Thursday, April 22, 2021
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दक्षिणपंथ का मतलब भाजपा होना नहीं है, नेहरू घाटी सभ्यता से बाहर झाँकना ज़रूरी

आज भी जब दक्षिणपंथ शब्द का प्रयोग किया जाता है तो हम तुरंत एक ऐसी छवि बनाते हैं, जिसने आवश्यक रूप से धोती-कुर्ता पहना हुआ हो, त्रिपुण्ड धारण किया हुआ हो। उसने जनेऊ धारण किया हुआ हो, और हो सके तो वह अशिक्षित हो।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 17वीं लोकसभा की शुरुआत होते ही सोशल मीडिया पर एक जबरदस्त टकराव देखने को मिला। यह टकराव था भाजपा समर्थकों और दक्षिणपंथियों के बीच। यह सुनने में अटपटा लगता है लेकिन दक्षिणपंथ को ‘उदारवादी वामपंथियों’ ने बहुत ही चालाकी से इस तरह से परिभाषित किया है कि हमें भाजपा और दक्षिणपंथ में अंतर जैसे वाक्य अटपटे लगने लगते हैं।

प्रोपेगैंडा का मुख्य उद्देश्य यह होता है कि अन्य किसी भी विचाधारा के अस्तित्व को ही समाप्त कर दिया जाए या फिर किसी भी तरह से उसकी विश्वसनीयता पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया जाए। इस देश में एक लम्बे समय तक राज करती आ रही वामपंथी विचारधारा ने दक्षिणपंथ के अस्तित्व को ही एक प्रश्न बनाकर इसे एकदम सही साबित भी किया है। और लोगों को यह जानने का अवसर नहीं दिया कि लोकतंत्र में किसी भी ‘-ism’ (वाद) का पहला लक्ष्य समेकित विकास ही होना चाहिए, क्रांति अब प्रासंगिक नहीं रही।

विगत कुछ समय की समकालीन राजनीति पर यदि नजर डालें, तो हम देखते हैं कि राष्ट्रवाद और दक्षिणपंथ ने विश्व के मानचित्र के एक बड़े हिस्से पर अपनी सत्ता कायम की है। इटली के नेता और उप प्रधानमंत्री मैतियो साल्विनी की लोकप्रियता से लेकर स्पेन, जर्मनी और फ्रांस, यहाँ तक कि स्लोवेनिया तक, यूरोप के तमाम देशों में घोर दक्षिणपंथी पार्टियों की लोकप्रियता बहुत तेजी से बढ़ी है। दक्षिणपंथ की इस तीव्र गति से बढ़ती हुई लोकप्रियता इतनी विराट है कि एक बेहद लंबे समय से स्थापित पार्टियों के सलाहकार और बड़े से बड़े धुरंधर राजनीति के विचारकों के माथे पर बल पड़ रहा है। प्रश्न यह है कि दक्षिणपंथ की ओर जनता का झुकाव और वामपंथ एवं उदारवादियों से जनता का भरोसा आखिर किन कारणों से उठता जा रहा है? क्या उदारवादियों और वामपंथियों के कारण व्यवस्थाएँ बेलगाम हुई हैं?

यूरोप के लिए राष्ट्रवाद आज का विषय नहीं है। वहाँ पर मौजूद कोई भी दल हो, उसने राष्ट्रवाद को खूब विषय बनाकर हमेशा प्रासंगिक रखा। लेकिन यूरोप और पश्चिम के हर कूड़े-करकट को ‘मार्क्स-वाक्य‘ मान लेने वाले भारत में बैठे विचारकों को भारत की जनता के राष्ट्रवाद शब्द से ही क्यों विशेष आपत्ति है?

