Saturday, October 24, 2020
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हिन्दुओं पर Scroll एक कदम आगे, 3 कदम पीछे: आक्रांताओं को इस्लामी माना, लेकिन हिन्दुओं का दानवीकरण जारी

क्या साम्राज्यवाद से पहले के भारतीय इतिहास की सेक्युलर 'साफ-सफाई' से हिन्दू राष्ट्रवादियों को उसे हथियार बनाने का मौका मिल गया? लेखक कपिल कोमिरेड्डी ने...

मोदी की जीत के बाद लिबरलों का ‘उबरना’ अभी जारी है- ‘योया’ जी मोदी-विरोधियों को गिरेबान में झाँकने की सलाह दे रहे हैं, शेखर गुप्ता मान रहे हैं कि उनके पत्रकारिता के समुदाय विशेष ने मोदी की उपलब्धियों को नज़रअन्दाज़ किया, और अब स्क्रॉल अपने प्लेटफॉर्म पर यह स्वीकार करता लेख (तकनीकी रूप से एक किताब का अंश) छाप रही है कि हाँ, हिन्दुओं पर इस्लामी आक्रांताओं के क्रूर अत्याचारों को रोमिला थापर जैसे इतिहासकारों ने निष्ठुरता से झुठला दिया, ताकि आधुनिक हिन्दुओं को अपने पूर्वजों के साथ हुए अत्याचारों की याद से दूर रख उन्हें 1947 के बँटवारे के बाद, उस दौरान हुए हत्याकांडों के भी बाद हिन्दुओं को हिन्दू राष्ट्र की (न्यायोचित, प्राकृतिक) माँग करने से रोका जा सके

यह बात और है कि इसे खिसिया कर स्वीकारने के बाद भी स्क्रॉल का हिन्दूफ़ोबिया एक पैसा कम नहीं हुआ है- अभी भी यह खिसिया कर, भरे मन से अपने सेक्युलर गिरोह की गलती स्वीकारने के बाद भी हिन्दुओं के दानवीकरण से बाज नहीं आ रहा है। लेख की (और यदि जिस किताब से अंश लिया है, उससे छेड़छाड़ नहीं हुई है तो किताब की भी) भाषा हिन्दू राष्ट्रवाद को अभी भी अवैध मानने की ही है, और सेक्युलर इतिहासकारों को केवल इसका दोषी माना गया है कि उनकी वजह से इन (दुष्ट, कमीने) हिन्दू राष्ट्रवादियों को बैठे-बिठाए मुद्दा मिल गया (जोकि गलत हुआ, नहीं होना चाहिए था)।

हाँ, इस्लामी आक्रांताओं ने हत्या, बलात्कार, मंदिर ध्वंस किए

लेख का नाम है “Did the secular sanitisation of pre-colonial Indian history allow Hindu nationalism to weaponise it?” (क्या साम्राज्यवाद से पहले के भारतीय इतिहास की सेक्युलर ‘साफ-सफाई’ से हिन्दू राष्ट्रवादियों को उसे हथियार बनाने का मौका मिल गया?) जिस किताब से लेख है, वह है कपिल कोमिरेड्डी की “Malevolent Republic: A Short History of the New India” (‘दुष्ट’ गणतंत्र: नए भारत का संक्षिप्त इतिहास)

लेख (किताब का अंश) अपने शब्दों से ज्यादा अपने टोन से बोलता है, और टोन हिन्दुओं को, उनकी अभिव्यक्ति को दानवीकृत करने का ही है। आड़, उदाहरण के तौर पर शुरू में, भले बाबरी-ध्वंस जैसे कानूनी रूप से आपराधिक कृत्य की है लेकिन निंदा के निशाने पर, ‘हिंसक’ के ठप्पे की शिकार हिन्दुओं की धार्मिक अभिव्यक्ति की, एक हिन्दू ‘स्पेस’ की पूरी आकांक्षा है। कवित्व की भाषा में यह अंगांगिवाचन (synecdoche) नामक अलंकार है- बात एक की हो रही है, लेकिन असल में सौ की हो रही है।

