Tuesday, September 29, 2020
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कश्मीर पर The Wire की कवरेज घटिया हिन्दूफ़ोबिक प्रोपेगंडा के अलावा कुछ नहीं है

कश्मीर की संस्कृति लाउडस्पीकर से हिन्दुओं को डराने के लिए चिंघाड़े जा रहे जिहादी नारों की संस्कृति नहीं, "नमस्ते शारदे देवी काश्मीरपुरवासिनि। त्वामहं प्रार्थये नित्यं विद्यादानं च देहि मे ॥" की संस्कृति है। काल भैरव और मार्तण्ड मंदिर की संस्कृति है।

जम्मू-कश्मीर मुद्दे पर 370 हटने के बाद से The Wire ने केवल झूठ बोला है और ज़हर उगला है। चाहे वहाँ आतंक के हालात का मुद्दा हो, वहाँ के ‘स्थानीय निवासियों’ (‘कश्मीरी मुसलमानों’ पढ़ें) को मिल रहे विशेष अधिकारों का मुद्दा हो, या कश्मीरी पंडितों की स्थिति हो, हर मुद्दे पर केवल झूठ और भ्रमित करने वाले अर्धसत्य। उनके स्तम्भकार तो इसमें बृहदारण्यक उपनिषद और ब्राह्मणों को भी कोसने का ‘एंगल’ ढूँढ़ लाए!

5 अगस्त से चालू झूठ की खेती

झूठ की खेती चालू तो 5 अगस्त से ही कर दी गई थी, क्योंकि 370 हटने का अंदेशा सताने लगा था। तभी से ‘मोदी सरकार नाकाम है’ का प्रपंच रचना वायर के सम्पादक सिद्धार्थ वरदराजन ने चालू कर दिया था। इसका एक उदाहरण देखिए:

इस इन्फोग्राफिक में, जोकि गृह मंत्रालय के आँकड़ों के आधार पर खुद द वायर ने बनाया है, सबसे ऊपर की हरी रेखा (जो जिहादी घटनाओं में बढ़ोतरी दिखाती है) और सबसे नीचे की लाल रेखा (मारे गए सुरक्षा बल के जवान) में बढ़ोतरी की तो बात की गई है, लेकिन इनके बीच की नीली रेखा (मारे गए जिहादी) को ‘गोल’ कर दिया गया है, उस पर ध्यान जाने ही न दे कर।

नीली रेखा से पता चल जाता है कि जिस अनुपात में सुरक्षा जवान वीरगति को प्राप्त हुए हैं, वैसे ही मारे जा रहे जिहादियों की भी संख्या बढ़ी है। यानि इस आँकड़े की ज़्यादा सही विवेचना यह होगी कि सुरक्षा बलों और सरकार की जिहादियों के खिलाफ सरगर्मी बढ़ी है, जिसके चलते हमारे वीरगति को प्राप्त होने वाले जवानों की भी संख्या बढ़ी है।

दो लोगों से बात कर उसे पूरे कश्मीर की बात बता दी

सिद्धार्थ वरदराजन ने दावा किया कि वे घाटी में खूब घूमे और ‘आम जनता’ से मिलकर 370 के बारे में उनकी राय जानी। वीडियो भी बना लाए, और आपको-हमें उससे बरगलाने की कोशिश की। बिलकुल घूमे होंगे, बिलकुल मिले होंगे। इसपर शक नहीं किया जा सकता।

लेकिन अगर वीडियो को देखा जाए तो केवल दो लोगों से बात की गई है। मैं नाम न भी बताऊँ तो भी यह तुक्का मारना कोई मुश्किल नहीं है कि इन दो लोगों का संबंध किस ‘समुदाय विशेष’ से है। और बातें भी वे उसी तरह की करते हैं जिसके लिए ‘समुदाय विशेष’ जाना जाता है, और जिसके चलते पूरा देश 370 के ख़िलाफ़ था- जिहाद और भड़केगा, हुर्रियत की सोच सही है, अब ‘मुख्यधारा के नेता’ भी अलगाववाद की भाषा बोलेंगे, अमन तब तक कायम नहीं होगा (‘तब तक हम कायम होने नहीं देंगे‘ पढ़ा जाए) जब तक मसला-ए-कश्मीर हल नहीं होगा, हम भी देखते हैं ये क्या करेंगे, हम 6 महीने का राशन रखते हैं घरों में…