देश ने पूरे 5 साल देखा कि विरोधी दलों ने मोदी सरकार को अलोकप्रिय साबित करने के लिए हर प्रकार के हथकंडे अपनाए। लेकिन नतीजा ये रहा कि जनता ने लोकसभा में भाजपा को 300 का आँकड़ा पार कराने में मदद की। यह हर हाल में चमत्कारिक आँकड़ा है। जब तमाम दल एकजुट होकर, मीडिया से लेकर संस्थाओं तक में छुपे अपने समस्त दल-बल के जरिए सिर्फ एक व्यक्ति को हराने का प्रण ले चुका था, ऐसे में वह और भी भीषण रूप में जनता द्वारा अपना लिया गया, तो यह किसी चमत्कार से कम नहीं है।

क्या प्रत्येक भाजपा समर्थक दक्षिणपंथी है?

विपक्ष ने सारी ऊर्जा मोदी समर्थक जनता को मूर्ख, राष्ट्रवाद को कोसने और दक्षिणपंथियों को अनपढ़ साबित करने में ही गँवा दी। यहाँ तक कि चुनाव नतीजों के बाद भी जनादेश कुछ चुनिंदा लोगों और संस्थानों के लिए अपाच्य बना हुआ है। यह स्पष्ट है कि नरेंद्र मोदी को अपना प्रधानमंत्री बनता देखने के लिए देश के एक बड़े वर्ग ने प्रयास किए। भाजपा को वोट देने वालों में समाज का हर वर्ग था, इसे आप शिक्षित-अशिक्षित से लेकर कुलीन से लेकर वंचित, पूंजीवादी से लेकर समाजवादी, हर प्रकार के लोगों ने जोर लगाया। क्या इससे यह निष्कर्ष निकल जाता है कि ये सभी दक्षिणपंथी थे?

दक्षिणपंथ को इस देश में बहुत ही गलत तरीके से परिभाषित किया जाता रहा है। या यह कहें कि समाज में उदारवादी विचारक नजर आने वाले कुछ लोगों ने अपनी कुटिल बुद्धि के द्वारा दक्षिणपंथ को समेटने का प्रयास किया। आज भी जब दक्षिणपंथ शब्द का प्रयोग किया जाता है तो हम तुरंत एक ऐसी छवि बनाते हैं, जिसने आवश्यक रूप से धोती-कुर्ता पहना हुआ हो, त्रिपुण्ड धारण किया हुआ हो। उसने जनेऊ धारण किया हुआ हो, और हो सके तो वह अशिक्षित हो। यह मेरे द्वारा गढ़ी गई परिभाषा नहीं है, बल्कि समाज में अपने विषैली विचारधारा के माध्यम से किसी भी प्रकार के प्रोपगैंडा को समाज और सूचना के माध्यमों के बीच स्थापित करना है।

दक्षिणपंथ की पहली लड़ाई अपने समर्थकों से ही है

भारत के संदर्भ में भाजपा समर्थकों को सीधे-सीधे दक्षिणपंथ से जोड़ दिया जाता है। लेकिन क्या यह निष्कर्ष तार्किक रूप से सही है? यह भी सच है कि एक उग्र वर्ग भाजपा के समर्थन में जरूर रहता है। हम देख सकते हैं कि कई बार लोगों को वन्दे मातरम कहने पर मजबूर किया जाता है। राष्ट्रवाद के नाम पर अक्सर कुछ अनावश्यक तथ्यों के माध्यम से सूचनाओं से छेड़छाड़ करने के प्रयास किए जाते हैं। जवाहरलाल नेहरू के साथ गयासुद्दीन गाजी जैसी थ्योरी डेवलप करने वालों की भी कमी नहीं है। हालाँकि इस तथ्य को भी नकारना बेवकूफी होगी कि यह उग्रता मात्र एक प्रतिक्रियात्मक परिणाम है, जो असंतोष और शोषण की तपस में जन्म लेता है। 

