एक ने बेटी की ख़ातिर तो दूसरे ने पति के लिए लाँघी चौखट: स्वाति सिंह, किरण तिवारी जैसों से रोशन हौसले का दीया

जरा सोचिए, किरण तिवारी किससे मुकाबिल हैं। उनके पति की जान किन लोगों ने ली। फिर समझ आएगा कि आगे आकर वह कितना जोखिम ले रहीं। यह कुछ ऐसा ही है जैसा चार साल पहले स्वाति सिंह ने किया था। फर्क केवल इतना है कि स्वाति के सामने वे धर्मांध नहीं थे जो काफिरों की हत्या को जायज मानते हैं।

जिस देश में आत्महत्या करने वाली महिलाओं में से करीब 37 फीसदी हालात से टूट कर मौत के गली लगती हों, उस समाज में स्वाति सिंह और किरण तिवारी जैसों का हौसला उम्मीद जगाता है। एक ने 12 साल की बेटी की सम्मान की ख़ातिर तो दूसरे ने पति को इंसाफ़ दिलाने के लिए घर की चौखट लॉंघी। मुसीबतों के पहाड़ से डरी नहींं, जबकि एक के सामने जाति की चादर ओढ़े प्रभावशाली राजनीतिक ​बिरादरी थी, तो दूसरे के सामने धर्म की खाल में लिपटे दरिंदे हैं।

18 अक्टूबर को कमलेश तिवारी की निर्मम हत्या से पहले आपने शायद ही उनकी पत्नी किरण तिवारी का नाम सुना हो। उनके बारे में तब भी आपने सुना नहीं होगा जब कमलेश तिवारी सींखचों के पीछे धकेल दिए गए थे। यकीनन उस मुश्किल खड़ी में भी किरण परिवार को सॅंभालने में लगी रही होंगी। लेकिन, तक भी वे पारिवारिक दायरे से बाहर निकल पति के लिए सार्वजनिक तौर पर खड़ी नजर नहीं आईं। मुश्किलों से मोर्चा लेने का उन्होंने फैसला तब किया जब उन पर सबसे बड़ा पहाड़ टूटा। एक महिला के लिए पति की मौत से बड़ा दर्द भला क्या हो सकता है। और जिसके पति की इतने निर्मम तरीके से हत्या की जाए तो उसके मन-मस्तिष्क पर क्या चल रहा होगा, कल्पना से परे है।

दिवंगत पति की ज़िम्मेदारियों को निभाने के लिए पार्टी की कमान सँभाली

लेकिन, किरण टूटी नहीं। पहले पति के हत्यारों को सजा दिलाने के लिए आगे आईं। फिर हत्या के हफ्ते भर बाद ही पति की जगह हिंदू समाज पार्टी की कमान सॅंभाल ली। किरण बखूबी जानती होंगी कि उनके पति की हत्या हिंदुत्ववादी तेवरों के कारण ही गई है। उनके खिलाफ जो लोग हैं उनमें यूपी का मंत्री रहा एक मुस्लिम नेता है, जिसके विवादित बयान की प्रतिक्रिया में कमलेश तिवारी ने विवादित टिप्पणी की थी।

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विवादित टिप्पणी के कारण उन्हें जेल जाना पड़ा। वे मौलाना हैं जिन्होंने समुदाय विशेष के लोगों को कमलेश की हत्या के लिए उकसाया। उसकी हत्या को जायज ठ​हराया और फिर हत्यारों को छिपाने का भरसक प्रयास किया। उस धर्मांध पत्नी से है जो हत्यारे पति से कहती है कि अल्लाह तेरा भला करेगा। उस पिता से है जो हत्यारे बेटे से कहता है कि घर आ जा सब ठीक हो जाएगा। उन शांति दूतों से है जो कमलेश की हत्या के बाद सोशल मीडिया में हा हा कर रहे ​थे। यह ऐसा कॉकस है जिससे समुदाय विशेष के लोग धर्म के नाम पर जुड़े हैं, काफिरों के खिलाफ। ऐसे लोगों के खिलाफ खड़ा होना एक महि​ला और खासकर जिसके पति की इतने निर्मम तरीके से हत्या की गई हो, आसान नहीं होता।

12 साल की बेटी के सम्मान में चुनावी मैदान में उतरीं स्वाति सिंह

आसान तो स्वाति सिंह के लिए भी कुछ नहीं था। वह 2016 का साल था। स्वाति के पति बीजेपी नेता दयाशंकर सिंह ने बसपा सुप्रीमो मायावती को लेकर एक विवादित टिप्पणी की। अगले साल उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने थे। सो, दयाशंकर के बयान का मायावती ने राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर अपने वोट बैंक को मजबूत करने की कोशिश की। उनके कार्यकर्ता सड़क पर उतरे और दयाशंकर के परिवार की महिलाओं को सरेआम गाली दी गई।

स्वाति की 12 साल की बेटी के लिए भी अपशब्दों का इस्तेमाल किया गया। ऐसे वक्त में जब दयाशंकर भूमिगत हो गए थे, घरेलू महिला रहीं स्वाति सिंह परिवार के लिए सामने आईं। पति का बचाव नहीं किया। कहा अपने पति और मायावती के लिए समान कार्रवाई चाहती हूॅं। उनके हौसले ने बसपा को बैकफुट पर धकेल दिया। मायावती को यहॉं तक कहना पड़ा कि वे अपने कार्यकर्ताओं की भाषा का समर्थन नहीं करतीं। अगले साल जब विधानसभा चुनाव हुए तो स्वाति के इस हौसले को जनता का समर्थन भी मिला। वे तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के भाई को हरा विधानसभा पहुॅंची। आज वे योगी कैबिनेट की सदस्य हैं।

असल में, स्वाति और किरण जैसी महिलाओं से ही महिला सशक्तिकरण का दीया रोशन होता है। इन गैर राजनीतिक महिलाओं का जज्बा हर उस महिला को हौसला देता है, जिन्हें मुसीबतें अकेला कर देती हैं। तोड़ने की हर कोशिश करती है। वरना विरासत के नाम पर तो यूपी में ही नहीं देश के हर हिस्से में आप अक्सर महि​लाओं को ऊपर चढ़ते देखते ही रहते हैं। यह दूसरी बात है कि उनके सफर को ही हमारे सामने महिला सशक्तिकरण का मुलम्मा चढ़ाकर पेश किया जाता है।

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