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Saturday, May 30, 2020
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‘जब भीड़ अल्लाहु-अकबर चिल्लाते हुए आगे बढ़ी तो उनसे बचने के लिए हम जहर पीने के लिए भी तैयार थे’

जब मैं मंदिरों में तोड़-फोड़ और मुस्लिम भीड़ की अराजकता और दंगे की खबरें देखती हूँ, तो दिल्ली से 80 किमी दूर मेरठ दंगे से जुड़ी मेरी यादें ताजा हो जाती हैं, जिस दंगे के आतंक का सामना हमने 1987 में किया था।

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vinirishhttp://vinirish.blogspot.com/
Social media activist and Freelance author. Writes on Geopolitics, Kashmir and current affairs. Active reader.

दिल्ली के हौज़ काज़ी में बीते दिनों सांप्रदायिक तनाव और मंदिर में तोड़-फोड़ की घटना सामने आई थी। ऑपइंडिया, स्वराज्य, ऑर्गेनाईजर और सुदर्शन टीवी को छोड़कर बाकी मीडिया हाउस ने तब तक इसे नजरअंदाज किया, जब तक कि एसएम ने इसे रिपोर्ट करने के लिए दबाव नहीं बनाया। मेरठ में दंगे भड़कने की खबर, प्रह्लादनगर से पलायन करने वाले परिवारों की खबर ने पुरानी यादें ताजा कर दी।

मैं राजधानी दिल्ली से 80 किमी दूर उत्तर प्रदेश के छोटे से शहर मेरठ में पली-बढ़ी हूँ। पश्चिम यूपी के छोटे से शहर में 70-80 के दशक में लोगों की ज़िंदगी काफी नीरस रही। इस दौरान सभी लोग साल भर होने वाले हिन्दू- मुस्लिम दंगों के साथ ही पले-बढ़े हैं। दंगे हमेशा मध्यम वर्गीय परिवार की मौजूदगी से दूर दूसरे तबके में होते थे।
हम हमेशा से जानते थे कि दंगे प्रायोजित होते थे और इसकी भयावहता ने हम प्रायः अछूते। मेरठ में मध्यम वर्ग और उच्च मध्यम वर्ग के हिंदू रहते थे। हिंदुओं और मुसलमानों में गहरी दोस्ती थी, जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ी। वहाँ पर उस समय ऐसी स्थिति थी कि अगर दंगे के समय कोई हिंदू, मुस्लिम बहुल इलाके में मुस्लिम दोस्त के घर फँस जाता है, तो वो सुरक्षित रहेगा। दंगा के शांत होने के बाद माहौल को देखते हुए उसे बाहर निकाला जाएगा।

मेरी दादी ने एक उर्दू अखबार की सदस्यता ली थी। यह शेर-ओ-शायरी को जानने के लिए सामाजिक परिष्कार का संकेत था। हिंदू घरों के दर्जी मुस्लिम थे, जिनकी चूड़ीदार और शरारा बनाने की विशेषज्ञता नायाब थी। मुस्लिम बहुल इलाकों में घुमावदार गलियाँ हमारे लिए भूलभुलैया जैसी थी। मोहल्ले की महिलाएँ हर सोमवार लगने वाले बाजार में बुर्का पहना करती थी, जो कि मेरठ के मध्यम वर्ग या उच्च मध्यम वर्ग के मुसलमानों में इतनी साधारण बात नहीं थी। इसके अलावा मुहर्रम के जुलूसों के दौरान हिन्दू- मुस्लिम के बीच की प्रगाढ़ता देखने को मिलती थी। मगर, 1986 से 1987 के बीच इस सौहार्द ने अचानक एक अलग ही मोड़ ले लिया। दंगे अधिक तीव्र और हिंसक होते गए। यहाँ तक कि मध्यम में भी यह बीमारी फ़ैल गई।

शास्त्री नगर में एक हिंदू बहुल मध्यवर्गीय कॉलोनी में सुबह-सुबह का समय था। 1987 की गर्मी के मौसम में सुबह में अचानक से दूर-दूर तक अल्लाहु अकबर के नारे गूँजने लगे और धुएँ के काले बादल आकाश पर छा गए। इससे पहले कि हम कुछ जान पाते कि मामला क्या है, हापुड़ रोड (मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र) के बगल में शास्त्री नगर (एक हिंदू बहुल कॉलोनी) के बाहरी इलाके में रहने वाले अधिकतर लोग अचानक से भागने लगे। कोई पैदल भाग रहा था, कोई साईकल पर, तो कोई स्कूटर पर भाग रहा था। उन्होंने कहा कि एक मुस्लिम भीड़ ने उन पर हमला किया था और वो उनके घरों में जलते हुए टायर फेंक रहे थे। उन्होंने यह भी कहा कि हापुड़ रोड पर एक पेट्रोल पंप भी जला दिया गया।

