Friday, October 22, 2021
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यूनिफॉर्म सिविल कोड और जनसंख्या नियंत्रण कानून वक्त की जरूरत, क्योंकि उनका कोई विशेषाधिकार नहीं

कश्मीर हो या बंगाल या फिर देश के किसी भी हिस्से का गाँव या शहर, एक बार बहुमत में आते ही मुहम्मदवादी वहाँ शरिया लागू करना चाहते हैं।

बीते सप्ताह दो-तीन घटनाएँ बहुत महत्वपूर्ण हुईं। लेकिन दुर्भाग्य से भारत की तथाकथित मेनस्ट्रीम मीडिया में उसका कोई जिक्र या संज्ञान तक नहीं लिया गया। पहले तो मद्रास हाई कोर्ट के एक फैसले की बात। यह मुकदमा भी बहुत खौफनाक है, अगर हम इसके परिणामों पर विचार करें। तमिलनाडु के पेरुंबलूर में एक गाँव है कलाथुर। भारत के कई अन्य हिस्सों की तरह ही पहले यह गाँव भी हिंदू बहुल था और अब वहाँ मुहम्मदवादियों की संख्या अधिक हो गई है, वे बहुमत में हैं।

कश्मीर हो या बंगाल या फिर देश के किसी भी हिस्से का गाँव या शहर, एक बार बहुमत में आते ही मुहम्मदवादी वहाँ शरिया लागू करना चाहते हैं। उनकी मजहबी किताब में मूर्तिपूजा सबसे बड़ा शिर्क है, गुनाहे-अज़ीम है, तो उन्होंने कलाथुर के हिंदुओं के तीन मौजूदा मंदिरों और वहाँ के त्योहारों पर रोक लगानी चाही। वजह वही, जो तैमूर से बाबर और अकबर से औरंगजेब तक चली आ रही है- हिंदुओं का कन्वर्जन और निजाम-ए-मुस्तफा की शुरुआत।

उस गाँव के बहुसंख्यक मुहम्मदवादियों ने हिंदुओं के तीन दिनों तक चलनेवाले त्योहार पर इस आधार पर पाबंदी लगानी चाही कि उससे उनके ‘जज्बात’ घायल होते हैं। हमेशा की तरह हमारे प्रशासन ने (जो भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल की करामात से पर्याप्त हिंदू-विरोधी है) ने कुछ छोटी-मोटी पाबंदियाँ उत्सव पर लगा दीं। इससे मुहम्मदवादियों को और बल मिला और ‘ये दिल माँगे मोर’ की तर्ज पर उन्हें इस पर पूरी तरह से रोक चाहिए था।

मामला मद्रास हाईकोर्ट पहुँचा। माननीय मद्रास उच्च न्यायालय का बहुत-बहुत धन्यवाद कि उन्होंने लानत-मलामत करते हुए इस माँग को सिरे से खारिज कर दिया। उच्च न्यायालय ने कहा, “प्रत्येक समुदाय को दूसरों की भावनाओं का अपमान किए बिना धार्मिक जुलूस निकालने का मौलिक अधिकार है। क्षेत्र विशेष का बहुसंख्यक समूह दूसरे धर्म के लोगों को धार्मिक जुलूस निकालने या त्योहार मनाने से नहीं रोक सकता।”

अब दूसरी घटना पर चलते हैं। इजरायल ने हमास के आतंकी ठिकानों पर हमला किया है। ये घटना हजारों मील दूर हो रही है, लेकिन सबसे अधिक दर्द भारत के मुहम्मदवादियों को हो रहा है। देश भर में, सोशल मीडिया पर तो जो अरण्य-रोदन ये कर रहे हैं, सो तो ठीक ही है, बाकी जो लोग इजरायल के पक्ष में कुछ लिख रहे हैं, उनकी पिटाई भी कर रहे हैं। यूएई से एक ऐसा ही वीडियो वायरल भी हुआ था। अपने देश में भी जहाँ कहीं मुहम्मदवादी बहुसंख्या में हैं, वहाँ किसी को हिम्मत नहीं कि इजरायल के पक्ष में कुछ कह सकें। हमास के आतंकी भले ही कितने भी निर्दोषों की जान ले लें, बच्चों और महिलाओं के बीच छिप कर रॉकेट दागते रहें, वे इनके लिए गाजी थे और रहेंगे।

