अली मियाँ से ओवैसी तक केवल चेहरे बदले, नहीं मिटा रामलला पर मन का खोट

राम जन्मभूमि को विवाद का मुद्दा बनाने वाले मुस्लिम नुमाइंदे और संगठन पहले दिन से जानते हैं कि सच क्या है। कल भी रामलला को लेकर उनके मन में जहर भरा था और आज भी है। हक़ में फैसला नहीं आने के बाद अब वे फिर शरीयत का हवाला दे मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं को हवा देने की फिराक में हैं।

हॉं, हमने कह दिया अकीदा और मस्जिद बेची नहीं जा सकती, न ही कहीं और ले जाई जा सकती है। मस्जिद में जब एक बार नमाज अदा कर दी जाती है, तब से वह खुदा की हो जाती है। खुदा की चीज को हम कैसे किसी को दे सकते हैं।

अयोध्या में 6 दिसंबर 1992 को विवादित ढॉंचा गिराए जाने से भी पहले यह बात ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) के तत्कालीन अध्यक्ष मौलाना सैयद अबुल हसन नदवी उर्फ़ अली मियॉं ने कही थी। सितंबर 1992 में जनसत्ता को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने यह बात तब कही जब उनसे पूछा गया- क्या आप इस विवाद के सिलसिले में अंतिम बार 18 अगस्त को प्रधानमंत्री से मिले थे?

27 साल पुराना ये बयान आपको इसलिए याद दिलाया ताकि आप राम जन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद से मुस्लिम पक्ष खासकर, एआईएमपीएलबी और जमीयत-उलेमा-ए-हिंद जैसे मुस्लिम संगठनों तथा ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के अध्यक्ष और हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी जैसे मुसलमानों के स्वघोषित नुमाइंदों के बयानों पीछे छिपी मंशा को समझ सकें। एआईएमपीएलबी के मौजूदा सचिव जफरयाब जिलानी ने न्यूज एजेंसी आईएनएस को दिए हालिया इंटरव्यू में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को शरीयत के खिलाफ बताया है। उनसे फैसले की ज्यादातर तबकों में सराहना होने और इस मामले में सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से पु​नर्विचार याचिका दायर नहीं करने को लेकर सवाल पूछा गया था। जिलानी ने यह भी कहा कि जाहे जितने मुसलमान इस फैसले का समर्थन करे कोई फर्क नहीं पड़ता और न ही सभी के विचारों पर ध्यान देने की ज़रूरत नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई के दौरान जिलानी ने सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से पैरवी की थी। एआईएमपीएलबी जहॉं इस मामले में पुनर्विचार याचिका दायर करने का फैसला कर चुका है, वहीं सुन्नी वक्फ बोर्ड ने इससे इनकार किया है। पुनर्विचार याचिका दायर करना कानूनी हक है और इस फैसले को लेकर सवाल नहीं उठाए जाने चाहिए। लेकिन, इसकी पीछे की मंशा की चुगली खुद इनके वो बयान करते हैं, जो इन्होंने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से पहले दिए थे।

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सुप्रीम कोर्ट में 16 अक्टूबर को इस मामले की सुनवाई पूरी होने के अगले दिन जिलानी ने कहा था- अयोध्या मसले पर किसी तरह की मध्यस्थता का अब कोई मतलब नहीं है। सुप्रीम कोर्ट का जो भी निर्णय आएगा मानेंगे। बोर्ड के ही एक अन्य सदस्य सैयद अतहर अली ने कहा था- यह एक भूमि विवाद है। हमने कोर्ट में पर्याप्त साक्ष्य पेश किए हैं। कोर्ट का जो भी फैसला होगा हम उसका सम्मान करेंगे। लेकिन नौ नवंबर फैसला आते ही जिलानी के सुर बदलने लगे। फैसले के तत्काल बाद उन्होंने कहा- हम फैसले का सम्मान करते हैं, लेकिन संतुष्ट नहीं हैं। फैसले में कई विरोध हैं, इसलिए हम पुनर्विचार याचिका दायर करेंगे। इसके बाद एआईएमपीएलबी ने पुनर्विचार याचिका दायर करने का फैसला कर लिए तो 17 नवंबर को जिलानी ने कहा- हमें अयोध्या मसले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला मँजूर नहीं है। हम पुनर्विचार याचिका दाखिल करेंगे। मस्जिद के बदले मुसलमान कोई और जमीन कबूल नहीं कर सकता है।