हालाँकि, इस देश में कॉन्ग्रेस ने ही सिखाया है कि किस प्रकार से अपनी सुविधानुसार तथ्यों को इतिहासकारों के द्वारा एक विशेष दिशा में पढ़वाया और छपवाया जा सकता है। कॉन्ग्रेस ने ही आवश्यकतानुसार कभी गाय को अपना प्रतीक चिन्ह बनाया तो कभी उसे सड़क पर काट दिया। लेकिन इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता है कि दक्षिणपंथ को इस प्रकार की बेवकूफियों से बचना होगा, जो कॉन्ग्रेस ने सत्तापरस्ती में बहुत ही सावधानी से की।

गाय के नाम पर हिंसक होना और इतिहास से बचकाना छेड़खानियों से हमें बचना सीखना होगा। दक्षिणपंथ को मात्र भाजपा से जोड़कर परिभाषित करना एक अतार्किक निर्णय है। कोई व्यक्ति दक्षिणपंथी भी हो सकता है और वह अपनी सरकार से आवश्यक मुद्दों पर सवाल भी कर सकता है। दक्षिणपंथ होने का मतलब यह बिल्कुल भी नहीं है कि वह किसी सकारात्मक परिवर्तन का विरोधी हो। दक्षिणपंथी होने की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि एक दक्षिणपंथी बिना नारीवाद जैसे शब्दों को अपमानित किए ही महिलाओं के अधिकारों का समर्थक हो सकता है।

मसलन, वामपंथी चरमपंथियों में किसी भी विषय को क्रांति के स्तर पर मुद्दा बनाकर किसी भी प्रकार से उसे एक सनसनी बना देने तक सीमित होता है। वामपंथी उदारवादी और नारीवादी ब्रा उतारने और ऑर्गज़्म से लेकर सड़क पर कपड़ा-फाड़ प्रतियोगिता के जरिए महिलाओं के सशक्तिकरण की बात करते हैं। जबकि दक्षिणपंथी महिलाओं को शिक्षा, आर्थिक आत्मनिर्भरता के जरिए महिलाओं के अधिकारों पर जोर देते हैं। यदि दुराग्रही वामपंथियों के प्रपंच में उलझे बिना देखें, तो दक्षिणपंथ कहीं ज्यादा तार्किक और समाधान का हिस्सा है, लेकिन ‘नेहरु घाटी सभ्यता’ के दौरान पैदा हुए विचारकों ने कभी किसी को यह सोचने का मौका ही नहीं दिया कि उनके अलावा भी कोई दूसरी विचारधारा इस पृथ्वी पर हो सकती है और उनसे कहीं ज्यादा बेहतर हो सकती है।

इस देश का वामपंथी, उदारवादी, समाजवादी कहीं ना कहीं कॉन्ग्रेस को अपनाकर चलता है। लेकिन, उन्होंने यह खेल इतनी चतुराई के साथ खेला कि किसी को कभी इसकी भनक नहीं लगने दी और इसकी आड़ लेकर अपने हर झूठ को समाज का सच बनाकर एक कड़ी के रूप में स्थापित करते गए।

‘भीड़’ का राजनीतिक दल और विचारधारा AC कमरों से तय नहीं होती है

इन्हीं सब कड़ियों का नतीजा है कि आज भाजपा के साथ खड़े वर्ग का एक बड़ा वर्ग जहाँ उदारवादियों का है, तो दूसरी ओर एक उग्र समूह भी भाजपा में अपनी आस्था जता रहा है। देखा जाए तो यह वर्ग उग्र एक ही दिन में नहीं हुआ, ‘उदार वामपंथियों’ ने धीरे-धीरे कर के देश में अपनी विचारधारा का बीज इस तरह से बोया कि हर दूसरी विचारधारा बहुत छोटी खुद ही नजर आने लगी। जिसे आज का अवार्ड वापसी गैंग और कथित विचारक भाजपा का उग्र चेहरा बताती है, इन्हीं विचारकों ने उन्हें समय-समय पर अपनी कुलीनता के सामने लज्जित करने का प्रयास किया है।

