बंगाल जो चुनावी हिंसा का पर्याय है, ममत्व ऐसा कि भाजपाइयों की लटकती लाश आम दृश्य है

आपको भी पता है कि पकड़ ढीली हो रही है, और जिस आशा की रोटी आपने बंगाल को बेची थी, उसमें ख़ून के थक्के भरे हुए हैं। यही कारण है कि आपको असम में हो रहे बंगलादेशी घुसपैठियों की शिनाख्त पर आपत्ति हो जाती है। यही कारण है कि शारदा जैसे घोटालों के लिए सीबीआई को आप बंगाल में घुसने नहीं देतीं।

शीर्षक एक रक्तरंजित माहौल की बात कहता है। शीर्षक बताता है कि बंगाल में क्या हो रहा है, और किस स्तर पर हो रहा है। शीर्षक बताता है कि सत्ता पाकर कुछ लोग किन तरीक़ों से तंत्र का दुरुपयोग करते हैं। शीर्षक बताता है कि नैरेटिव पर जिनका क़ब्ज़ा है वो अब लालू के जंगल राज को याद नहीं कर पा रहे, क्योंकि बंगाल बिहार के उस दौर से कहीं ज्यादा गिर चुका है।

मुख्यमंत्री का नाम है ममता। ममता शब्द का मूल है ‘मम्’ अर्थात् अपना। उसमें जब ‘ता’ प्रत्यय लगता है तो अर्थ होता है वैसा भाव जो स्नेह, अपनापन या मोह लिए हो। यह एक सकारात्मक नाम है। यह शब्द सुन कर किसी भी हिन्दीभाषी व्यक्ति के मन में एक शांत, स्नेहिल छवि बनती है। लेकिन आज के दौर में ममता सुनते ही बनर्जी भी साथ ही आ जाती है और गूगल के हजारों चित्रों की तरह इस शब्द का मूल अर्थ इस संदर्भ में गौण हो जाता है।

बंगाल ममता बनर्जी का राज्य है। वो वहाँ की मुख्यमंत्री हैं। लालू बिहार के मुख्यमंत्री थे, और लालू बिहार की मुख्यमंत्री के पति भी थे। उस दौर की चुनावी हिंसा की कहानियाँ अखबारों और पत्रिकाओं का काला पन्ना बन कर हम जैसे बिहारियों के भविष्य पर एक कालिख की तरह पुत जाया करती थीं। बिहार की बदनामी में लालू का सत्ता पर क़ब्ज़ा, और हिंसा के दौर का सबसे बड़ा हाथ था। चूँकि लालू उस समय कॉन्ग्रेस से अलग थे, तो नैरेटिव ने उनको क़ायदे से जंगल राज का खुल्ला राजा बना कर बेचा। ऐसा नहीं है कि वो नैरेटिव गलत था, लेकिन अगर वो कॉन्ग्रेस के साथ होते तो, शायद बिहार भी ‘भद्रलोक’ टाइप सिर्फ इंटेलेक्चुअल बातों के लिए जाना जाता।

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बंगाल का नाम सुनते ही अब दंगे, अराजकता, हिन्दुओं के हर पर्व पर समुदाय विशेष के आतंक, मालदा में छपने वाले नकली नोट, पंचायत चुनावों से लेकर लोकसभा चुनावों तक के हर चुनाव में विरोधी पार्टियों के कार्यकर्ता और समर्थकों की लाश, कानून व्यवस्था की उदासीनता आदि दिमाग में घूमने लगते हैं।

लेकिन क्या ग़ज़ब की बात है कि आपको कभी भी उस आतंक की दास्तान किसी भी चैनल पर सुनाई नहीं देती। छोटे रिपोर्ट्स जरूर आते हैं, लेकिन इस कुव्यवस्था और हिंसक होते राजनैतिक माहौल पर कोई डिबेट या परिचर्चा नहीं होती। क्या बात है कि हेलिकॉप्टर नहीं उतरने देने की बात पर चर्चा हो जाती है, लेकिन कार्यकर्ता की लाश पेड़ से लटका कर, कहीं तार पर बाँध कर, यह धमकी दी जाती है कि भाजपा को वोट देने वालों के साथ यही होगा, ऐसी बातों पर चर्चा नहीं होती।

