Saturday, September 26, 2020
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ईसाई नहीं बनने की सजा… 34000 वैष्णव हिंदुओं को अपने ही देश में 23 साल रहना पड़ा शरणार्थी बन कर!

1997 में विस्थापित होने के बाद से ही भारत सरकार ब्रू-रियांग परिवारों के स्थायी पुनर्वास के प्रयास करती रही है। कई सरकारें आईं लेकिन समस्या का कोई हल नहीं निकला, शरणार्थियों की पीड़ा समाप्त नहीं हुई। फिर दिन आता है 16 जनवरी 2020 का, जब...

16 जनवरी, 2020 को नई दिल्ली में भारत सरकार, त्रिपुरा और मिज़ोरम सरकार तथा ब्रू-रियांग (Bru-Reang) प्रतिनिधियों के बीच एक समझौता हुआ है। इस समझौते के अनुसार लगभग 34,000 ब्रू शरणार्थियों को त्रिपुरा में ही बसाया जाएगा। साथ ही उन्हें सीधे सरकारी तंत्र से जोड़कर राशन, यातायात, शिक्षा आदि की सुविधा प्रदान कर उनके पुनर्वास में सहायता प्रदान की जाएगी। अभी तक ब्रू नाम सुनते ही ब्रू (Bru) कॉफ़ी की एक ब्रैंड का ही चित्र सामने आता था परन्तु जानकार आश्चर्य हुआ कि ये एक जन-समुदाय है, जो अपने ही देश में गत 22-23 वर्षों से शरणार्थी के रूप में जीवन यापन कर रहे थे।

कैंपों के जीवन का अर्थ यह था कि उन्हें सभी बुनियादी सुविधाओं से वंचित रहना पड़ा। 23 वर्षों तक उनके पास न घर था, न जमीन, अपने परिवारों के लिए न चिकित्सा मिलती थी, न उपचार होता था और उनके बच्चों को अभी तक कोई शैक्षिक सुविधा प्राप्त नहीं हुई। ये किसी दूसरे देश से नहीं आए थे बल्कि अपने ही देश के अपने ही लोग हैं, जिनको अपने ही राज्य मिज़ोरम को छोड़कर त्रिपुरा में बसना पड़ा। कश्मीरी पंडितों जितनी ही दर्दनाक कहानी है ब्रू लोगों की। जिनको अपनी आस्थाओं, मान्यताओं के साथ समझौता न करने की कसौटी पर हर क्षण डर, हिंसा, अमानवीयता, मौत और अंततः पलायन करना पड़ा।

आखिर कौन हैं ये ब्रू ? भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र के मूल निवासी रिआंग (Bru or Reang) जन-समुदाय जो मुख्यतः त्रिपुरा, मिज़ोरम, असम तथा बांग्लादेश के चटगाँव पहाड़ी क्षेत्र में रहते हैं। रियांग समाज वैष्णव हिन्दू हैं। मिजोरम में मिजो के बाद अल्पसंख्यक समुदायों में रिआंग-ब्रू लोगों की संख्या सबसे अधिक है। कृषि उनका मुख्य व्यवसाय है तथा अत्यन्त राष्ट्रवादी हैं, इनकी संस्कृति काफी उन्नत एवं परिष्कृत है। मिजोरम में मिज़ो बहुसंख्यक हैं अत: अपना सर्वाधिपत्य स्थापित करने के लिए सभी को मिजो/ईसाई बनाना चाहते हैं।

रियांग अपनी संस्कृति के उपासक तथा धर्म में अटूट विश्वास रखने वाले हैं, अतः वे इस मिजोकरण के लिए तैयार नहीं हुए। दोनों की संस्कृति, भाषा, वेशभूषा तथा धार्मिक मान्यताओं आदि में अंतर होने के कारण मिज़ो ने रियांग को “ब्रू” नाम दिया और यह जन-धारणा विकसित कि ब्रू यहाँ के मूल निवासी नहीं है। मिजोकरण, ईसाईकरण तथा चर्च प्रायोजित धर्म-परिवर्तन को स्वीकार न करने के कारण मिज़ो इनके खिलाफ रहते हैं। इसी कारण दोनों में तनाव बना रहता है।

