Thursday, July 29, 2021
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रामचंद्र गुहा का अंधत्व: गुजरात में धन+संस्कृति का कॉम्बिनेशन, बंगाल के पास ‘ममता’ और यही इनकी संस्कृति

आपने टैगोर, बंदोपाध्याय और चट्टोपाध्याय को जन्म दिया, इसके लिए आपको सादर नमन। लेकिन हमारे धीरजलाल अंबानी को भी इक्कीस तोपों की सलामी दी जानी चाहिए। गुजरात को अपनी पहचान पर गर्व है। इसने कभी भी प्रांतवाद को नहीं अपनाया, नक्सलवाद यहाँ बिलकुल नहीं है और इसने दुनिया भर की विनाशकारी वाम विचारधारा को भी आँगन तक में टिकने नहीं दिया है। यह भी गुजराती संस्कृति है।

इतिहास ‘मरोड़’कार रामचंद्र गुहा का खुद का इतिहास सर्वविदित है। उन्होंने ट्वीट किया, “गुजरात के पास केवल पैसा है, संस्कृति नहीं, जबकि बंगाल के पास संस्कृति है!” यह कुछ अंग्रेजों की राय है और इसे लगभग आठ दशक पहले दिया गया था। इस मत का आज भी कोई महत्व नहीं है, कल भी नहीं था।

यह स्वाभाविक है कि अंग्रेजों को बंगाल-कलकत्ता का कल्चर समृद्ध लगे, क्योंकि कलकत्ता स्वयं उनके रंग में रंग चुका था। कोट-पैंट, कॉफी शॉप, सिगार, व्हिस्की और संपूर्ण अंग्रेजी कल्चर उस समय कलकत्ता का अभिन्न अंग था। गुजरात इस हद तक कभी नहीं रंगा, क्योंकि गुजरात की अपनी समृद्ध सुन्दर संस्कृति है।

भारत का नक्शा और संस्कृति

देश का नक्शा देखें तो गुजरात और बंगाल आमने-सामने की छोर पर हैं। संस्कृति और समृद्धि के मामले में भी ऐसा ही हैं। रामचंद्र गुहा झूठे हैं और उनके झूठ का सही जवाब गुजरात के मुख्यमंत्री विजयभाई रूपाणी ने दिया है। मुझे कुछ कड़वे सच बोलने हैं। उनसे कहना है कि संस्कृति केवल साहित्य नहीं है, यह इससे कहीं अधिक है।

सुरती ऊंधियु भी एक गुजराती संस्कृति है और घी से भरपूर बाजरे का रोटला (रोटी) भी। खमण, खांडवी, गांठिया, ढोकला, मुठिया (गट्टे), पात्रा, खाखरा और थेपला भी हमारी संस्कृति हैं। हलवासन व पेड़े और सूतरफेनी हमारी संस्कृति हैं। तावो, वराड़ियुं, घूंटो और उम्बाड़ियुं, खट्टी कढ़ी, खट्टी-मीठी दाल, रजवाड़ी ढोकली, दाल-ढोकली और हांडवो भी गुजरात की संस्कृति है। गुहा को यह सब स्वादिष्ट लगे या न लगे, दुनिया को तो लगता है।

गरबा भी और गुजरात के अनेक अर्थ भी 

रास, पंचिया, मधुबंसी और सिक्स स्टेप चलती भी संस्कृति है और वड़ोदरा का डेढ़ ताली रास भी। दाहोद और छोटा उदेपुर और बनासकांठा, साबरकांठा के आदिवासी नृत्य भी गुजरात की संस्कृति हैं और पोरबंदर के मेहर समाज के रास भी।

किसी भी दो राज्यों की तुलना करने की बात नहीं है, लेकिन बंगाल में कुल जितने रंग नहीं बिखरे हैं, उतने रंग गुजरात के लोकमेलों में छलकते हैं। तरनेतर के मेले में लहराती एक छतरी के नीचे पूरा बंगाल समा सकता है। कच्छ के भूंगे भी हमारी संस्कृति हैं और गिर के नेसडा भी। गिर गाय और कांकरेज वंश भी गुजरात का कल्चर हैं, शेर, घोड़ी और कृष्णमृग भी।