इस पर चार बजे तक फेसबुक पर सक्रिय रहने वाला पत्रकार कुछ नहीं लिख पाता। जब लिखता है तो तीन साल का लेखा-जोखा एक लेख में और मुख्यमंत्री का नाम तक नहीं ले पाता! ये वही व्यक्ति है जिसने पिछले साल की रामनवमी के मौक़े पर बिहार के एक जिले में मुसलमानों के गाँव में जुलूस पर चप्पल फेंके जाने पर ‘मेरा बिहार जल रहा है’ वाला लेख लिखा था। उसने लिखा था कि बिहार को जाति और मज़हब के नाम पर बाँट कर लोगों को भड़काया जा रहा है।

बंगाल में चुनावों के दौरान क्या नहीं हुआ, और क्या नहीं हो रहा! आज ही की ख़बर है कि एक जगह ईवीएम पर भाजपा के प्रत्याशी के नाम और चिह्न पर काला टेप लगा हुआ मिला। दूसरी ख़बर यह आई कि मुसलमान बहुल गाँव में हिन्दुओं के पहुँचने से पहले ही वोट डाल दिए गए थे। कहीं से ट्वीट आया कि ममता के तृणमूल पार्टी के लोग सीआरपीएफ़ की वर्दी पहन कर घूम रहे हैं। एक ख़बर थी कि तृणमूल नेता ऑडियो क्लिप में बूथ क़ब्ज़ा करने की बात कह रहा है। एक ख़बर थी कि तृणमूल नेता अपने कार्यकर्ताओं को कह रहा है कि सीआरपीएफ़ आदि के जवानों को खदेड़ कर मारो और भगा दो। भाजपा कार्यालय से लेकर पेड़ तक पर भाजपा कार्यकर्ताओं की लाशें लटकी होने की ख़बर इतनी आम हो गई हैं कि सुन कर पहले ही सोच लेता हूँ कि बंगाल की ही ख़बर होगी।

नहीं, ये मेरे दिमाग की समस्या नहीं है। यह समस्या ममता द्वारा चलाए जा रहे आतंक के राज की है। अगर एक आईपीएस अफसर यह लिखकर आत्महत्या कर लेता है कि ममता ने बंगाल को नर्क से भी बदतर बना दिया और ख़ौफ़ से वो मरना चुन लेता है, तो मेरा दिमाग नहीं, ममता का शासन खराब है। सीबीआई को घुसने से रोक देना, केन्द्र सरकार के खिलाफ पुलिस के आला अफसर का ममता के समर्थन में धरने पर बैठ जाना आदि सुनना आपको आश्चर्य में नहीं डालता क्योंकि ‘चिल मारिए, आप बंगाल की बात कर रहे हैं’ टाइप की फीलिंग आती है।

दो साल पहले सरस्वती पूजा पर पुलिस ने विद्यार्थियों को निर्ममता से पीटा था, इस साल मंदिर में घुस कर पुलिस ने फिर से तोड़-फोड़ की। दुर्गा पूजा के विसर्जन की तारीख़ बदलने की क़वायद तो आपको याद ही होगी कि मुहर्रम है, तो नहीं होगा विसर्जन। यहाँ तक कि मुहर्रम के एक दिन पहले या बाद होने तक में विसर्जन पर रोक या दिन बदलने की बात ममता सरकार ने ‘संवेदनशील’ होने के नाम पर कोर्ट में कही।

बर्धमान, धूलागढ़, कालियाचक (मालदा), इल्लमबाजार, हाजीनगर, जलांगी, मिदनापुर, पुरुलिया, रानीगंज, मुर्शीदाबाद, आसनसोल… ये वो जगह हैं, जहाँ ममता काल में दंगे हुए। उसके बाद दुर्गा पूजा, रामनवमी और मुहर्रम पर होने वाली हिंसक घटनाएँ, तो हर साल इतनी आम हो कि उस पर बात भी नहीं होती।

इसकी बात कोई नहीं करता कि ये जो माहौल बना है, ये किस तरह का माहौल है। क्या ये डर का माहौल है? क्या ये आपातकाल वाला माहौल है? क्या दो-चार गौरक्षकों और गौतस्करों वाली घटनाओं पर सीधे मोदी से जवाब माँगने वाले पत्रकारों का समुदाय विशेष यह बताएगा कि आखिर ऐसा क्या है बंगाल में कि मजहबी दंगे हर जगह पर कुकुरमुत्तों की तरह हो जाते हैं। यहाँ पर किसकी शह पर यह हो रहा है?