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सुनियोजित भेदभावपूर्ण नीति का प्रयोग कर उन्हें न केवल अलग-थलग कर दिया गया, बल्कि उन्हें जंगलों से जलाऊ लकड़ी इकट्ठा करने से भी रोका गया, उन्हें राशन से वंचित कर दिया और उनके बच्चों को स्कूलों से बाहर रखा। परिणाम यह है कि वे अपने मौलिक अधिकारों का प्रयोग करने से लगातार वंचित रहे हैं। राज्य प्रायोजित हिंसा का परिणाम यह रहा कि रिआंग को मिजोरम से विस्थापित होकर त्रिपुरा तथा अन्य राज्यों में अस्थायी शिविरों में शरण लेनी पड़ी।

ब्रू और मिज़ो समुदाय के बीच संघर्ष का पुराना इतिहास रहा है। 1990 के दशक में, रिआंग ने अपने ऐतिहासिक उत्पीड़न और राजनीतिक बहिष्कार को व्यक्त करते हुए, अपनी तीन मांगे रखीं- 1) ऑल इंडिया रेडियो, आइज़ॉल में रिआंग-ब्रू कार्यक्रम को शामिल करना 2) सरकारी सेवाओं में उनके लिए नौकरियों का आरक्षण 3) विधान सभा में उनके प्रतिनिधियों का नामांकन और रिआंग-ब्रू के लिए एक स्वायत्त जिला परिषद का निर्माण।

मजे की बात यह है कि हालांकि मिज़ोरम में रिआंग-ब्रू दूसरी सबसे बड़ी आबादी है, बावजूद इसके एडीसी के लिए उनकी माँग अनसुनी हो गई । वर्ष 1995 में ब्रू समुदाय द्वारा स्वायत्त ज़िला परिषद की माँग और चुनावों में भागीदारी के अन्य मुद्दों पर ब्रू और मिज़ो समुदाय के बीच तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई। सितंबर 1997 में, बीएनयू ने मिज़ोरम के पश्चिमी बेल्ट में संविधान की छठी अनुसूची के अनुसार रिआंग के लिए उसी स्वायत्त जिला परिषद (एडीसी) की माँग करने के लिए एक प्रस्ताव अपनाया। इस माँग के खिलाफ मिजो की प्रतिक्रिया ने बड़े पैमाने पर हिंसा को भड़का दिया। उनकी माँग को न केवल मिज़ो समुदाय के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने खारिज किया, बल्कि उनकी माँगों को दबाने के लिए उनके खिलाफ बड़े पैमाने पर हिंसा की।

मिज़ो जन-समूह, नौकरशाही, पुलिस और अन्य शक्तिशाली समूह सभी रियांग समुदाय को स्थायी रूप से नष्ट करने को आतुर थे। आपसी झड़प के बाद ‘यंग मिज़ो एसोसिएशन’ (Young Mizo Association) तथा ‘मिज़ो स्टूडेंट्स एसोसिएशन’ (Mizo Students’ Association) ने यह माँग रखी कि ब्रू लोगों के नाम राज्य की मतदाता सूची से हटाए जाए क्योंकि उनके अनुसार वे मूल रूप से मिज़ोरम के निवासी नहीं हैं। इसके बाद ब्रू समुदाय द्वारा समर्थित समूह ब्रू नेशनल लिबरेशन फ्रंट (Bru National Liberation Front-BNLF) तथा एक राजनीतिक संगठन (Bru National Union-BNU) के नेतृत्व में वर्ष 1997 में मिज़ो से हिंसक संघर्ष हुआ। परिणामत: वर्ष 1997 में नस्ली तनाव के कारण ब्रू-रियांग समाज को मिजोरम छोड़कर त्रिपुरा में शरण लेने पर मजबूर होना पड़ा। इन शरणार्थियों को उत्तरी त्रिपुरा के कंचनपुर में अस्थायी कैंपों में रखा गया था। उस समय लगभग 37,000 ब्रू लोगों को मिज़ोरम छोड़ना पड़ा।

इसके बाद मिजो के आतंक और ब्रू के पलायन की घटनाएँ समय-समय पर होती रही। ब्रू लोगों ने भी संगठनों का निर्माण कर अपने अधिकार तथा ससम्मान जीवन यापन के लिए संघर्ष करना शुरू कर दिया। सरकार भी उनकी शान्ति और ब्रू-पुनर्स्थापन के दिखावे के रूप में प्रयास करती दिखती भी रही। उसके लिए बहुत धन-खर्च भी किया 1997 के बाद से, केंद्र ने राहत और पुनर्वास के लिए त्रिपुरा को 348.97 करोड़ और मिजोरम को 68.90 करोड़ रुपए की वित्तीय सहायता दी। अप्रैल 2005 में, मिज़ोरम सरकार और बीएनएलएफ ने दशक के जातीय संकट को हल करने के लिए 13 दौर की वार्ता के बाद एक समझौता ज्ञापन (MOU) पर हस्ताक्षर किए। एमओयू में हालाँकि, आंतरिक रूप से विस्थापित ब्रू की समस्याओं को संबोधित नहीं किया गया था। इसने केवल बीएनएलएफ कैडरों के पुनर्वास का प्रयास किया।