पर खैर, चाहे जिस बहाने, कम-से-कम जो झूठ अपनी जमात का इन्होंने माना, पहले बात उसकी। लेख में यह माना गया है कि एक ‘सेक्युलर’ राष्ट्र के निर्माण के लिए ‘सेक्युलर बुद्धिजीवियों’ ने अपनी ‘सहृदयता’ में पाकिस्तान बनने के बाद हिंदुस्तान को हिन्दू राष्ट्र की जोर पकड़ती माँग को कमजोर करने के लिए इस्लामिक हिंसा और खूँरेजी के इतिहास को दफना दिया। और यह देश के दीर्घकालिक हितों के खिलाफ गया (हालाँकि मैं उनके ‘दीर्घकालिक अहित’ के निष्कर्ष से सहमत हूँ, पर मेरे कारण उनके कारणों के ठीक उलटे हैं। वह हिन्दू राष्ट्रवाद को अहित के रूप में देख रहे हैं, और मैं इतने साल तक हिंदू राष्ट्र की माँग उठाने वालों को ‘लिबरलों’ के हाथों मिलने वाली, झूठ पर आधारित ज़िल्लत को)

लेख में यह भी बताया गया है कि कैसे इतिहास की स्कूली किताबों (जिसमें मोदी के बहाने हिन्दू राष्ट्र की आकाँक्षाओं को हाल ही में ‘sophisticated’ गालियाँ बकने वाली, झूठा साबित करने वाली रोमिला थापर की लिखी किताब शामिल है) ने या तो भरसक प्रयास किया कि इस्लामी शासकों के राज को साम्प्रदायिक सौहार्द के यूटोपिया के रूप में दिखाया जाए, और नहीं तो जब ऐसा कर पाना सम्भव न हो तो उनके अंदर ‘मानवीय गुण’ झूठे तौर पर भरे जाएँ, ताकि हिन्दुओं को लगे कि उनका उत्पीड़न, उनके साथ हुए हत्याएँ और बलात्कार तो ‘आकस्मिक’ था- यह इंसान तो वैसे बड़ा ही सभ्य और भलामानुष था।

उदाहरण के तौर पर, 17 बार हिंदुस्तान पर हमला कर हिन्दुओं के खून से इस धरती को सान देने वाले महमूद गजनी के द्वारा भारत में की गई नृशंसता के लिए रोमिला थापर ने महज एक वाक्यांश “भारत के लिए हानिकारक” का इस्तेमाल किया, लेकिन उसके तुरंत बाद बता दिया कि उसने अपने देश में एक बड़ी मस्जिद और सार्वजनिक पुस्तकालय बनवाया। इन दोनों बातों को, इस विशेष तरीके से एक साथ लिखा जाना जानबूझकर किया गया प्रपंच था- ऐसा इसलिए किया गया ताकि एक तो गज़नवी नृशंसता को न पढ़ने से हिन्दुओं का खून नहीं खौलेगा, और दूसरे ‘लेकिन उसने अपने देश में एक बड़ी मस्जिद और सार्वजनिक पुस्तकालय बनवाया’ वाली छवि मन में घर कर जाने के बाद हिन्दू अगर कहीं से उसकी असली जहालत पढ़ भी लेगा, तो उसे ‘मस्जिद और सार्वजनिक पुस्तकालय बनवाने वाले’ के बारे में लिखी गई नकारात्मक बातों पर शक भी होगा, और ऐसे ‘महान आदमी’ के बारे में ‘ऐसी बातें’ पढ़ने के लिए खुद पर भी ग्लानि होगी। यह लेख साफ़ दिखाता है कि हिंदुस्तान के विकृत सेक्युलरिज़्म का बोझ हिन्दुओं के कंधों पर ही नहीं, अपने धर्म की जरा भी परवाह करने वाले हिन्दुओं के अन्यायपूर्ण मानसिक और भावनात्मक शोषण की आधारशिला पर टिका है।

किताब का लेखक दूध का धुला नहीं, करता है हिन्दूफ़ोबिक इतिहासकारों के प्रपंच का बचाव

जिस किताब में इतिहास के नाम पर केवल झूठ परोसने वालों के झूठ पर से पर्दा हटाया गया हो, नंगे राजा को नंगा बोला गया हो उसके लेखक से भी सहानुभूति ठगी के शिकार हिन्दुओं के लिए रखना बेमानी साबित होता है। यह दिखाने के बाद भी कि रोमिला थापर (और मैं यहाँ नेहरू-चाटुकार रामचंद्र गुहा को भी इसी जमात में रखूँगा) जैसे कॉन्ग्रेस के ठेके पर आए इतिहासकार सेक्युलर भारत बनाने के नाम पर हिंदुस्तान के हिन्दुओं की ग्लानि-ग्रंथि का अनुचित दोहन कर रहे थे, किताब के लेखक कपिल कोमिरेड्डी उन्हीं के साथ खड़े हो जाते हैं। बताते हैं कि उन्होंने जो किया वह भी गलत केवल इसलिए है कि आज उनके कुकृत्य को नंगा कर उसका इस्तेमाल हिन्दू राष्ट्रवादी कर रहे हैं (वरना अगर यह न होता तो हिन्दुओं से अपने पूर्वजों की हत्या का सच छिपाए जाने में बुराई नहीं थी), और उनका इरादा तो पक्का नेक ही था।

