Friday, April 19, 2024
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जब ‘हिजाब’ से पितृसत्ता और धार्मिक कुरीतियों की बू आने लगे… तो उसे उतार फेंकना चाहिए

हिजाब पहनना किसी विशेष समुदाय की महिलाओं के लिए सिर्फ तभी तक 'माय लाइफ, माय रूल्स' का हिस्सा बन सकता है, जब तक उन पर वो थोपा न जाए।

1 फरवरी को समूचे विश्व में ‘वर्ल्ड हिजाब डे’ मनाया गया। इस दिन हिजाब के महत्वों पर भी बात की गई और कई देश के कोनों-कोनों में इस पर समारोह का भी आयोजन हुआ। इन समारोह में जो मुख्यत: बातें हुईं, वो यह कि आख़िर मुस्लिम महिलाओं को हिजाब क्यों पहनना चाहिए। इस ‘क्यों’ के एक ज़वाब में हिजाब को मुस्लिम महिलाओं की पहचान बताया गया।

इस दिन को पूरे विश्व में मनाने का एक उद्देश्य है कि सभी धर्मों और विभिन्न पृष्ठभूमि की महिलाओं को एक दिन के लिए हिजाब पहनने और उसे अनुभव करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। साल 2013 में नजमा खान के द्वारा इस वार्षिक कार्यक्रम की स्थापना की गई थी।

आज हिजाब को न केवल इस्लामिक देशों में बल्की अन्य देशों में भी मुस्लिम महिलाओं की छवि का प्रतिबिंब माना जाता है। ऐसे में अब ज़रा सोचिए कितना कठिन होता होगा उन मुस्लिम महिलाओं के लिए खुद को हिजाब से अलग कर पाना, जो इसे अपने जीवन में जगह नहीं देना चाहती हैं और खुली हवाओं में खुले सिर घूमने की तमन्ना रखती हैं।

हिजाब पहनना किसी विशेष समुदाय की महिलाओं के लिए सिर्फ तभी तक ‘माय लाइफ, माय रूल्स’ का हिस्सा बन सकता है, जब तक उन पर वो थोपा न जाए। जब इससे धार्मिक कुरीतियों और पितृसत्ता की बू आने लगे तो इसे जितनी जल्दी मुमकिन हो, उतारकर फेंक देना चाहिए।

लगभग 6 साल होने को है, जब इरान की एक महिला मसीह अलीनेज़ाद ने हिज़ाब के ख़िलाफ़ आंदोलन शुरू किया था। अपने हिजाब को उतारकर इस महिला ने कार की स्टेयरिंग पकड़कर सोशल मीडिया पर अपनी फोटो अपलोड की थी। जिसके बाद सोशल मीडिया पर कई महिलाओं ने उनके समर्थन में अपनी तस्वीरें भी साझा करनी शुरू की थी।

मसीह ने अपनी किताब ‘द विंड इन माय हेयर’ में लिखा है कि वो इरान के एक ऐसे मुस्लिम परिवार में पली-बढ़ी हैं, जिसमें एक लड़की को अपना सर घर के लोगों के आगे भी ढककर रखना होता था। उन्होंने अपनी संस्कृति में औरतों के साथ होती नाइंसाफ़ी को महसूस किया था। अपनी किताब में मसीह ने बताया कि वो मूक लोगों की आवाज़ बनना चाहतीं थी लेकिन इरान में रहते हुए वो हमेशा ही मूक रहीं।

मसीह 2009 से ही यूएस में रह रही हैं। वो गिरफ्तारी की डर की वजह से यूएस से इरान चाहकर भी नहीं जा पाती हैं। वो बताती हैं कि उनके पिता ने उनसे बात भी करनी बंद कर दी है।

आज मसीह के इस आंदोलन से 1000 से ज्यादा महिलाएँ जुड़ चुकी हैं। मतलब साफ़ है कि हिजाब का मामला स्वेच्छा से जुड़ा हुआ तो बिलकुल भी नहीं है।

ईरान की ही राजधानी तेहरान में साल 2017 से 2018 के बीच में लगभग 35 से अधिक हिजाब के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करती महिलाओं को गिरफ्तार किया गया। साथ ही इस बात की भी धमकी दी गई कि अगर कोई भी महिला हिजाब के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करती पाई गई, तो उसे दस साल के लिए जेल में भी डाला जा सकता है।