मिजोरम सरकार ने एक बार फिर त्रिपुरा में रहने वाले विस्थापित ब्रू के बीच गहरी नाराजगी पैदा करने वाले बुनियादी मतभेदों को संबोधित किए बिना 16 अक्टूबर 2009 को ब्रू के प्रत्यावर्तन के लिए एकतरफा घोषणा की। उनकी इन प्रयासों को देख कुछ ब्रू लोगों ने प्रत्यावर्तन शुरू भी किया परन्तु मिजोरम में अपने घरों में रिआंग का पुनर्विस्थापन मुश्किल था। जब तक कि उन्हें सुरक्षा और सुरक्षा की भावना से आश्वस्त नहीं किया जाता है क्योंकि बड़े पैमाने पर जातीय हिंसा ने न केवल संरचनात्मक रूप से उनके आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संसाधनों को नुकसान पहुँचाया है, बल्कि इसने उन्हें मनोवैज्ञानिक रूप से भी आहत और अविश्वस्त किया है।

वर्ष 1997 में मिज़ोरम से त्रिपुरा में विस्थापित होने के बाद से ही भारत सरकार ब्रू-रियांग परिवारों के स्थायी पुनर्वास के प्रयास करती रही है। इस बीच कई सरकारें आईं लेकिन समस्या का कोई हल नहीं निकला और शरणार्थियों की पीड़ा समाप्त नहीं हुई। 3 जुलाई, 2018 को ब्रू-रियांग समुदाय के प्रतिनिधियों, त्रिपुरा और मिज़ोरम की राज्य सरकारों एवं केंद्र सरकार के बीच इस समुदाय के पुनर्वास के लिये एक समझौता किया गया था, जिसके बाद ब्रू-रियांग परिवारों को दी जाने वाली सहायता में बढ़ोतरी की गई। इस समझौते के तहत 5,260 ब्रू परिवारों के 32,876 लोगों के लिए 435 करोड़ रुपए का राहत पैकेज दिया गया। बच्चों की पढ़ाई के लिये एकलव्य स्कूल भी प्रस्तावित किये गए थे। इस समझौते में ब्रू परिवारों को मिज़ोरम में जाति एवं निवास प्रमाण-पत्र के साथ वोट डालने का भी अधिकार दिया जाना था। इस समझौते के बाद वर्ष 2018-19 में 328 परिवारों के 1369 लोगों को त्रिपुरा से मिज़ोरम वापस लाया गया। परंतु यह समझौता पूर्ण रूप से लागू नहीं हो सका क्योंकि अधिकतर विस्थापित ब्रू परिवारों ने मिज़ोरम वापस जाने से इनकार कर दिया।

नए वर्ष और नए दशक की अपनी पहली मन की बात में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि ब्रू-रियांग समझौते ने दो दशकों पुराने शरणार्थी संकट को समाप्त कर दिया है, जिसके कारण मिजोरम में 34000 से अधिक शरणार्थियों को मदद और राहत मिली है। उन्होंने कहा, “यह इस विश्वास का परिणाम है कि उनका जीवन आज एक नई सुबह की दहलीज पर खड़ा है। समझौते के अनुसार सम्मानित जीवन का रास्ता उनके लिए खुल गया है। आखिरकार 2020 का नया दशक ब्रू-रियांग समुदाय के जीवन में आशा की नई किरण लाया है।” अधिकांश ब्रू -रियांग परिवारों की यह माँग थी कि ब्रू समुदाय की सुरक्षा चिंताओं को देखते हुए त्रिपुरा में ही उनके पुनर्वास की व्यवस्था की जाए। यह समझौता बहुत विशिष्ट है और यह सहकारी संघवाद की भावना तथा भारतीय संस्कृति की निहित संवेदनशीलता और उदारता का परिचायक है।

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डॉ. सोनिया अनसूया
Studied Sanskrit Grammar & Ved from traditional gurukul (Gurukul Chotipura). Assistant professor, Sanskrit Department, Hindu College, DU. Researcher, Centre for North East Studies.

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