Wednesday, April 21, 2021
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गौतम गंभीर को दिल्ली इलेक्शन में नीचा दिखाने के लिए स्पाइन वाली मीडिया पाकिस्तान पहुँच गई

गौतम गंभीर के रिकॉर्ड पर लिखने और बोलने वाले ये लोग 2011 के वर्ल्ड कप के समय शायद फ़ीफ़ा देख रहे थे या वो मेमोरी लॉस के शिकार हैं। जहाँ तक शेखर जी की बात है, वो तो बहुत वरिष्ठ पत्रकार हैं। उन्हें ये भी मालूम है कि इलेक्शन के समय क्या-क्या नहीं लिखना चाहिए। वैसे, ये तो सारे स्पाइन वाले पत्रकारों को मालूम है।

आज कल एक नए किस्म का जर्नलिज्म चला है, स्पाइन वाला जर्नलिज्म। इस तरह के जर्नलिज्म के
दो साधारण से नियम है- पहला, यदि आप मोदी से प्रश्न पूछ रहे हैं तो बिल्कुल कड़ा सवाल पूछिए। क्या खाते हैं, क्या पहनते हैं या क्या पसंद है? इस तरह के सवालों का इसमें कोई गुंजाइश नहीं है। दूसरा, यदि आप राहुल गाँधी, केजरीवाल, ममता बनर्जी से सवाल पूछ रहे हैं तो कोई भी जवाब, समाज शास्त्र, भूगोल, इतिहास और गणित सबमें चलेगा। यानी कि 12000 x 60 = 3,60,000 भी सही है, बंगाल में बूथ लूटना भी गलत नहीं है और दिल्ली-पंजाब के दलितों में भेदभाव भी चलता है।

अक्षय कुमार ने मोदी से आम पर चार सवाल पूछ लिया तो पूरा लुटियंस लंका की तरह सात दिन तक जलता रहा। रवीश कुमार दिल्ली के किसी भी गली मोहल्ले में घुसकर ठेले से आम उठा रहे थे और “ये आम है खीं खीं खीं, वो लहसून है, हें हें हें” बोल कर मोदी के इंटरव्यू का मजाक उड़ा रहे थे| मीडिया में बैठे प्यादों से लेकर वज़ीर तक हर इंसान ये समझा रहा है कि इलेक्शन के समय अक्षय कुमार आम पर सवाल पूछ कर लोकतंत्र को कैसे मूर्छित कर गए।

कुछ ज्यादा स्पाइन वाले दिग्गज जर्नलिस्ट्स तो अक्षय कुमार की नागरिकता पर अटक गए। जिन्होंने आज तक ग्लोबल जर्नलिज्म और फ़्रीडम ऑफ़ स्पीच पर ज्ञान चक्षु खोला है, उन्हें अक्षय कुमार के नागरिकता के कारण वह होस्ट के रूप में ही ओड चॉइस दिखने लगे।

वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता, जो कि एडिटर्स गिल्ड के अध्यक्ष और ‘द प्रिंट’ के प्रधान संपादक भी हैं उन्हें भी आम से अक्षय कुमार की नागरिकता एवं निष्ठा याद आ गई। ग़ौरतलब है कि अक्षय कुमार ने साफ़-साफ़ कहा था कि ये इंटरव्यू राजनीतिक नहीं है।

तमाम भारत को तानाशाही से बचाने वाले और इलेक्शन के समय देश में ज्ञान की रौशनी फ़ैलाने वाले इसी ‘द प्रिंट’ को दिल्ली इलेक्शन के समय शाहिद अफरीदी का गौतम गंभीर पर दिया गया बयान याद आ जाता है। शाहिद अफरीदी ने एक किताब प्रकाशित की है, जिसमें उन्होंने भारतीय खिलाडियों के बारे में लिखा है। द प्रिंट को इन सब में गंभीर के बारे में लिखी गयी बातें इतनी पसंद आ गयी कि इन्होंने उसे हेडलाइन ही बना दिया।


गौतम गंभीर के रिकॉर्ड पर लिखने और बोलने वाले ये लोग 2011 के वर्ल्ड कप के समय शायद फ़ीफ़ा देख रहे थे या वो मेमोरी लॉस के शिकार हैं। जहाँ तक शेखर जी की बात है, वो तो बहुत वरिष्ठ पत्रकार हैं। उन्हें ये भी मालूम है कि इलेक्शन के समय क्या-क्या नहीं लिखना चाहिए। वैसे, ये तो सारे स्पाइन वाले पत्रकारों को मालूम है।

ख़ैर, गौतम गंभीर का रिकॉर्ड अफरीदी, आतिशी मर्लेना, अरविन्द केजरीवाल और प्रिंट सब को पता है। उन्हें ये भी पता है कि गंभीर बोलते कम और प्रहार ज्यादा करते हैं।

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Rahul Raj
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