अब ऐसी स्थिति में सोचिए अंतराष्ट्रीय स्तर पर इस दिन को मनाना क्या वाकई में मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों पर बात करना है या उनकी स्थिति को और भी दयनीय बनाना है।

हिजाब आज मुस्लिम महिलाओं के लिए और भी ज्यादा विमर्श का विषय है क्योंकि बाज़ार से लेकर खेल जगत तक और खेल से सौंदर्य तक हर क्षेत्र में हिजाब को ढाल बनाकर मुस्लिम महिलाओं को इसमें जकड़े रखने की पुरज़ोर कोशिशें की जा रही हैं।

हाल ही में नाइकी जैसी बड़ी कंपनी ने एथलिट के लिए एक डिज़ाइनर हिजाब तैयार किया, जिसको बनाने के पीछे तर्क था कि एथलिट जिसमें सहज है, वो वैसे ही खेले। नाइकी के इस कदम पर तथाकथित नारीवादी लोग वाह-वाही करते नहीं थके।

लेकिन, सोचिए ज़रा! हिजाब की जकड़ मुस्लिम महिलाओं पर कितनी होगी कि जिस बाज़ार का काम हमें विकल्प मौजूद कराना है, वो भी हिजाब के मसले पर सीमित हो गया। ये किसी विशेष धर्म की कुरीतियों को बढ़ावा देना नहीं तो और क्या है कि अब दौड़ के मैदान में भी एक लड़की ‘खिलाड़ी’ बनकर नहीं बल्की ‘मुस्लिम खिलाड़ी’ बनकर दौड़ेगी।

नाइकी ही एक ऐसा नाम नहीं है, जिसने हिजाब को मुस्लिम महिलाओं की सहज़ता से जोड़ा हो। इसी दिशा में पिछले साल ऐसा काम इंडोनेशिया के डिज़ाइनर अनिएसा हसीबुआँ ने किया था और उस समय भी हिजाब को न्यूयॉर्क फ़ैशन वीक में बहुत वाहवाही मिली थी।

अब सोचिए अगर हर स्तर पर इसी तरह से मुस्लिम महिलाओं के लिए हिजाब की अनिवार्यता को आधुनिक रूप दे-देकर पेश किया जाएगा तो आने वाले समय में ये ‘मुस्लिम महिलाएँ’ खुद के भीतर की महिला को मारकर सिर्फ ‘मुस्लिम’ को ही जिंदा रख पाएँगी।

आज देश-विदेश में हिजाब को लेकर जो कॉन्सेप्ट चल रहा है, वो बिल्कुल ऐसा है ही कि विश्व के कोने-कोने में लड़कियों को ‘जंजीर’ से छुड़ाने की जगह उनके हाथ-पाँवों को ‘डिजाइनर जंजीरों’ से जकड़ दिया जाए। ताकि वे मॉडर्न बनने की चाह में खुद के अधिकारों पर बात करना बिलकुल बंद कर दें और उसी आबो-हवा में साँस भरें, जिसकी कण-कण से केवल गुलामी की गंध आती हो।

जिस दिशा में हिजाब को इस्लाम का हिस्सा बताकर डिज़ाइनर तरीके से पेश किया जा रहा है, उसी दिशा में जरा दूसरे पहलू पर गौर करें और सोचें कि क्या होगा? जरा सोचिए कैसा लगेगा अगर कोई कंपनी हिंदू धर्म के लिए डिज़ाइनर चिता बनवाए, ताकि कोई सती होकर चिता पर जलना चाहे? सभी धर्मों के अनुरूप बाल विवाह के मंडप भी डिज़ाइनर बनाए जाएँ! कन्या भ्रूण हत्या के लिए डिज़ाइनर इक्विप्मेंट्स बनाए जाएँ! जरा सोचिए।

और ऐसा इसलिए ताकि हर उस कुरीति को जिंदा रखा जाए, जिससे महिलाओं का दमन होता आया है। इसके लिए बाजार को आखिर करना ही क्या है, सिर्फ मूल वस्तु और भाव में डिजाइन को ठूँस देना है। 10-20 जगहों पर समारोह करवा देना है और ट्विटर जैसी बड़ी कंपनियों के सीइओ के हाथ में कुछ भी लिखकर तख्ती पकड़वा देनी है। जरा सोचिए, वो बाजार कितना ख़ौफनाक होगा?


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