Netflix की मशहूर सीरीज ‘ब्लैक मिरर’ का वह बेहद चर्चित एपिसोड आपको याद होगा- ‘नोसडाइव’। मुख्य किरदार लेसी स्क्रीन पर अपनी रेटिंग बढ़ाने के लिए अपनी हँसी, अपने आँसुओं और अपनी आत्मा का सौदा कर रही है। वह एक ऐसी दुनिया है जहाँ इंसान की कीमत उसकी धड़कनों के बजाय उसकी स्क्रीन पर चमकते डिजिटल कार्ड्स और फाइव स्टार रेटिंग से तय होती है। हमारा वर्तमान भी ब्लैक मिरर के उस डायस्टोपियन भविष्य से टकराकर चकनाचूर हो चुका है। फिक्शन और हकीकत के बीच की सीमा रेखा गायब हो चुकी है।
इसकी सबसे वीभत्स बानगी देखने को मिली, जब मुंबई के नामी अस्पताल की डॉक्टर सेजल पवार और स्टैंडअप कॉमेडियन प्रणीत मोरे के शो की एक क्लिप इंटरनेट के एल्गोरिथमिक महासागर में वायरल हुई। एनाटॉमी लैब में मानवता की सेवा के लिए दान किए गए मृत शरीरों के गुप्त अंगों के साइज पर हँसने और उनका मजाक उड़ाने की बात को जिस तरह एक मनोरंजन उत्पाद के रूप में पेश किया गया, वह वस्तुतः अटेंशन इकोनॉमी की सांस्कृतिक सड़न का चरम बिंदु है।
AIMSA strongly condemns the insensitive and disrespectful portrayal of cadavers and body donors for entertainment or comedy.@Rj_pranit ,#Sejal Pawar (MBBS Student).
— ALL INDIA MEDICAL STUDENTS' ASSOCIATION (@official_aimsa) June 11, 2026
Every cadaver represents a noble individual who chose to contribute to medical education through body donation,… pic.twitter.com/fc8mQnj3Bk
डॉक्टर सेजल पवार का उस मंच पर खड़े होकर अपनी संवेदनहीनता को ‘कूल’ दिखाना ब्लैक मिरर की लेसी के उसी छटपटाहट का विस्तार है, जहाँ वह एक ऊँची सोशल रेटिंग पाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है। कार्ल मार्क्स ने जिसे थ्योरी ऑफ एलिनेशन/अलगाव का सिद्धांत कहा था, यह उसका आधुनिक संस्करण ही है।
मेडिकल साइंस का छात्र, जिसका बुनियादी रिश्ता जीवन, मृत्यु और मानवीय गरिमा से होना चाहिए था, वह इस डिजिटल पूंजीवाद के सुपरस्ट्रक्चर में अपनी वास्तविक पहचान से पृथक/ एलीनेट ही हो चुका है। एक डॉक्टर का पेशा समाज में बुर्जुआ संभ्रांतवाद का प्रतीक रहा है, लेकिन ‘अटेंशन इकोनॉमी’ ने उसे भी डिजिटल सर्वहारा बना दिया, जिसे जीवित रहने और प्रासंगिक बने रहने के लिए लगातार व्यूज और लाइक्स की भीख मांगनी पड़ती है।
कार्ल मार्क्स ने दास कैपिटल में कमोडिटी फेटिशिज्म की व्याख्या करते हुए बताया था कि कैसे पूंजीवादी व्यवस्था मानवीय मूल्यों को निर्जीव वस्तुओं में बदल देती है। एक मेडिकल कॉलेज की एनाटॉमी लैब में रखा कैडेवर कोई साधारण वस्तु तो नहीं ही होगी, वह तो किसी इंसान का अंतिम मानवीय योगदान है।
लेकिन जब डॉक्टर पवार और प्रणीत मोरे उस मृत देह को एक सस्ते सेक्सुअलाइज़्ड जोक में तब्दील करते हैं, तो वे उस लाश का विमुद्रीकरण कर रहे होते हैं। लेट कैपिटलिज्म के इस वीभत्स दौर में मृत शरीर अब सम्मान के काबिल नहीं रह गया; वह केवल एक शॉक वैल्यू है, एक कच्चा माल है जिससे यूट्यूब पर सरप्लस वैल्यू पैदा की जा सके। यह ब्लैक मिरर की उसी क्रूरता का सजीव प्रसारण है, जहाँ किसी की त्रासदी दूसरे के लिए केवल एक डिजिटल रील का स्क्रीनशॉट है।
कॉमेडियन के मंच पर खड़ी वह डॉक्टर और खुद को आर्टिस्ट कहने वाला वह क्रिएटर, दोनों ही इस मुगालते में हैं कि वे FoE का इस्तेमाल कर रहे हैं। मार्क्स इसे फॉल्स कॉन्शियसनेस कहते हैं। वे आजाद कहाँ हैं? वे तो उस डिजिटल एल्गोरिदम के बंधुआ मजदूर हैं, जो उन्हें लगातार और अधिक आक्रामक, अधिक नग्न और अधिक असंवेदनशील होने पर मजबूर करता है। यूट्यूब का एल्गोरिदम कोई मानवीय संस्था नहीं है, वह पूंजी का वह हिंसक इंजन है जो मानवीय संवेदनाओं के मलबे पर चलता है।
ब्लैक मिरर के उस एपिसोड का अंत तब होता है जब लेसी की रेटिंग शून्य हो जाती है, वह जेल की कोठरी में बंद होती है और अपनी आंखों से उस डिजिटल स्क्रीन को हटते हुए देखती है। तब जाकर वह पहली बार आजाद महसूस करती है।
सेजल पवार की यह वायरल क्लिप हमारे पूरे समाज के ‘नोसडाइव’ की बानगी है। जब तक हम इस रेटिंग, सोशल मीडिया कार्ड्स और व्यूज के पूंजीवादी दलदल को ध्वस्त नहीं करेंगे, तब तक चिकित्सा की प्रयोगशालाएँ और इंसानी लाशें इसी तरह डिजिटल स्पेक्टेकल की वेदी पर चढ़ती रहेंगी।