बंगाल की हिंसा पर और ममता की मनमानी पर सब-कुछ यहाँ पढ़ें

क्या यही माहौल यह सुनिश्चित नहीं करता कि लोग चुनावों में ममता और उसकी पार्टी से डर कर रहें? क्या आपका पड़ोसी किसी दिन पेड़ पर ख़ून से लथपथ लटका मिले और संदेश हो कि भाजपा को वोट देने पर यही हश्र होगा, तो आप कौन-सा विकल्प चुनेंगे? पंचायत चुनावों में आप कैसे प्रत्याशी बनेंगे जब तृणमूल के गुंडे सर पर तलवार लेकर मँडरा रहे हों? आखिर आप नोमिनेशन कैसे करेंगे?

यही तो कारण है कि आज के दौर में भी 48,650 पंचायत सीटों में से 16,814; 9,217 पंचायत समिति सीटों में से 3,059; और 825 ज़िला परिषद सीटों में से 203 पर निर्विरोध चुनाव हुए। आप यह सोचिए कि तृणमूल लगभग एक तिहाई, यानी 30% सीटों पर निर्विरोध जीत जाती है! कमाल की बात नहीं है ये? बीरभूम जैसी जगहों पर 90% सीट पर तृणमूल के खिलाफ कोई खड़ा ही नहीं हुआ!

आपने बिहार के बारे में खूब सुना होगा, पर इन प्रतिशतों पर, इन आँकड़ों पर कोई विश्लेषण नहीं किया जाता। यहाँ न तो जंगलराज आता है, न आपातकाल। क्योंकि भद्रलोक और छद्मबुद्धिजीवियों की जमात हर जगह बैठी हुई है जिसे ममता में ममता ही दिखती है, उसकी निर्ममता नहीं। आज कै दौर में अगर लालू आता है, तो अपने साथ हिंसा भी लाएगा। वस्तुतः, नितिश के साथ सरकार आते ही बिहार में हिंसा का भयावह दौर वापस आया था, लेकिन मीडिया और लिबरल्स की निगाह नहीं गई क्योंकि वहाँ भाजपा या मोदी सत्ता में परोक्ष रूप में भी नहीं था।

आज जब बंगाल सही मायनों में जल रहा है, और चुनावी हिंसा चरम पर है, तब भी स्टूडियो से कैम्पेनिंग और रैली करते पत्रकारों को कुछ गलत नहीं लग रहा। ये दंगे शायद सेकुलर हैं, ये चुनावी हिंसा किसी खास रंग की है। इस जगह की सत्ता में जब ममता है, तो फिर उसके राज्य में हिंसा कैसे होंगे, शायद यही सोच कर चैनल वाले इस विषय को छूते भी नहीं।

लेकिन, ऐसे पैंतरे आपको बहुत देर तक सत्ता में नहीं रख सकते। लालू जैसे चोरों का राज भी गया, आपके भी गिन लद गए हैं। आपको भी पता है कि पकड़ ढीली हो रही है, और जिस आशा की रोटी आपने बंगाल को बेची थी, उसमें ख़ून के थक्के भरे हुए हैं। यही कारण है कि आपको असम में हो रहे बंगलादेशी घुसपैठियों की शिनाख्त पर आपत्ति हो जाती है। यही कारण है कि शारदा जैसे घोटालों के लिए सीबीआई को आप बंगाल में घुसने नहीं देतीं। यही कारण है कि आप अपनी रैलियों में अपने कर्म गिनाने की बजाय मोदी को ज़्यादा गाली देती रहती हैं।

लेकिन ध्यान रहे ममता दीदी, होश सबको आता है। जनता ने आपको वामपंथियों की हिंसा से परेशान होकर चुना था। लेकिन आपने हिंसा का वही दौर, शायद उससे भी भयावह, वापस लाया है। मरने वाले तो बंगाली ही है, उन्हें होश आएगा, और आपका भी हिसाब होगा।

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