प्रियंका गाँधी के आने से सोनिया को हुआ ‘जबरदस्त’ घाटा: पोस्टर-गणित से समझें राजनीति का खेल

गणित स्पष्ट है। प्रियंका गाँधी के आने से भाजपा पर क्या असर पड़ेगा यह बाद की बात है, लेकिन इसका सीधा असर सोनिया पर जरूर पड़ा है।

“एक तस्वीर हजार शब्दों के बराबर होती है।” प्रियंका गाँधी वाड्रा की एक पोस्टर को देखते हुए अचानक मेरे दिमाग में यह पंक्ति याद आ गई। इसके बाद मैंने सोचा कि भारतीय राजनीति में ट्रेंड कर रहीं प्रियंका गाँधी की पॉलिटिक्स को तस्वीर व पोस्टरों की मदद से समझा जाए। यहाँ एक जरूरी बात यह है कि जैसे बिना किसी पूर्वग्रह से ग्रसित हुए मैंने यह लेख लिखा है, आप भी बिनी किसी पूर्वग्रह के पूरा लेख पढ़ जाइए। आधा लेख पढ़कर कंफ्यूजन में पड़ने के बजाय नहीं पढ़ना ज्यादा बेहतर होगा।

यह संभव है कि मैंने इन पोस्टरों के जरिए जितना कुछ भी समझा है, आप उससे थोड़ा ज्यादा या कम समझ सकते हैं। यह पूरी तरह से आपकी कल्पनाशीलता पर निर्भर करता है। मैंने प्रियंका गाँधी वाड्रा से जुड़े तीन पोस्टर को लेकर यह आर्टिकल लिखा है। यह तीनों ही पोस्टर प्रियंका गाँधी वाड्रा के प्रत्यक्ष रूप से राजनीति में आने से पहले और आने के बाद की है।

इन तीनों ही पोस्टरों से जो संकेत मिल रहे हैं उसे समझने की कोशिश करेंगे यहाँ। प्रत्यक्ष रूप से राजनीति में आने से पहले प्रियंका रायबरेली और अमेठी में कॉन्ग्रेस पार्टी के लिए प्रचार करती रही हैं। ऐसी बात भी नहीं है कि प्रियंका सिर्फ अपने भाई और माँ के लिए ही इन दोनों लोकसभा क्षेत्रों में चुनाव प्रचार करती हैं। बल्कि यह कहा जाता है कि प्रियंका ने 1999 में रायबरेली से कॉन्ग्रेसी उम्मीदवार सतीश शर्मा के लिए पहली बार खुल कर चुनाव प्रचार किया था।

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प्रियंका ने इस चुनाव प्रचार के दौरान कई बार कहा, “रायबरेली इंदिरा गाँधी की कर्मभूमि है। भारत की उस बेटी की कर्मभूमि, जिसे मैं सबसे ज्यादा सम्मान करती हूँ।”

1999 के लोकसभा चुनाव में अरूण नेहरू जैसे कद्दावर नेता को हराना कॉन्ग्रेसी उम्मीदवार सतीश शर्मा के लिए संभव नहीं होता, यदि प्रियंका मैदान में नहीं उतरतीं। इससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि प्रियंका के दिल में रायबरेली के लिए ख़ास जगह है।

दरअसल आपको हम यहाँ इस बात को समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि प्रियंका को रायबरेली से इतना प्रेम क्यों है? शायद इसलिए क्योंकि प्रियंका मानती हैं कि यह लोकसभा क्षेत्र उनकी दादी इंदिरा की कर्म भूमि है, लेकिन अक्टूबर 2018 में छपे एक पोस्टर से यह ज़ाहिर हो गया कि प्रियंका का रायबरेली से भावनात्मक जुड़ाव तो नहीं है।

यह सोचने वाली बात है कि जिस रायबरेली के बारे में प्रियंका कहती रही हैं कि यह क्षेत्र मेरे दिल के करीब है, लेकिन रायबरेली में हरचंपुर रेल हादसा, ऊँचाहार दुर्घटना और रालपुर हादसे में दर्जनों लोगों की मौत के बाद भी प्रियंका पीड़ित लोगों से मिलने भी नहीं पहुँचती हैं। इस बात से रायबरेली को लेकर उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को आसानी से समझा जा सकता है।

रायबरेली में प्रियंका का पोस्टर

मानवीय तौर पर सोनिया, राहुल व प्रियंका तीनों को उन पीड़ित परिवारों से तुरंत मिलना चाहिए था। ऐसा करके शायद प्रियंका पीड़ित परिवार के दिल में अमिट छाप छोड़ पातीं, लेकिन ऐसा नहीं करके उन्होंने एक बड़ी गलती की।

अब बात दूसरे तस्वीर की करते हैं, जो पोस्टर कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा प्रियंका गाँधी को पूर्वी यूपी के महासचिव बनने की घोषणा से पहले की है। इस तस्वीर से साफ़ होता है कि आने वाले समय में जैसे-जैसे पार्टी में प्रियंका का कद बढ़ेगा, पोस्टरों में सोनिया की तस्वीर छोटी होती चली जाएगी।

प्रियंका के कॉन्ग्रेस पार्टी में महासचिव बनने से पहले के पोस्टर की तस्वीर

एक माँ के लिए बेटी के बढ़ते कद को देखना अच्छी बात हो सकती है। लेकिन मामला देश के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार से जुड़ा है, इसलिए कॉन्ग्रेस पोस्टर से सोनिया की तस्वीर का अचानक छोटा और फिर गुम हो जाना एक बड़े राजनीतिक बदलाव का संकेत देता है। संकेत यह है कि अपनी बेटी के ही आगे सोनिया का राजनीतिक कद पार्टी में और आम लोगों के बीच कम होता जा रहा है।

पटना में जन आकांक्षा रैली के पोस्टर की तस्वीर, जिसमें सोनिया नहीं दिख रही हैं

अब बात तीसरी तस्वीर की। दूसरी तस्वीर में हमने देखा कि प्रियंका के आने से सोनिया का राजनीतिक कद कम हुआ। लेकिन पटना जन अकांक्षा रैली के पोस्टर में सोनिया का ना होना, एक बड़ा संकेत देता है। इससे स्पष्ट होता है कि प्रियंका के आने से भाजपा पर क्या असर पड़ेगा यह बाद की बात है, लेकिन इसका सीधा असर सोनिया पर जरूर पड़ा है।

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