हम लोगों ने छत पर जाकर देखा, एक भीड़ जली हुई टायर फेंकते हुए और ‘अल्लाहु अकबर’ का नारा लगाते हुए  मेन रोड की तरफ जा रही थी। मुझे याद है कि मेरे पिता, जो कि एक समर्पित कम्युनिस्ट थे, उन्होंने हॉकी स्टिक उठाकर मेरे छोटे भाई को कॉलोनी की सुरक्षा करने के लिए कहा। सुबह-सुबह आस-पास के गाँवों से दूधवाले साईकल से आ रहे थे। जब उन्होंने भीड़ को देखा, तो वो भाग गए और देशी कट्टा (बंदूकें) लेकर लौटे और हर-हर महादेव के नारों के साथ भीड़ का सामना करना शुरू कर दिया।

उस समय मेरठ की सांसद कॉन्ग्रेस की मोहसिना किदवई थीं। मेरी दादी भी एक कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता थीं, लेकिन वह दिल्ली में थी और हमारी मदद करने के लिए वहाँ पर कोई नहीं था। एक चाचा मदद के लिए पुलिस चौकी गए, लेकिन वहाँ जाकर पता चला कि पुलिस चौकी में पुलिस फोर्स मौजूद ही नहीं थी, सभी पुलिसकर्मियों को किसानों की रैली से निपटने के लिए दिल्ली भेजा गया था। वहाँ लाठियों के साथ कुछ ही पुलिसवाले थे।

अचानक हमें एहसास हुआ कि हम असहाय और बेहद असुरक्षित थे। हमारे पास हॉकी स्टिक्स, लाठियों और किचेन में इस्तेमाल की जाने वाली चाकू के अलावा अन्य कोई हथियार नहीं था। इस बीच गाँव वालों ने भीड़ को किसी तरह हटा दिया था। चूँकि, कॉलोनी नई थी, चारों तरफ खुला मैदान था, तो हमले हर तरफ से हो रहे थे। मैं उस आतंक, विश्वासघात और उस बेबसी वाले अनुभव को कभी नहीं भूल सकती। राजीव गाँधी पीएम थे। वह एक युवा आइकन थे। ये सब कैसे हो रहा था? पुलिस कहाँ थी? सांसद कहाँ थे? आखिर, हमें असुरक्षित क्यों छोड़ दिया गया?

ऐसा हफ्तों तक चलता रहा। कर्फ्यू लगा दिया गया। रमजान का महीना था। लोग पूरी रात घर के बाहर पहरा देते रहे। बाहरी क्षेत्रों के निवासी हमारे साथ रहने आए। देर रात तक पार्क में महिलाओं का जमघट लगा रहा और फिर सभी लोग ऊपर के घरों में सोने चले गए, जिसे सुरक्षित माना जाता था। हमने सोच लिया था कि अगर हमारी कॉलोनी खत्म हो गई, तो हम चूहे मारने वाला जहर पी लेंगे। हमने ईंटें एकत्रित कीं और इसे छत पर रखा, ताकि अगर हम पर हमला किया जाता है, तो इससे अपनी रक्षा कर सकें। रात में किसी भी तरह की भीड़ के हमले की आवाज़ सुनने पर काफी डर लगता था। उनके कुछ प्रयासों को पुलिस और हमारी अपनी चौकीदार पार्टियों ने नाकाम कर दिया था।

सुबह में पास की मस्जिद से ड्रम बजने की आवाजें आती थीं। फिर लाउडस्पीकर पर नारे लगाए जाते थे। हिंसा की धमकियों के बाद पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए जाते। हमें डराया जाता था कि बकरों की जगह हिंदुओं की कुर्बानी दी जाएगी। इस बीच कई अफवाहें, झूठी खबर भी फैलाई गई। किसी ने कहा कि मुस्लिमों ने चंडी माता मंदिर को तोड़ दिया। फिर उन्होंने उन हिंदू इलाकों के बारे में भी बताया, जिन पर उन लोगों ने हमला किया था और उनमें कितने लोग मारे गए थे। इस तरह की घोषणा हमें डराने के लिए, हमारे अंदर खौफ पैदा करने के लिए किया जा रहा था। हालाँकि, बाद में पुलिस ने इन सभी अफवाहों को नकार दिया।

