Sunday, December 6, 2020
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मौकापरस्त गठजोड़ों का दागदार इतिहास: वीपी सिंह से लेकर शिवसेना तक, जोड़-तोड़ में पिसती है जनता ही

भारत में जोड़-तोड़ की राजनीति नई नहीं है, मगर भारतीय राजनीति में ऐसी सरकारों की स्थिरता हमेशा सवालों के घेरे में रही है। दिल्ली से लेकर राज्यों की राजधानी तक, अगर बहुमत न हो, तो त्रिशंकु सरकारों ने देश की प्रगति अपने फैसलों और नीतियों के ज़रिए कितना ध्यान दिया यह एक प्रश्न चिन्ह है।

महाराष्ट्र में शिवसेना ने अपने घमंड को दर्शाते हुए सत्ता पाने की लालसा में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी भाजपा से गठबन्ध तोड़ दिया। इसके बाद शिवसेना ने उद्धव को मुख्यमंत्री बनाने के लिए एनसीपी और कॉन्ग्रेस की स्तुति में क्या कुछ नहीं किया? मगर अंत में जो हुआ वह यह बताने के लिए काफी है कि चुनाव बाद बनी कई दलों की मिली-जुली सरकार हमेशा ही जनता को ठगने में लग जाती है। ऐसी सरकार में जितने भी दल होते हैं सभी अपने-अपने मुनाफाखोरी धंधे में जुट जाते हैं।

देश ने आपातकाल के बाद पहली गठबंधन सरकार देखी, मगर कुछ ही समय में यह साफ हो गया कि इस सरकार में शामिल सभी दलों के ज़्यादातर लोग आपस में ही एक दूसरे की टाँग खींचने में लगे हैं। इतिहास गवाह है कि भारतीय राजनीति में गठबंधन के घटक दलों का उद्देश्य सत्ता होता है। यही वजह है कि 1977 की मोरारजी देसाई सरकार में अहम पद पर रहने के बावजूद चरण सिंह ने पीएम पद की लालसा के लिए 1979 में इस गठबंधन को तहस-नहस कर दिया, मगर पूर्ववर्ती सरकार की तरह यह भी उसी तरीके से ढह गई। बल्कि उससे भी कम।

इसके बाद साल 1989-91 के दौर में आई गठबंधन सरकारों का भी वही हाल हुआ। विश्वनाथ प्रताप सिंह से लेकर चंद्रशेखर की अगुवाई वाली सरकारों में भी कोई खास स्थिरता नहीं दिखी। देवेगौड़ा और गुजराल जैसे प्रधानमंत्रियों की सरकार गिराने में भी दलगत मतभेदों का बड़ा हाथ रहा। कालांतर में भी कॉन्ग्रेसी के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार में भी डीएमके के नेताओं पर भ्रष्टाचार के कई आरोप सामने आए। यह तमाम उदाहरण इस बात को साबित करने के लिए काफी हैं कि सरकार की व्यवस्था को चलाने के लिए गठबंधन की सरकारें जनहित से ज्यादा कुर्सी बचाए रखने के लिए समर्पित होती हैं। जनहित ही नहीं ,प्रशासन के मोर्चे पर भी अनेक दलों के गठबंधन की सरकार अक्सर विफल रहती हैं। ऐसे में कुर्सी की जोड़-तोड़ करने वाली पार्टियों के शासन में जनता ही पिसती है।

यह सच है कि एक समय महाराष्ट्र में बाला साहेब की तूती बोलती थी। एक इशारे पर मुंबई थम जाया करती थी। उनकी अगुवाई में शिवसेना का मानो एक छत्रराज चलता था। उनके न रहने के बाद ही इस मामले को लेकर शक गहरा गया था कि उनकी इस विरासत को सहेजने में उनकी अगली पीढ़ी और उसके कार्यकर्ता कितने सक्षम साबित होंगे। यह सच है कि शिवसेना ने अब वह हनक ही खो दी जिसके चलते वह सत्ता में बैठे को भी आँख दिखाने की ताकत रखती थी।

