Homeविचारराजनैतिक मुद्देअभी लाखों बिहारी फिर से अपने गाँव-घर जाने को परेशान होंगे

अभी लाखों बिहारी फिर से अपने गाँव-घर जाने को परेशान होंगे

1997 में मैं दरभंगा छोड़कर दिल्ली के लिए निकला। मुझे तब से गाँधी-सेतु की मरम्मत और उसके पुनर्निर्माण का हल्ला सुनने को मिला। कुल पाँच किलोमीटर का सेतु पिछले तीन दशकों में नहीं बन सका और वह ऐसा कोढ़ है कि पटना पहुँचने का औसत समय तीन घंटे बढ़ा दे।

नीतीश कुमार जब पहली बार मुख्यमंत्री बने थे, तो उन्होंने एक लक्ष्य यह तय किया था कि सड़क मार्ग से राज्य के किसी भी कोने से पटना पहुँचने में 6 घंटे से अधिक न लगे! बाकी का तो पता नहीं, हाँ इस बीच उन्होंने ऐसी पुरजोर व्यवस्था जरूर कर दी कि पटना से दरभंगा जैसी 3 घंटे में खत्म होने वाली दूरियाँ 6 घंटे से कम में खत्म न हो।

लालू प्रसाद के जंगलराज पर अब सिर पीटने का फायदा नहीं। लब्बोलुआब यह कि जब जगन्नाथ मिश्र से लालू और फिर उनसे नीतीश बाबू ने बेटन संभाला, तो लोगों की उम्मीदें बेपनाह उछलीं। सड़कों को लेकर केंद्र की वाजपेयी सरकार का काम (बाद में मोदी सरकार ने बढ़ाया) ही है कि दरभंगा से मुजफ्फरपुर अब एक घंटे में आदमी पहुँचता है। वरना वे दिन भी देखे हैं, जब हम 20 किमी प्रति घंटे की मारक रफ्तार से तीन घंटे में मुजफ्फरपुर पहुँचते थे।

1997 में मैं दरभंगा छोड़कर दिल्ली के लिए निकला। मुझे तब से गाँधी-सेतु की मरम्मत और उसके पुनर्निर्माण का हल्ला सुनने को मिला। कुल पाँच किलोमीटर का सेतु पिछले तीन दशकों में नहीं बन सका और वह ऐसा कोढ़ है कि पटना पहुँचने का औसत समय तीन घंटे बढ़ा दे। आप वहाँ अगर जाम में नहीं फँसे, तो आपका सौभाग्य है। अभी जंगलराज-2 में युवा उप-मुख्यमंत्री ने पीपा पुल का उद्घाटन किया था, अब वो गंगा की गोद में है।

2005 से हाजीपुर का ओवरब्रिज बन रहा है, अब तक खत्म नहीं हुआ। पूरे देश के इंजीनियर्स से अलहदा बिहारियों का हाल है। सोनपुर वाले पुल पर चढ़ कर देखिएगा। उसकी चौड़ाई न जाने क्या सोच कर भाई लोगों ने उतनी कम रखी है। पटना के ओवरब्रिज देखिए। आपका मन करेगा कि उस इंजीनियर को जाकर तीन किलो ईंट दे आएँ, जो इस विचित्र प्रकार की रचना करता है।

लेख बहुत लंबा हो जाएगा और ‘गर्वीले बिहारियों’ के जज्बात भी घायल हो जाएँगे, लेकिन सच तो कहना ही होगा। यूँ तो स्वास्थ्य से लेकर शिक्षा तक नीतीश कुमार और उनके छोटे भाई सुशील मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार ने पतन के नए आयाम छुए हैं, लेकिन यह लेख यातायात पर निर्भर है, तो कुछ महत्वपूर्ण बिंदु इस प्रकार हैं:

  • बिहारी जिस उत्तर प्रदेश की ओर बड़ी उम्मीद से देखकर अपने पतन को जायज ठहराते हैं, वहाँ भी सार्वजनिक परिवहन नाम की एक व्यवस्था है और अच्छी है। बाकी गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु आदि राज्यों की सार्वजनिक व्यवस्था की तो बात न ही करें, तो बेहतर…।
  • 12 करोड़ (जिनमें तीन करोड़ पलायित) बिहारियों को चंद निजी बस-ऑपरेटर्स और टेंपो वाले के भरोसे छोड़ दिया गया है। ये सभी माफिया हैं। घटिया बसें, अनियमित टाइमिंग, गंदगी, अश्लील भोजपुरी गाने और भगवान भरोसे सफर ही बिहारियों के भाग्य में है। अब अगर आपके पास अपनी गाड़ी है, तो शायद आपका सफर सुहाना हो क्योंकि सड़के थोड़ी-बहुत सुधरी हैं, लेकिन कब 15 लौंडे एनएच तक को रोक देंगे, कह नहीं सकते।
  • निजी उद्यमी जब वॉल्वो लेकर आए, तो नीतीश सरकार ने लाइसेंस देने में इतनी देर कर दी कि उसका 600 करोड़ रुपया डूबा और वह कान-नाक पकड़कर भाग गया।
  • क्या बिहार में कोई जिम्मेदार व्यक्ति, संस्था या बोर्ड है, जिससे सार्वजनिक व्यवस्था पर सवाल किए जा सकें?क्या सार्वजनिक परिवहन के बारे में सोचने वाला भी कोई है?
  • बस-अड्डों की तो बात ही मत कीजिए। राज्य की राजधानी पटना का मीठापुर बस अड्डा घूम आइए, सारी गलतफहमी दूर हो जाएगी। महिला यात्री क्या कुछ झेलती हैं, ये उनसे ही पूछिएगा।

सारांश यह है कि मेरे गर्वीले बिहारियों! मिजोरम या असम जैसे पहाड़ी आतंकवाद ग्रस्त राज्यों से अपनी तुलना कर बिहार को महान ठहराकर आप जैसे लोगों ने ही नीतीश तक को शिथिल बना दिया है। किसी नेता को यह उम्मीद ही नहीं है कि कोई उनसे सवाल भी पूछ सकता है ,क्योंकि हम सभी ने शूकरवृत्ति में ही मोक्ष मान लिया है। बिहार मेरा राज्य है और मैं इसके लिए आज की बात करुँगा। मैं मैथिलों की तरह याज्ञवल्क्य और जनक पर अहो-अहो कर गंदगी, कीचड़ और लीचड़ लोगों से भरे मिथिला को डिफेंड नहीं करुँगा। सार्वजनिक परिवहन के मामले में बिहार शून्य के भी बहुत नीचे है, क्योंकि यहाँ वह किसी के जेहन में ही नहीं है।

-व्यालोक पाठक

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