तीसरी और अंतिम घटना के तौर पर बंगाल में हिंदुओं के कत्ल, उत्पीड़न की घटनाओं को ले सकते हैं। राजनीति अपना काम करेगी, यह वर्ण्य विषय भी नहीं है। लेकिन इन तीन घटनाओं के सूत्र लेकर आगे के सबक, आगे की शिक्षा पर बात की जानी जरूरी है।

आतंकी हमास के पक्ष में खड़ा होना, बंगाल के हिंदुओं के विस्थापन-पलायन और मद्रास हाईकोर्ट में दाखिल याचिका को जोड़ने वाला सूत्र कौन सा है? वह कौन सी एक लड़ी है, एक धागा है, जो इन तीनों घटनाओं को पिरोता है? जाहिर तौर पर, वह मुहम्मदवाद है। इस देश का दुर्भाग्य रहा है कि जिस मजहब की वजह से इस देश के दो टुकड़े हो चुके हैं, बाकायदा मजहब के नाम पर एक टुकड़ा काटकर मुहम्मदवादियों ने पहले ही अलग ले लिया है, उसके बावजूद अब भी इस देश में मुहम्मदवाद पर, उसके तरीकों पर चर्चा नहीं होती, सब कुछ कालीन के नीचे बुहारा जाता है।

मुहम्मदवाद का सीधा सा लक्ष्य है- निजाम-ए-मुस्तफा यानी पूरी दुनिया में मुहम्मदवाद की स्थापना। इसके लिए वह उम्माह की सोचता है, ध्यान करता है, वह इसके लिए जरूरी टूल्स भी अपनाता है। जहाँ वह कम संख्या में हैं, विक्टिम हैं। बहुसंख्या में आते ही वे शरिया-शरिया चिल्लाते हैं। तलवार के जोर से, लालच और भय- सब मुहम्मदवाद के टूल हैं। यही वजह है कि तुर्की के लिए इस देश में आंदोलन हुआ, जबकि खुद तुर्की ने खिलाफत को खत्म किया। यहाँ अगर बाबरी ढाँचा ढहाया गया तो पाकिस्तान और बांग्लादेश में सैकड़ों मंदिर तबाह हुए। हिंदुओं की जान और संपत्ति गई। भारत में जो दंगे हुए, वह छोड़ ही दीजिए।

बीते साल सीएए को बहाना बनाकर (और एक ऐसे काल्पनिक एनआरसी को, जिसका कहीं अस्तित्व ही नहीं) दिल्ली में जिस तरह हिंदू-विरोधी दंगे हुए, वह हम सभी ने देखा है। उसी तरह, हमास के आतंकियों के खुले समर्थन में आने वाले यह नहीं बताते कि हमास ने जितने रॉकेट दागे हैं, वे इजरायल के नागरिकों पर और मुहम्मदवादियों के माहे-मुकद्दस में दागे गए।

भारत बहुत वर्षों से इस नासूर से ग्रस्त है। इससे निबटने का एक ही उपाय है कि मुहम्मदवादियों को यह समझा दिया जाए कि उनका कोई विशेषाधिकार नहीं है। यूनिफॉर्म सिविल कोड को जल्द से जल्द लागू किया जाए, साथ ही जनसंख्या नियंत्रण कानून भी। इसके अलावा हरेक स्तर पर मुहम्मदवादियों को यह बताने की जरूरत है कि इस देश का शासन संविधान से चलता है और चलता रहेगा, किसी शरिया से नहीं।

 

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स्वतंत्र पत्रकार || दरभंगा, बिहार

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