पश्चिम बंगाल की राजनीति में विरोधाभासों का दौर नया नहीं है, लेकिन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के हालिया बयानों ने नैतिकता और तर्क को एक नए धरातल पर लाकर खड़ा कर दिया है। एक ओर वे पड़ोसी देश बांग्लादेश में हुए चुनावों को ‘अत्यंत शांतिपूर्ण’ बताकर वहाँ की व्यवस्था के प्रति अपना अटूट प्रेम जाहिर कर रही हैं, जबकि हकीकत में वहाँ अल्पसंख्यकों पर जुल्म और हिंसा का हंगामा मचा हुआ है।
दूसरी ओर, वे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की रीढ़ यानी भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) को ‘तुगलकी’ और ‘वाशिंग मशीन’ जैसे शब्दों से नवाज रही हैं। यह विडंबना ही है कि जिन्हें घर की लोकतांत्रिक संस्थाओं में खोट नजर आता है, उन्हें सीमा पार की धांधली और खून-खराबे में शांति दिखाई दे रही है।
बांग्लादेश का ‘खूनी चुनावी सच’ और ममता की तारीफ
ममता बनर्जी का यह बयान कि बांग्लादेश के चुनाव कितने शांतिपूर्ण रहे, वास्तव में उन हजारों पीड़ितों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है जिन्होंने वहाँ चुनावी हिंसा और मजहबी कट्टरवाद को झेला है। रिपोर्टों के अनुसार, बांग्लादेश के 13वें संसदीय चुनाव के दौरान अक्टूबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच 10 लोगों की मौत हुई और 2500 से ज्यादा लोग घायल हुए।
वहाँ हिंदुओं के घरों को आग के हवाले किया गया और अल्पसंख्यकों को चुन-चुनकर निशाना बनाया गया। लेकिन ममता दीदी को यह सब ‘शांतिपूर्ण’ नजर आता है। शायद उनके लिए ‘शांति’ की परिभाषा केवल सत्ता के समीकरणों तक ही सीमित है।
ममता बनर्जी का बांग्लादेश के लिए यह प्रेम अकारण नहीं है, बल्कि यह उनकी खास वोट बैंक की राजनीति का हिस्सा लगता है। जिस देश में पत्रकारों को पीटा जा रहा है और जमात-ए-इस्लामी जैसे कट्टरपंथी संगठन सड़कों पर हंगामा कर रहे हैं, वहाँ ममता बनर्जी को सब कुछ ‘हरा-भरा’ नजर आ रहा है।
यह प्रेम केवल कूटनीतिक नहीं है, बल्कि यह एक गहरी तुष्टीकरण की राजनीति की ओर इशारा करता है। जब एक लोकतांत्रिक मुख्यमंत्री पड़ोसी देश की अस्थिरता और अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों पर आँख मूँदकर वहाँ के चुनावों को सर्टिफिकेट बाँटती हैं, तो सवाल उठना लाजमी है।
चुनाव आयोग पर ‘तुगलकी’ वार
भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) निष्पक्ष चुनाव के लिए दुनिया भर में जाना जाता है, लेकिन ममता बनर्जी के लिए अब एक ‘राजनीतिक दुश्मन’ बन चुका है। उन्होंने चुनाव आयोग को ‘मोहम्मद बिन तुगलक’ और ‘भाजपा की वाशिंग मशीन’ करार दिया है। ममता बनर्जी का कहना है कि चुनाव आयोग लोकतांत्रिक अधिकारों को धो रहा है।
दिल्ली की सड़कों पर काला शॉल ओढ़कर विरोध प्रदर्शन करना और सुप्रीम कोर्ट तक भागना, ममता की उस रणनीति का हिस्सा है जिसमें वे खुद को हमेशा ‘बेचारा’ और केंद्र सरकार को ‘तानाशाह’ साबित करने की कोशिश करती हैं।
Howrah | West Bengal CM Mamata Banerjee says, "Who are threatening the officers? I would like to remind them that the ECI can’t do anything outside the rules. You will be finished. I am not blaming everyone from the commission, but I don’t like this Muhammad bin Tughluq. They’re… pic.twitter.com/23uIAZtH81
— ANI (@ANI) February 17, 2026
ममता बनर्जी का आयोग पर यह हमला तब और तेज हो गया जब मतदाता सूची के पुनरीक्षण (SIR) में गड़बड़ी पाई गई। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा के इशारे पर 58 लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए गए और इसकी तुलना ‘रावण द्वारा सीता के अपहरण’ से कर दी।
ममता बनर्जी जनता को यह कहकर भड़का रही हैं कि निर्वाचन आयोग आतंकियों जैसा व्यवहार कर रहा है। जब एक मुख्यमंत्री संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ इस तरह की भाषा का प्रयोग करती हैं, तो वे सीधे तौर पर अराजकता को निमंत्रण देती हैं। उनका यह कहना कि ‘अगर कुछ लोग 420 हैं, तो मैं 440 वोल्ट हूँ,’ डराने और धमकाने वाली राजनीति का प्रमाण है।
बांग्लादेशी चुनावों में धांधली के आरोप
ममता बनर्जी भले ही बांग्लादेश के चुनावों को शांतिपूर्ण कहें, लेकिन वहाँ के जमीनी हालात और खुद वहाँ के नेता कुछ और ही कहानी बयाँ कर रहे हैं। जमात के नेतृत्व वाले 11 दलों के गठबंधन ने खुलेआम चुनाव में अनियमितताओं और धांधली के आरोप लगाए हैं।
जमात-ए-इस्लामी के सहायक महासचिव हामिद उर रहमान आजाद ने साफ कहा कि ‘शुरुआत अच्छी थी, लेकिन अंत बहुत खराब हुआ।’ उन्होंने आरोप लगाया कि जाली वोट डाले गए, काले धन का प्रवाह हुआ और चुनाव के नतीजों में ओवरराइटिंग और गड़बड़ी की गई। कई जगहों पर पोलिंग एजेंटों के हस्ताक्षर तक गायब थे।
हैरानी की बात यह है कि जब बांग्लादेश के भीतर से ही 32 निर्वाचन क्षेत्रों में दोबारा गिनती की माँग उठ रही है और वहाँ की सड़कों पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, तब ममता बनर्जी को वहाँ सब कुछ ‘साफ’ दिखाई देता है। क्या वे उन रिपोर्ट्स को नहीं पढ़तीं जिनमें बताया गया है कि धांधली की कवरेज कर रहे पत्रकारों पर हमले हुए और जमात समर्थकों के घरों को फूँका गया?