यही वो ‘उदार विचारक’ हैं, जो अपने AC कमरों में बैठकर पर्यावरण पर चिंता व्यक्त करते हैं, भीड़ को ‘भक्त’ ठहरा देते हैं। जबकि, भीड़ के बीच उतरने पर इन्हें पता चला कि जिन लोगों से ये मार खा रहे थे, वो कॉन्ग्रेस समर्थक थे। ये अपने मालिकों द्वारा दिए जा रहे फ्री के इंटरनेट से जब मर्जी, जिसे मर्जी अनपढ़ और मूर्ख साबित करते हैं। यह बहुत आसान होता है कि विपरीत मत रखने वालों को घृणा की दृष्टि से उसे अशिक्षित और उग्र भीड़ ठहरा दिया जाए, लेकिन वास्तविकता उस भीड़ का हिस्सा होने पर ही सामने आती है। यह उग्र समूह सिर्फ बंद AC कमरों से भाजपा समर्थक या दक्षिणपंथी ठहराए जा सकते थे, भीड़ का हिस्सा होने पर ये उनके अन्नदाता निकल आते हैं।

दक्षिणपंथ और वामपंथ

देखा जाए तो वामपंथ का उदय राज परिवारों और पूंजीवादी व्यवस्थाओं के शोषण एवं अत्याचारों के विरुद्ध एक प्रतिक्रियात्मक विचारधारा के कारण हुआ था। धुर वामपंथी विचारधारा में वामपंथ के आड़े आ रहे प्रत्येक व्यक्ति, वस्तु और विचारधारा का विनाश करना जायज है। 20वीं सदी में माओ त्से तुंग ने चीन में पूरी ताकत से इस विचारधारा पर एक क्रूर शासन स्थापित किया था और करोड़ों लोगों को मौत के घाट उतारा। रूस में लेनिन और बाद में जोसेफ स्टालिन ने वामपंथ के नाम पर भीषण नरसंहार किया।

दूसरी ओर दक्षिणपंथी विचारधारा को हमेशा से ही जातिगत, सामाजिक मतभेद, कट्टर और रूढ़िवाद पर आधारित बताया गया है। क्रांति के नाम पर नरसंहार करने वाले वामपंथियों को देखकर कुछ सामाजिक चिंतकों के हाथ-पाँव फूल गए थे। शायद कार्ल मार्क्स को भी यह अंदाजा नहीं था कि क्रांति हथियारों में तब्दील हो जाएगी। बावजूद इसके, क्रांति के इस मसीहा के जन्म को ही 200 साल बाद भी कुछ नव-विचारकों द्वारा पूजनीय माना जाना तय हुआ है।

इस प्रचंड नरसंहार और हिंसा के बाद वामपंथ ने चतुराई से एक नकाब ओढ़ा। इसने खुद को समाजवाद के साँचे में ढालने का प्रयत्न किया, ये वही नकाब हैं जिन्हें हम अक्सर टीवी और अन्य जगहों पर ‘अच्छी बातें’ करते हुए देखते हैं और हम स्वतः ही उनकी वास्तविकता जाने बिना आकर्षित हो जाते हैं। हालाँकि, समाजवाद के इस नरम चेहरे के कुछ अंश हमें भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के वक़्त भी नजर आए। लेकिन भारतीय जनमानस कभी भी वामपंथी गंदगी की वास्तविकता को पूर्णरूप से वहन कर पाने में सक्षम नहीं रहा।

वाम और दक्षिण शब्दों का इतिहास यह है कि फ़्रांस में क्रान्ति से पूर्व की एस्तात झ़ेनेराल नामक संसद में सम्राट को हटाकर गणतंत्र की माँग करने वाले और धर्मनिरपेक्षता चाहने वाले अक्सर सम्राट की बाईं ओर बैठा करते थे, जबकि सम्राट का समर्थन करने वाले लोग उनकी दाईं ओर बैठते थे। इसलिए सत्ता और शासन से निराश लोग अक्सर वामपंथी कहलाए जाते हैं। वर्तमान समय में पूँजीवाद, रूढ़िवादिता आदि से सम्बंधित विचारधाराओं को अक्सर दक्षिणपंथ कहा जाने लगा है। हालाँकि, एक समय ऐसा भी था जब वामपंथ को मानने वालों में सिर्फ बुद्धिजीवी लोग ही हुआ करते थे।