फैसला का सम्मान करने की बात कहने वाले जिलानी पहले पुनर्विचार याचिका और फिर शरीयत पर कैसे आए यह उसका नमूना भर है। उनकी तरह ही सुर जमीयत-उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी के भी बदले। उन्होंने 17 अक्टूबर को कहा- हम सुप्रीम कोर्ट जैसी संस्था का बेहद सम्मान करते हैं। जो फैसला आएगा उसका सम्मान करेंगे। फैसले से ठीक पहले 6 नवंबर को दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में पत्रकारों से बात करते हुए मदनी ने कहा- कानून हमारा है। सुप्रीम कोर्ट हमारी है। जो भी फैसला होगा हम उसका एहतराम करेंगे। लेकिन, उसी दिन शरीयत का हवाला देते हुए उन्होंने यह भी जोड़ा, “बाबरी मस्जिद, कानून और न्याय की नजर में एक मस्जिद थी। करीब 400 साल तक मस्जिद थी। लिहाजा शरीयत के हिसाब से वो आज भी मस्जिद है। सत्ता और ताकत के दम पर उसे कोई भी रूप दे दिया जाए कयामत तक वह मस्जिद ही रहेगी।” इसके बाद 17 नवंबर को मदनी ने कहा- सुप्रीम कोर्ट का फैसला समझ से परे है। हमारी पुनर्विचार याचिका 100 फीसद खारिज हो जाएगी, इसके बावजूद हम याचिका दाखिल करेंगे। यह हमारा हक है। अगर मस्जिद न तोड़ी गई होती तो क्या सुप्रीम कोर्ट मस्जिद तोड़कर मंदिर बनाने के लिए कहता? दो दिन बाद 19 नवंबर को इकोनॉमिक टाइम्स में उनका एक इंटरव्यू प्रकाशित हुआ। इसमें और आगे बढ़ते हुए उन्होंने कहा, “सुप्रीम कोर्ट के फैसले में, सभी सबूत बाईं ओर इशारा करते हैं, जबकि फैसला दाईं ओर जाता है।” इतना ही नहीं उन्होंने यह भी कहा कि हिंदुओं को मंदिर बनाने के लिए जगह राम जन्मभूमि से अलग दी जानी चाहिए थे। ओवैसी ने तो फैसला आते ही कह दिया था कि मुसलमानों को खैरात नहीं चाहिए और उसके बाद से लगातार इस मसले पर भड़काऊ बयानबाजी कर रहे हैं।

राम जन्मभूमि को लेकर ये सारे जहर तब उगले गए जब इस मामले के दो मुख्य पक्षकार इकबाल अंसारी और सुन्नी वक्फ बोर्ड ने पुनर्विचार याचिका दाखिल नहीं करने की बात कही है। लेकिन, इस मामले में मुस्लिम पक्ष अपना स्टैंड शुरू से ही बार-बार बदलते रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा ने अपनी किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ में बताया है कि अली मियॉं के अब्बा मौलाना हकीम अब्दुल हई ने अरबी में ‘हिंदुस्तान इस्लामी अहमदे’ नाम से एक किताब लिखी थी। अली मियॉं ने इस किताब का उर्दू अनुवाद किया। इस किताब में सात मंदिरों का जिक्र था, जिन्हें तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी। इनमें से एक बाबरी मस्जिद भी थी। इस किताब के ‘हिंदुस्तान की मस्जिदें’ अध्याय में बाबरी मस्जिद बनाने का पूरा ब्योरा दर्ज था।

शर्मा लिखते हैं कि जब यह विवाद चल रहा था कि बाबरी मस्जिद मंदिर को तोड़कर बनाई गई है या नहीं, तो उस समय इंडियन एक्सप्रेस के संपादक रहे अरुण शौरी के कहने पर उन्होंने इस किताब की खोज की। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में यह किताब थी पर शर्मा को नहीं दिखाई गई। उस समय शर्मा जनसत्ता के लखनऊ ब्यूरो में काम करते थे। उन्होंने अली मियॉं से अपने संपर्कों के आधार पर उस अध्याय की फोटो कॉपी लेकर अरुण शौरी को भेजी। शौरी ने इंडियन एक्सप्रेस में इसका हवाला दे लेख लिखा। कहा कि अब क्या सबूत चाहिए। यह तो मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के पिता का ही लिखा है। आप जानकर हैरत में रह जाएंगे कि शौरी का वह लेख छपते ही वह किताब दारुल उलूम नदवदुल उलेमा और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी सहित सभी इस्लामी संस्थानों के पुस्तकालय से गायब हो गई।

जाहिर है, इस मसले को विवाद का मुद्दा बनाने वाले मुस्लिम नुमाइंदे और संगठन पहले दिन से जानते हैं कि सच क्या है। कल भी रामलला को लेकर उनके मन में जहर भरा था और आज भी है। वे बस बहरुपिए हैं जो बीच-बीच में झाँसा देने के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करने जैसी बातें करते हैं। अदालत से जब उनके हक़ में फैसला नहीं आता तो मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं को भड़काने के लिए शरीयत का हवाला देने लगते हैं।

इसमें रत्ती भी संदेह नहीं कि राम जन्मभूमि आस्था से जुड़ा मसला है और इसे वापस पाने के लिए हिंदू करीब 500 साल से संघर्ष कर रहे थे। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि उसके निर्णय का आधार आस्था नहीं है। कोर्ट के फैसले का मुख्य आधार एएसआई की रिपोर्ट थी जिसके अनुसार बाबरी मस्जिद के नीचे हिंदू ढॉंचा होने के प्रमाण मिले थे। साथ ही शीर्ष अदालत ने यह भी साफ़ कर दिया था कि सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड इस जमीन पर अपना दावा होने के सबूत पेश करने में नाकाम रहा था।

ऐसे में वो वक़्त आ गया है जब आम मुसलमानों को आगे आकर स्पष्ट करना चाहिए कि ओवैसी जैसे नेता या फिर जमीयत और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसी संस्थाएँ उनकी ठेकेदार नहीं हैं। उनके लिए राम असल मायनों में ‘इमाम-ए-हिन्द’ हैं। वरना लोग तो पूछेंगे ही कि अली मियाँ से ओवैसी तक आते-आते उनकी नीयत का खोट क्यों नहीं मिटा? आज जिस भाषा मैं ओवैसी बोल रहे उसी जुबान में 90 के दशक की शुरुआत में अली मियाँ ने कहा था- यह झगड़ा अदालत के दायरे से बाहर है। अदालत का फैसला शायद ही माना जाए।

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