भ्रष्ट अधिकारियों को ‘प्रमोशन’ का इनाम
लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है जब कोई सरकार गलत काम करने वाले अधिकारियों के साथ खड़ी हो जाए। भारतीय निर्वाचन आयोग ने बंगाल में मतदाता सूची के पुनरीक्षण (SIR) में गंभीर गड़बड़ी और लापरवाही के आरोप में 7 अधिकारियों (AERO) को निलंबित किया। कायदे से एक मुख्यमंत्री को जाँच का समर्थन करना चाहिए था, लेकिन ममता बनर्जी ने घोषणा कर दी कि वे इन अधिकारियों को ‘प्रमोट’ करेंगी।
VIDEO | Howrah: West Bengal Chief Minister Mamata Banerjee says, "We will promote those Bengal government officers who will be demoted by EC."
— Press Trust of India (@PTI_News) February 17, 2026
(Full video available on PTI Videos – https://t.co/n147TvrpG7) pic.twitter.com/63B3dCXMxb
वे कहती हैं कि ‘जिन अधिकारियों को ईसी (EC) डिमोट करेगा, हम उन्हें अच्छी जगह पोस्टिंग देंगे और प्रमोशन देंगे।’ यह सीधे तौर पर निर्वाचन आयोग को चुनौती है और उन अधिकारियों को शह देना है जो निष्पक्ष काम करने के बजाय सत्ता के एजेंट बनकर काम करते हैं।
‘घर में आग, पड़ोस में राग’
ममता बनर्जी की राजनीति अब ‘आंदोलन’ से हटकर ‘अराजकता’ की ओर मुड़ती दिख रही है। एक मुख्यमंत्री का यह दोहरा मापदंड रोंगटे खड़े करने वाला है। जिस बांग्लादेश में हिंदुओं के मंदिर तोड़े गए, जहाँ चुनावी हिंसा में हजारों लोग लहूलुहान हुए, वहाँ उन्हें ‘शांति’ की खुशबू आती है।
क्या यह इसलिए है क्योंकि वहाँ की स्थिति पर सवाल उठाने से उनका खास वोट बैंक नाराज हो जाएगा? वहीं दूसरी ओर, अपने ही देश की उस संस्था (ECI) को वे तुगलकी और आतंकवादी जैसा व्यवहार करने वाला बता रही हैं, जिसने उन्हें तीन बार मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँचने का रास्ता दिया।
यह कैसी राजनीति है जहाँ दागी अधिकारियों को ‘सुरक्षा कवच’ दिया जाता है और संवैधानिक संस्थाओं को सरेआम बेइज्जत किया जाता है? ममता जी कहती हैं कि वे ‘सत्य को उजागर’ करेंगी, लेकिन क्या वे उन 500 से ज्यादा घरों और दुकानों का सच देख पा रही हैं जो बांग्लादेश में चुनावी हिंसा की भेंट चढ़ गए? भारतीय लोकतंत्र को ‘वाशिंग मशीन’ कहना आसान है, लेकिन अराजकता को ‘प्रमोशन’ देना बहुत महँगा पड़ेगा।
सत्ता आती-जाती रहती है, लेकिन जब एक संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति सड़कों पर लोगों को भड़काने लगे और गलत को सही बताने की जिद पर अड़ जाए, तो नुकसान केवल एक पार्टी का नहीं, बल्कि पूरे देश के लोकतांत्रिक ढाँचे का होता है। ममता बनर्जी का यह ‘बांग्लादेश प्रेम’ और ‘भारतीय आयोग से नफरत’ केवल एक राजनीतिक चाल नहीं, बल्कि एक खतरनाक मानसिकता का परिचायक है जो केवल ‘अराजकता’ में ही अपना भविष्य देखती है।