मशहूर दार्शनिक एवं आलोचक नोम चोम्स्की (Noam Chomsky) ने प्रोपगैंडा को सबसे सही तरह से परिभाषित किया है। उनका कहना था – “That’s the whole point of good propaganda. You want to create a slogan that nobody’s going to be against, and everybody’s going to be for. Nobody knows what it means, because it doesn’t mean anything.” यानी, “प्रोपगैंडा का प्रमुख उद्देश्य यही है। आप एक ऐसा नारा बना देना चाहते हैं जिसके विरुद्ध कोई न हो और जिसका सब समर्थन करेंगे। कोई नहीं जानता उस नारे का क्या मतलब है, क्योंकि उसका कोई मतलब है ही नहीं।”

दक्षिणपंथ को ‘कॉन्ग्रेस’ होने से बचने के लिए तथ्य को स्वीकार करना सीखना होगा

इन उदारवादी विचारकों को लगता आया है कि सूचना से लेकर शिक्षा इनकी बपौती है और यही असल वजह है कि दूसरे वर्ग के प्रति इनकी हे दृष्टि ने एकबार फिर नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बना दिया। इसलिए दक्षिणपंथ को यदि अपनी पवित्रता बनाए रखनी है, तो उसे अपने ही एक बड़े वर्ग से संघर्ष करना होगा। यह भी सच है कि यह संघर्ष बहुत लम्बे समय तक चलेगा, लेकिन यह फासला रखना जरूरी है, ताकि हम भाजपा को कॉन्ग्रेस की तरह ही जमीन की धूल खाते हुए ना देखें। हमारा वर्तमान कर्तव्य सूचनाओं को सही दिशा देना होना चाहिए ताकि कुछ सृजन हो सके। इतिहास से हम सबक अवश्य ले सकते हैं लेकिन हम इतिहास में ही इतने मुग्ध न हो जाएँ कि हमें वर्तमान में ही अपनी जड़ों को स्थापित करने का ध्यान ना रहे।

दक्षिणपंथ के पास हर प्रकार के उदाहरण मौजूद हैं। यहाँ सरदार पटेल से लेकर अटल बिहारी वाजपयी और राम मनोहर लोहिया से लेकर जॉर्ज फर्नांडिस तक के उदाहरण मौजूद हैं। जबकि कॉन्ग्रेस की हर शाख पर राहुल गाँधी बैठा है। हमें इसे बेहतर तरीके से समझने के लिए प्रसिद्ध अमरीकी राजनीतिशास्त्री डेविड नोलान के नोलान चार्ट को जरूर पढ़ना चाहिए। नोलन ने वर्ष 1969 में किसी भी पंथ और विचारधारा के लिए एक बेहद स्पष्ट ग्राफ बनाया था। जिससे हम किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व का राजनैतिक झुकाव और उसके प्रोपगैंडा के सामर्थ्य को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं और अपनी परिभाषा तय कर सकते हैं।

नोलान चार्ट

नोलान ने इस चार्ट के माध्यम से हमारे राजनीतिक झुकाव को लेफ्ट लिबरल, राइट कंज़र्वेटिव, लिबेरटेरियन, ऑथोरिटेरियन या तानाशाही और सेंट्रिस्ट में परिभाषित किया है। इस चार्ट के माध्यम से स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आज तक के अपने हर उस नेता को जरूर आजमाइए, जिस पर आप आँख मूँदकर यकीन करते आए हैं।

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आशीष नौटियाल
पहाड़ी By Birth, PUN-डित By choice

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