हमारे इलाके में कुछ मुस्लिम परिवार भी थे, जो कि सुरक्षित थे। हम जानते थे कि वे इस पूर्वग्रह का हिस्सा नहीं थे। लेकिन फिर एक और परेशान करने वाली घटना हुई। एक पूरी तरह से अनजान शख्स हमारे कॉलोनी में आया और मुस्लिम परिवारों के बारे में पूछा और फिर हमें उनकी सुरक्षा के खिलाफ चेतावनी दी। पुलिस ने मुस्लिम परिवारों को रात के अंधेरे में मेरठ के बाहर रिश्तेदारों के पास भेज दिया। अगले दिन फिर कई अपरिचित लोग आए, लेकिन पुलिस ने उन्हें बताया कि मुस्लिम परिवार दंगों से पहले ही वहाँ से कहीं चले गए और पुलिस ने उन्हें उनका खाली घर दिखाया।

अंत में मेरठ में पीएसी तैनात कर दी गई। वे हमारे लिए हीरो थे। उन्हें तैनात करने के बाद मस्जिद खामोश हो गए। पड़ोस शांत हो गया और हम सब अपने अपने घरों में सोने लगे। अजनबी गायब हो गए और मुस्लिम परिवार वापस आ गए। हमारे अंदर पुराने दोस्तों के लिए कोई कड़वाहट नहीं थी। हमें पता था कि हमने इस पागलपन का हिस्सा नहीं बनना है और वे जानते थे कि वे हमारी कॉलोनी में सुरक्षित हैं।

इंडिया टुडे पत्रिका के संस्करण में दंगों की विभीषिका को प्रकाशित किया गया था। मुझे उम्मीद थी कि हमारे दंगों को भी कवर किया जाएगा। मीडिया के साथ मेरा पहला अविश्वास तभी शुरू हुआ था। इसमें हिंदू बहुल क्षेत्रों में हुए दंगों का कोई कवरेज नहीं था। हमारे लिए पीएसी भगवान थे, लेकिन मीडिया के लिए कुछ और। फिर बाद में सब कुछ सामान्य हो गया। हमारा मुस्लिम धोबी और इस्त्री करने वाला लड़का, जो उस इलाके में रहता था, जहाँ से भीड़ आई थी, उसने हमें बताया था कि अजनबियों ने इस उन्मादी भीड़ का निर्माण किया था।

यह आखिरी बड़ा दंगा मेरठ में हमने देखा था। लेकिन परेशान करने वाले सवाल आज भी बने हुए हैं। भीड़ का वह कौन सा हिस्सा था? पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे मस्जिदों से क्यों लगाए गए? कोई पुलिस फोर्स वहाँ क्यों नहीं था? उन्हें दिल्ली क्यों भेजा गया? हिन्दू कॉलोनियों में मुस्लिम परिवारों के ऊपर हिंसा करने वाले अनजान लोग कौन थे? जब मैं मंदिरों के तोड़-फोड़ और मुस्लिम भीड़ की अराजकता और दंगे की खबरें देखती हूँ, तो दिल्ली से 80 किमी दूर मेरठ दंगे से जुड़ी मेरी यादें ताजा हो जाती हैं, जिस दंगे के आतंक का सामना हमने 1987 में किया था।

2019 आ गया है। दिल्ली इस तरह की घटनाओं से बुरी तरह से प्रभावित है। किसे दोषी ठहराया जाए? वोट बैंक की राजनीति? आज भी अविश्वास का भाव बना रहता है। तो क्या हौज़ काज़ी, मेरठ, आगरा, मुज़फ़्फ़रनगर, हरियाणा, सूरत, पश्चिम बंगाल और अन्य ऐसी जगहों पर हिंदू परिवारों को उनके साथ रहना चाहिए, जहाँ मुस्लिम आबादी काफी है और जहाँ अब सड़कों पर उन्मादी और अराजक भीड़ निकल रही है। ये मॉब क्यों इस तरह से हमला कर रही है? क्या पुलिस लाचार है, इसलिए? आखिर, अचानक हुई इन घटनाओं के पीछे की असली कहानी क्या है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अभी सत्ता में हैं। मैं भारत में आतंक के ऐसे पलों से छुटकारा पाना चाहती हूँ। क्या कभी मेरा यह सपना पूरा होगा? आखिर कब तक अमन और शांति से रहने के लिए भी ज़द्दोज़हद करनी होगी। आखिर कौन देगा इसका जवाब?

(यह लेख मूल रूप से लेखिका के ब्लॉग पर प्रकाशित किया गया है। जिसका अनुवाद रचना कुमारी ने किया है।)

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