विचारधारा में अंतर न होते हुए भी जब 50-50 के फॉर्मूले पर शिवसेना ने भाजपा से गठबंधन तोड़कर एनसीपी और कॉन्ग्रेस जैसी पार्टियों संग विलय की जो उत्सुकता दिखाई, उसने जनता के सामने उसके सत्तालोलुप चरित्र को सामने लाकर रख दिया। ट्विटर पर #ShivsenaCheatsMaharashtra जैसे ट्रेंड किसी राजनीतिक दल नहीं बल्कि आम लोगों की भावनाएँ दर्शा रहे थे। महाराष्ट्र के लोगों के लिए यह उनके द्वारा शिवसेना को भरोसे पर दिए गए वोट का सौदा करने जैसा था।

जिस शिवसेना से जनता उम्मीदें लगाए बैठी थी, वही शिवसेना अगर एनसीपी जैसे दलों से अपनी पार्टी लाइन और विचारधारा को लेकर समझौता कर सकती है, सत्ता में बैठने के लिए अपने ही वोटरों के भरोसे का सौदा कर सकती है तो क्या इस बात का क्या भरोसा कि वह सत्ता में बैठकर जनहित का काम करे? स्वाभाविक है कि जिसके रहमोकरम पर सरकार चलेगी, उसके प्रति नतमस्तक रहना उसकी (शिवसेना की) अघोषित ज़िम्मेदारी रहेगी। देश और देश के राज्यों में मिली-जुली सरकारें राजनीतिक दलों के पेट भरने का एक ऐसा जरिया होती हैं जहाँ जनता के कष्टों की सुनवाई अनिश्चितकाल तक टल जाती है। महाराष्ट्र के सन्दर्भ में यह सोचना बहुत ज़रूरी झो जाता है कि तीन ऐसी पार्टियाँ (जो एक दूसरे की हमेशा से धुर-विरोधी रहीं) – एनसीपी, शिवसेना और कॉन्ग्रेस यदि एक साथ गठबंधन में शामिल होतीं तो राज्य सरकार और उसके लोगों का क्या ही हश्र होता।

1999 में विदेश मूल के मुद्दे पर कॉन्ग्रेस पार्टी के अन्दर से सोनिया गाँधी का विरोध करने वालों में सबसे अग्रणी नेता शरद पवार खुद थे। दरअसल पवार सोनिया को इस मुद्दे पर पीछे करके पार्टी की और से पीएम पद पर अपनी दावेदारी पेश करना चाहते थे। मगर इसके उलट उनका यह दाँव उन्हें ही भारी पड़ गया। उनकी हरकतों की भनक लगने पर कॉन्ग्रेस पार्टी ने उन्हें ही निष्कासित कर दिया। 20 साल बाद, वही शरद पवार महाराष्ट्र में सरकार बनाने और शिवसेना को समर्थन देने के लिए सोनिया की सलाह लेने पहुँच गए थे। यहाँ तक कि उसके तुरंत बाद हुए 1999 के विधानसभा चुनावों के बाद वो फिर उसी कॉन्ग्रेस को समर्थन दे बैठे।

बालासाहेब ठाकरे की राजनीति ही हिंदुत्व से शुरू हुई। उन्होंने राजनीतिक संगठन के रूप में शिवसेना बनाई। भारतीय राजनीति के इतिहास में हिन्दू ह्रदय सम्राट’ शब्द उन्ही के लिए संबोधन में इस्तेमाल होता था। उनकी लड़ाई सिर्फ हिंदुत्व के लिए ही नहीं बल्कि छद्म सेकुलरिज्म पर भी थी। वही छद्म सेकुलरिज्म, जिसे कॉन्ग्रेस जैसी पार्टियों ने समाज के वर्ग विशेष का वोट लेने का जरिया बना लिया था। तीनों पार्टियों की विचारधारा, उनमे मौजूद भिन्नता खुद यह बताती है कि अगर यह गठबंधन सफल भी होता तो इस त्रिशंकु से जनहित की उम्मीद करना एक भूल होती।

भारत में जोड़-तोड़ की राजनीति नई नहीं है, मगर भारतीय राजनीति में ऐसी सरकारों की स्थिरता हमेशा सवालों के घेरे में रही है। दिल्ली से लेकर राज्यों की राजधानी तक, अगर बहुमत न हो, तो त्रिशंकु सरकारों ने देश की प्रगति अपने फैसलों और नीतियों के ज़रिए कितना ध्यान दिया यह एक प्रश्न चिन्ह है।

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