में फर्क नज़र नहीं आता। इनके लिए सब धान बाइस पसेरी है। ये आँकड़ों को अपने मनमुताबिक पेश करते हुए नहीं हिचकिचाते। संक्रमण सम्बंधित आँकड़े ये संख्या में व्यक्त करेंगे पर टीके से सम्बंधित आँकड़े प्रतिशत में। ये सरकार के आँकड़े नहीं मानते पर यह भी चाहते हैं इन्हें जिम्मेदार विपक्ष माना जाए। 

पिछले एक वर्ष में जब भी लगा कि इनकी माँगों पर विमर्श के पश्चात सरकार ने उन्हें मान लिया, ये नई माँगों के साथ सामने आते रहे। सरकार द्वारा उठाए गए हर कदम से असंतुष्ट दिखे। इनके नेता राहुल गाँधी ने प्रधानमंत्री पर ‘अपने दोस्त पूनावाला’ को लाभ पहुँचाने तक का आरोप लगाया। दूसरी लहर के समय टूलकिट आधारित दुष्प्रचार चलाने के इनके कर्म किसी से छिपे नहीं हैं। नए टीकाकरण अभियान के तहत पहले दिन के टीकाकरण के बाद जब सब सरकार की सराहना कर रहे थे तभी ये एक तथाकथित श्वेत पत्र लेकर खड़े हो गए।

श्वेत पत्र के बारे में बात करते हुए इनके नेता राहुल गाँधी ने सरकार पर जो आरोप लगाए वे वही सारे आरोप थे जो वे लगाते आए हैं। जिनका कोई आधार नहीं है। एक तरफ तो कहते रहे कि सरकार का विरोध नहीं कर रहे और दूसरी तरफ विरोध छोड़कर और कुछ नहीं किया। ऊपर से यह दावा करते रहे कि ये विशेषज्ञों से बात करते हैं, क्योंकि सरकार विशेषज्ञों से बात नहीं करती और जो कुछ भी करती है वह अपने मन से करती है। जाहिर है कि ऐसी बचकानी बात राहुल गाँधी से ही आ सकती है। 

कॉन्ग्रेस नेताओं को यह समझने की आवश्यकता है कि वैकल्पिक नीति और दुष्प्रचार दो अलग-अलग बातें हैं। कोरोना पर नियंत्रण पाने के लिए चलाया जा रहा टीकाकरण अभियान लगभग हर मायनों में पहले चलाए गए ऐसे किसी भी अभियान से पूरी तरह से भिन्न है। इन कॉन्ग्रेसी नेताओं को यह समझने की भी आवश्यकता है कि सरकार यदि सक्रिय न रहती तो समय पर भारत में टीकों से संबंधित अनुसंधान, ट्रायल और उसके पश्चात उनका उत्पादन न हो रहा होता। ऐसे में जब ये नेता कहते हैं कि सरकार विशेषज्ञों से बात नहीं करती तब ये हास्यास्पद दिखाई देते हैं।

इस अभियान का दूसरा पहलू यह है कि इसकी तुलना पल्स पोलियो के लिए चलाए गए अभियान से नहीं की जा सकती। पोलियो संक्रमण से फैलने वाली बीमारी नहीं है। ऐसे में केंद्रों पर बच्चों को दवा पिलाने के बाद इतनी देर तक नहीं रखा जाता जितनी देर तक कोरोना के टीके देने के बाद रखा जाता है। आज चल रहे टीकाकरण अभियान में एक केंद्र पर कितने लोग आ सकते हैं, उस संख्या का निर्धारण भी एक चुनौती है। कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए विश्व भर के देश आज सबसे अधिक टीके पर निर्भर दिखाई दे रहे हैं। संक्रमण की गति रोकने का यही सबसे ठोस तरीका भी लगता है।

समस्या यह है कि टीके की उपलब्धता सीमित है। उसके उत्पादन की गति को बढ़ाए जाने की अपनी सीमा है। ऐसे में समय पर टीका मिलना सबसे बड़ी चुनौती है। ऐसे में बार-बार यह आरोप लगाना कि सरकार टीका खरीदना नहीं चाहती या यह कहना कि समय पर टीके का ऑर्डर देने से ही समस्या हल हो जाती, एक तथ्यहीन बात लगती है। अमेरिका ने टीके का ऑर्डर सबसे पहले दिया था पर प्रश्न यह है कि उसे क्या सारे टीके समय पर या फिर एक बार में ही मिल गए थे? यूरोपियन यूनियन ने जितने टीकों का ऑर्डर दिया था, उसे यदि वे सारे डोज मिल गए होते तो आज उन देशों में टीकाकरण की हालत इतनी खराब न होती। ऐसे में यह कहना कि टीके का ऑर्डर देने से ही समय पर उसकी उपलब्धता पक्की हो जाती, एक आधारहीन बात है।

विपक्ष में बैठी कॉन्ग्रेस और उसके नेताओं को अब स्वीकार कर लेना चाहिए कि वे विपक्ष में हैं। उन्हें यह भी समझना चाहिए कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष द्वारा दी जाने वाली वैकल्पिक नीति पर विमर्श का रास्ता तभी खुलेगा जब उस नीति का ठोस आधार होगा। यह समझना मुश्किल नहीं रहना चाहिए कि विपक्ष की वैकल्पिक नीति पर लोग तभी बात करेंगे जब नीति तर्कसंगत होगी। ऊपर से यह बात शांतिकाल के दौरान अर्थव्यवस्था या प्रशासन पर एक वैकल्पिक मॉडल पर शायद आसानी से लागू हो सकती है पर महामारी काल में तर्कहीन वैकल्पिक मॉडल पर विश्वास करना नागरिकों के लिए आसान नहीं होगा। खासकर, तब और नहीं जब इस वैकल्पिक मॉडल को प्रस्तुत करने का काम राहुल गाँधी कर रहे हों। 

यहाँ एक और बात आवश्यक है। बात यह है कि तथ्य के विकल्प के रूप में प्रोपेगेंडा कभी साधन नहीं बन सकता। ऐसे में जब चिदंबरम केवल एनडीए शासित राज्यों के आँकड़े संलग्न कर ट्वीट करते हैं, तब उसे पढ़ने वाला व्यक्ति खुद से अवश्य पूछेगा कि इन्होने कॉन्ग्रेस शासित राज्यों के आँकड़े क्यों नहीं दिए? तब उनका यह प्रयास अपना उद्देश्य खो देगा। ऐसे में कॉन्ग्रेस हर विषय पर राजनीति न करके अपना ही भला करेगी। उसे और उसके द्वारा गढ़े गए इकोसिस्टम को स्वीकार करना चाहिए कि महामारी काल में प्रोपेगेंडा और टूलकिट दुष्प्रचार के काम आ सकते हैं, लोकतांत्रिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में सहायक नहीं हो सकते। 

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