गुजरात का अपना एक अनूठा संगीत है, इसके अपने गीत हैं, इन गीतों की अपनी शैली है। गुजरात के पास अखो, नरसिंह मेहता, मेघाणी, मडिया, नर्मद, बक्षी और रमेश पारेख हैं। गुजरात में मोरारीबापू और रमेश ओझा हैं। यह भी गुजरात की संस्कृति है। गुजरात में इतने सारे रंग हैं – जितने एडोब फोटोशॉप में भी नहीं, एशियन पेंट्स के ब्रोशर की तो बात ही रहने दें।

पटोला भी गुजरात की संस्कृति है और बांधणी भी। कच्छ की कढ़ाई, राजकोट का मोतीवर्क और काठियावाड़ की चनिया चोली भी गुजरात का कल्चर है। दीवार पर लटके हुए पहिए, सितारे से सजे रंग-बिरंगे परिधान और कच्छी शॉल भी हमारी संस्कृति है।

गुजरात में उत्तरायण, पतंगें सुरति और मांजा

गुजरात में छह दर्जन मेले हैं और विश्व का सबसे लंबा, सबसे बड़ा नृत्य उत्सव नवरात्रि है। अम्बाजी भी गुजरात की संस्कृति है, रानी की वाव, सोमनाथ, सूर्यमंदिर और द्वारका का जगत मंदिर भी। गुजरात भर में फैले दो दर्जन अभ्यारण्यों के बीच बसे आदिवासी भी। गुजरात के पास महात्मा गाँधी, सरदार वल्लभ भाई पटेल और मुंशी भी हैं।

संस्कृति क्या है?

संस्कृति क्या है? केवल साहित्य? नहीं। बेशक, बंगाल के पास उत्कृष्ट साहित्यकारों एवं रचनाकारों की एक सेना है। लेकिन, क्या गुजरात के लिए उसी स्तर के रचनाकारों की संख्या होना आवश्यक है? नहीं, बिलकुल आवश्यक नहीं है। साहित्य संस्कृति का एक हिस्सा है, न कि समग्र संस्कृति। गुजरात पर यह आरोप भी लगाया गया कि वहाँ पैसा है! इसे आरोप माना जाए या प्रशंसा?

आज गुजरात देश की जीडीपी में 20% का योगदान देता है। देश की अर्थव्यवस्था की धुरी गुजरात है। फार्मा, खनिज, ऑटो पार्ट्स, डायमंड, कृषि, ऑटोमोबाइल, केमिकल के क्षेत्र में गुजरात का डंका बजता है। यह भी गुजरात की संस्कृति है।

आपको पैसे से इतनी घृणा क्यों है? आपने टैगोर, बंदोपाध्याय और चट्टोपाध्याय को जन्म दिया, इसके लिए आपको सादर नमन। लेकिन हमारे धीरजलाल अंबानी को भी इक्कीस तोपों की सलामी दी जानी चाहिए। हाँ! करसनभाई पटेल, धीरूभाई अंबानी, गौतम अदाणी, पंकज पटेल भी गुजरात की संस्कृति का हिस्सा हैं।

वांसदा नेशनल पार्क के बीच में रहने वाले आदिवासी भी गुजरात की संस्कृति हैं, मालधारी भी, जो गिर के नेस में साँस लेते हैं और मूलभूत सुविधाओं से भरपूर अहमदाबाद, सूरत में रहने वाले गुजराती भी यहाँ की संस्कृति हैं। गुजरात की संस्कृति भी देश में सबसे अच्छा राजमार्ग, सबसे अच्छी कनेक्टिविटी और विश्व में सबसे बड़े नहर नेटवर्क के साथ सरदार सरोवर जल योजना है। साथ ही स्टैच्यू ऑफ यूनिटी भी।

रामचंद्र गुहा को एक बार ‘गुजरात दर्शन’ के टूर पर भेजने की आवश्यकता है। लौटने के बाद वे ऐसा ट्वीट कभी नहीं करेंगे। 

और हाँ! बंगाल के पास ‘ममता दीदी’ हैं, यही इसकी संस्कृति है, गुजरात के पास नरेंद्र दामोदरदास मोदी हैं, यह भी गुजरात की संस्कृति है। गुजरात को अपनी पहचान पर गर्व है। इसने कभी भी प्रांतवाद को नहीं अपनाया, नक्सलवाद यहाँ बिलकुल नहीं है और इसने दुनिया भर की विनाशकारी वाम विचारधारा को भी आँगन तक में टिकने नहीं दिया है। यह भी गुजराती संस्कृति है।

लेखक: किन्नर आचार्य

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