कपिल कोमिरेड्डी खुद भी जिहादी हमलावरों को उनके मज़हब के या समुदाय के नाम से बुलाने से बचते हैं। उनके लिए वह “एशियन” इस्तेमाल करते हैं, जिसमें समुदाय विशेष के अलावा श्री लंकाई, तिब्बती, चीनी, जापानी आदि भी आ जाते हैं। वह इन प्रपंची इतिहासकारों को ‘शान्तिप्रियों’ की नहीं, ‘एशियनों की’ हिंसा और हत्या पर पर्दा डालने का दोष रखते हैं। यह भी सरासर झूठ है- मुझे नहीं लगता आज तक एक भी बौद्ध, डाओ (चीन का सबसे प्रचलित धर्म), या शिंटो (जापानी मूल धर्म) के एक भी राजा ने एक भी हिन्दू को हिंदुत्व (हिन्दू धर्म) का पालन करने के लिए मारा होगा।

यह मज़हब-आधारित हत्याकांड केवल मुस्लिमों ने किया, और जिनके साथ किया, उनके वंशज के तौर पर मैं अपने पूर्वजों के हत्यारों के पाप का बोझ बेगुनाह बौद्धों, डाओ और शिंटो लोगों समेत एशिया के गैर-मुस्लिम समुदाय के मत्थे बाँटे जाने का विरोध करता हूँ।

हिन्दू राष्ट्रवाद की पाकिस्तान की अवधारणा से तुलना खोखली

पूरे लेख में हिन्दू राष्ट्रवादियों के बारे में एक भी नकारात्मक शब्द लिखे बिना भी हिन्दू राष्ट्रवादियों को सबसे दुष्ट, जाहिल धरती पर बोझ दिखाया जाना इस लेख में और इसके लेखक कपिल कोमिरेड्डी बदस्तूर जारी रखते हैं। और विडंबना यह है कि कपिल यह नीच कर्म तब भी करते हैं जब वह खुद हिन्दू राष्ट्रवादियों द्वारा इस्लामी इतिहास के बारे में किए जा रहे, 70 साल से किए जा रहे दावों को सही साबित करते हैं।

वह रोमिला थापर और उनके गिरोह की जालसाजी और फ्रॉड को खुद में नैतिक तौर पर गलत नहीं मानते (जबकि किसी भी पीड़ित, चाहे वह मृत भी हो, के अपने प्रति हुई हिंसा के अनुभव को झुठलाना ‘गैसलाइटिंग’ नामक सामाजिक अपराध और मनोवैज्ञानिक दुर्व्यवहार होता है), बल्कि “अच्छे इरादे” का मुलम्मा पहना कर बचाव ही करते हैं, बल्कि केवल इसलिए गलत मानते हैं कि अगर रोमिला थापर जैसों ने यह सब गंदगी न की होती, तो हिन्दू राष्ट्रवादियों को एक ‘हथियार’ न मिलता।

हिन्दू राष्ट्रवाद की एक अनकही तुलना पाकिस्तान की अवधारणा से भी की गई है, जो कि फिर से गलत है। मुख्यधारा के हिन्दू राष्ट्रवादी कभी भी पाकिस्तान जैसा राष्ट्र बनाने की बात नहीं करते हैं। उनकी माँग गैर-हिन्दुओं को दोयम दर्जे का नागरिक बना देने, उनसे नागरिकता या व्यक्तिगत अधिकार छीन लेने, या उन्हें देश से निकाल देने वाला राष्ट्र बनाने की नहीं होती। उनकी माँग उसी हिन्दू धर्म को हिंदुस्तान की पहचान में वही न्यायोचित दर्जा दिलाने की होती है जिसका वह हकदार है- खासकर कि तब, जब हर सेक्युलरवादी हिंदुस्तान के सेक्युलर चरित्र को हिन्दू धर्म के ही मूल्यों में निहित बताता है। ऐसे में, अगर उनकी यह बात मान ली जाए कि हिंदुस्तान हिन्दू मूल्यों की वजह से ही सेक्युलर है, तो ऐसे सेक्युलर राष्ट्र की पहचान उसके सेक्युलरिज़्म के उद्गम हिंदुत्व से जोड़ने में क्या परेशानी हो सकती है? बशर्ते आपको हिन्दूफ़ोबिया के चलते ‘हिन्दू’ ठप्पे से ही घृणा न हो…

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