दो कश्मीर घाटी के मुसलमानों की सोच को, उनकी धमकी को पूरी घाटी द्वारा दी गई धमकी तो बेशक माना जा सकता है, क्योंकि बुरहान वानी से लेकर ज़ाकिर मूसा और पुलवामा के हमलावर आदिल अहमद डार के जनाज़े में हज़ारों की संख्या में जुटकर कश्मीरी मुसलमान तो अपनी वफ़ादारी बयान कर ही दे रहे हैं। लेकिन बात यह है कि सूबे में केवल कश्मीरी मुसलमान नहीं रहते हैं, वहाँ कश्मीरी पंडित भी हैं, जम्मू के डोगरा राजपूत भी हैं, पंजाब से कश्मीर में सफाई कर्मी के रूप में आए वाल्मीकि समुदाय के लोग हैं, लद्दाख के बौद्ध हैं, जैन और सिख भी हैं। कुछ अनीश्वरवादी भी हैं। भले ही वे वहाँ ‘अल्पसंख्यक’ हैं, लेकिन संविधान की प्रस्तावना में लिखा है कि भारत ‘सेक्युलर’ देश है, जिसकी व्याख्या यह की जाती है कि अल्पसंख्यकों का ध्यान रखना, यह ध्यान देना कि कहीं बहुसंख्यक उनके अधिकारों का हनन न करें, सरकारी मशीनरी का कर्त्तव्य है- यानि उनकी इच्छा को दबाया नहीं जा सकता है।

लेकिन यह ‘सेक्युलरिज़्म’ वरदराजन की डाक्यूमेंट्री में कहाँ है? उन्होंने एक भी हिन्दू, सिख, जैन या नास्तिक से बात की क्या? पूछा क्या कि वे अपने राज्य में, अपने पास-पड़ोस में ऐसे लोगों की भीड़ से खुश हैं क्या जो बुरहान वानी के जनाज़े में जाते हैं? उनके क्या विचार हैं इस बारे में कि उनके आसपास के उपासना स्थलों से लाउडस्पीकरों पर ‘नारा-ए-तकबीर’ और ‘कश्मीर में अगर रहना होगा तो अल्लाहु-अकबर कहना होगा’ की तकरीर लगातार जारी है, यह सिद्धार्थ वरदराजन ने पूछा?

कश्मीर के ‘बाप’ ऋषि कश्यप हैं, अब्दुल्ला नहीं

एक रुदाली जो वायर पर बार-बार यह हो रही है, जोकि कश्मीर के दो ‘शांतिप्रिय’ लोगों के वरदराजन वाले इंटरव्यू में भी दिखी, वह यह है कि इस फ़ैसले से कश्मीर की तस्वीर बदल जाएगी, उसकी ‘असली संस्कृति’ गुम जाएगी। कश्मीर पर बोले जा रहे सभी झूठों में इससे बड़ा झूठ नहीं हो सकता।

कश्मीर की संस्कृति लाउडस्पीकर से हिन्दुओं को डराने के लिए चिंघाड़े जा रहे जिहादी नारों की संस्कृति नहीं, “नमस्ते शारदे देवी काश्मीरपुरवासिनि। त्वामहं प्रार्थये नित्यं विद्यादानं च देहि मे ॥” की संस्कृति है। काल भैरव और मार्तण्ड मंदिर की संस्कृति है।

और यह संस्कृति केवल कश्मीरियों से सुरक्षित हो ऐसा भी नहीं। हज़ारों वर्ष से कश्मीर में हिन्दू आते रहे, बसते रहे और यहाँ की संस्कृति को और गाढ़ा ही करते रहे, फ़ीका नहीं। कश्मीर की संस्कृति यह कभी नहीं रही कि बाहर से आने वालों पर रोक-टोक लगाई जाए। केरल से आए शंकराचार्य को शारदा पीठ ने (जो जिहादियों के चंगुल में गुलाम कश्मीर में है) सिंहासन पर बिठा लिया। दुनिया भर के मंत्र साधक शिव मंत्रों की साधना के लिए यहाँ आते थे, और यहीं बस जाते थे।

हालाँकि, हिन्दू धर्म में इतिहास के किसी एक बिंदु को ‘बाप’ मानने की बात ही नहीं है, लेकिन अगर तय करना ही हो तो कश्मीर के ‘बाप’ ऋषि कश्यप हैं, शेख अब्दुल्ला या उनकी गुंडई से बना 370 नहीं; कश्मीर की माई देवी शारदा हैं, न कि आसिया अंद्राबी या महबूबा मुफ़्ती।

हिन्दूफ़ोबिया का मसाला है जरूरी

वायर किसी भी मसले पर लिखे और उसमें हिन्दूफ़ोबिया न हो, तो बात अधूरी लगती है। और सृष्टि के इसी नियम का पालन करने के लिए 35A के बारे में बात करते हुए वायर के स्तम्भकार बद्री रैना लिखते हैं कि भारतीय सरकारों और राजनीति में स्वेच्छाचारिता का कारण “ब्राह्मण हिन्दुओं को सिखाया गया ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ है, जिससे स्वार्थ और स्वेच्छाचारिता भर जाती है।”

इस एक वाक्य में जो नीच दोगलापन भरा है, उसे काटते हुए एक अलग लेखमाला लिखी जा सकती है। लेकिन फ़िलहाल अगर संक्षेप में देखें तो यह निम्न कारणों से बोगस तर्क है:

पहला, जानबूझकर अहम् ब्रह्मास्मि की गलत व्याख्या की गई है। यह यजुर्वेद के बृहदारण्यक उपनिषद से लिया गया ‘महावाक्य‘ है, जिसमें ‘ब्रह्म’ का अर्थ सर्वशक्तिशाली या गैर-जिम्मेदार, स्वेच्छाचारी नहीं होता, बल्कि यह व्यक्ति को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को अपने शरीर और अपने कुशलक्षेम जितना ही महत्व देने की बात करता है। यानि, इस महावाक्य से यह सिखाया जाता है कि कोई भी निर्णय लेते समय केवल अपने हित का नहीं, पूरे विश्व और ब्रह्माण्ड को इस निर्णय से क्या नफ़ा-नुकसान होगा, यह सोचो।

दूसरा, यह केवल ब्राह्मणों को नहीं, गुरुकुल में जाने वाले हर एक जाति और वर्ण के बच्चे को सिखाया जाता था। यहाँ रैना बहुत ही ‘कैज़ुअल’ तरीके से जातिवादी टिप्पणी कर रहे थे।

तीसरा, हिन्दू धर्म की अच्छाई-बुराई से भारत देश का चरित्र कब से बनने-बिगड़ने लगा? वायर का पत्रकारिता का समुदाय विशेष तो भारत के हिन्दू चरित्र को नकारने के लिए ही फंडिंग पाता है! तो अगर भारत राष्ट्र-राज्य की उदारता, बहुलता जैसी अच्छाईयाँ हिन्दू नहीं ‘सेक्युलर’ हैं, तो बुराईयाँ हिन्दू नहीं हो सकतीं।

कुल मिलाकर वायर की पूरी कश्मीर रिपोर्टिंग केवल और केवल झूठ और प्रोपेगंडा पर ही आधारित है। यही नहीं, इसका मकसद भी केवल भारत की बुराई नहीं, बल्कि ‘हिन्दू फ़ासीवाद’, ‘डरा हुआ मुसलमान’ के दुष्प्रचार से हिन्दुओं को बदनाम करने के साथ दबाए रखना, और ‘इस्लाम खतरे में है’ के हौव्वे को भड़काकर जिहाद को बढ़ावा देना है। और इन सब पैंतरों के पीछे की प्रेरणा हिन्दूफ़ोबिया, हिन्दू-बहुल और हिन्दू-चरित्र वाला होने के कारण भारत देश से नफ़रत है।

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