भीड़ की हर कार्रवाई को ‘भगवा आतंक’ से जोड़ती मीडिया: जब पुलिस का ही न्याय से उठ गया था भरोसा!

इसे समझने के लिए सबसे पहले तो राहुल देव के कुछ ही दिन पहले के ट्वीट पर टूट पड़े जेहादियों के झुंडों को देखिए। ये वही भूखे भेड़ियों के गिरोह हैं, जिन्होंने प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया जैसे संस्थान की कार्रवाई पर चुप्पी साधी है। जब PCI ने एनडीटीवी और इंडियन एक्सप्रेस जैसों को हाल ही में ख़बरों के नाम पर अफवाह फैलाते रंगे हाथों धर लिया तो......

पचास साल पहले की बात है। 1979-80 में बिहार का भागलपुर जिला अचानक अख़बारों की सुर्ख़ियों में आ गया। ख़बरें बताती थीं कि वहाँ पुलिस ने 31 अपराधियों या अभियुक्तों को पकड़कर जबरन उनकी आँखों में तेजाब डाल दिया था। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने छाती कूट कुहर्रम मचा दिया। वो सोशल मीडिया का ज़माना नहीं था, लेकिन परंपरागत पेड मीडिया ने इसे “अँखफोड़वा काण्ड” का नाम दे दिया था। इसपर लम्बे समय तक बहसें चली थी। हाल की एक फिल्म “गंगाजल” मोटे तौर पर इस काण्ड को दर्शाती है।

कुछ ख़ास आयातित विचारधारा के पैरोकारों को छोड़ दें तो आम लोग इस काण्ड के पुलिसकर्मियों को उतना दोषी नहीं मानेंगे। फिल्म का अंतिम दृश्य भी देखें तो मोटे तौर पर वो इस जघन्य कृत्य को जायज ठहराती दिखती है। सवाल ये है कि ये हुआ क्यों था? क्या पचास साल पहले ही न्याय व्यवस्था के लिए काम करने वालों का भरोसा न्याय व्यवस्था की लम्बी तारीखों और प्रक्रियाओं से इतना उठ चुका था कि वो क़ानून अपने हाथ में लेने को मजबूर हो गए? अगर पचास साल पहले ऐसी दशा थी, तो आज क्या स्थिति है?

इसे समझने के लिए सबसे पहले तो राहुल देव के कुछ ही दिन पहले के ट्वीट पर टूट पड़े जेहादियों के झुंडों को देखिए। ये वही भूखे भेड़ियों के गिरोह हैं, जिन्होंने प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया जैसे संस्थान की कार्रवाई पर चुप्पी साधी है। जब PCI (प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया) ने एनडीटीवी और इंडियन एक्सप्रेस जैसों को हाल ही में ख़बरों के नाम पर अफवाह फैलाते रंगे हाथों धर लिया तो इन सभी के मुँह में गोंद लग गया था। मिशनरी फण्ड से चलने वाली इनकी कलमों की स्याही सूख गयी थी। विरोध को विद्रोह तक पहुँचाने में इनका बहुत बड़ा योगदान है।

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उदाहरण के तौर पर आप मोबाइल फ़ोन को देख सकते हैं। पूरी संभावना है कि आपका ख़ुद का, या किसी क़रीबी का मोबाइल फ़ोन कभी न कभी, बस-ट्रेन में सफ़र करते या किसी सार्वजनिक स्थान से चोरी हुआ हो। क्या आपने उसकी एफआईआर दर्ज करवाई? नहीं, थाने में एक आवेदन देकर उसपर ठप्पा लगवा लेना एफआईआर नहीं होता। उसका बाकायदा एक नंबर होता है जिससे उसे बाद में भी ढूँढा जा सके। नहीं करवाने का कारण क्या था? क्या ये प्रक्रिया इतनी क्लिष्ट है कि नुकसान झेल लेना, और झंझट मोल लेने से बेहतर लगा! अब सोचिए कि आप पढ़े-लिखे होने पर जिस क़ानूनी प्रक्रिया से बचते हैं, उसमें एक कम पढ़े लिखे ग़रीब का क्या होगा? क्या वो अपनी चोरी हो गई गाय की रिपोर्ट दर्ज करवा पाएगा?

मवेशियों की चोरी या तस्करी जैसे मामले अगर अख़बारों में पढ़ें, जो कि स्थानीय पन्ने पर कहीं अन्दर छुपी होती है, तो एक और तथ्य भी नजर आएगा। पशु चोर या तस्कर, चोरी के क्रम में बीच में आने वालों को बख्शते नहीं है। तस्करी के पशु ले जा रही गाड़ी नाके पर किसी पुलिसकर्मी पर चढ़ा देना या चोरी के वक़्त मालिक के जाग जाने पर उसे गोली मार देने की घटनाएँ आसानी से नजर आ जाएँगी। ऐसे में जब ग्रामीण या कस्बे के लोग, किसी चोर को धर दबोचने में कामयाब होते हैं तो उसके साथ बिलकुल वही सलूक करते हैं, जो बच निकलने की कोशिश में वो उनके साथ करता।

भीड़ के पीट देने पर परंपरागत पेड मीडिया भी दोहरा रवैया अपनाती है। अगर पिट गया व्यक्ति किसी समुदाय विशेष का हो और पीटने वाले बहुसंख्यक माने जाने वाले समुदाय से तो अचानक कोहराम मच जाता है। हर संभव उपाय से उसे अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचार और ‘भगवा आतंकवाद’ से जोड़ने की कवायद होती है। तिकड़मी लोग कलम की बाजीगरी दिखाते हैं। वहीं जब हिन्दुओं में से कोई मारा जाए तो उसे अख़बार जगह तक नहीं देते। हर संभव तरीके से उसे कोई छिटपुट वारदात बताकर टाल देने की कोशिश होती है।

कई राजनैतिक दल भी इस कुकृत्य में परंपरागत पेड मीडिया के कंधे से कन्धा मिलाकर काम करते दिख जाते हैं। अगर मारे गए किसी “समुदाय विशेष” के परिवार को मिले सरकारी मुआवजे को देखें और उसकी तुलना भीड़ द्वारा मार दिए गए डॉ नारंग, रिक्शाचालक रविन्द्र जैसी दिल्ली में हुई घटनाओं से करें तो ये अंतर खुलकर सामने आ जाता है। ऐसे दोहरे मापदंडों पर विरोध न हो ऐसी कल्पना क्यों की जाती है, ये एक बड़ा सवाल है? आखिर एक पक्ष कब तक न्यायिक, कार्यपालक, विधायिका और पत्रकारिता, चारों ही तंत्रों का दबाव चुपचाप झेलता रहे?

गाँधीजी के सिद्धांतों जैसा एक गाल पर थप्पड़ लगने पर दूसरा गाल वो कितने दिन आगे करेगा? जो हम देख रहे हैं उससे तो ऐसा लगता है कि शायद उसने भगत सिंह के वाक्य को अपना लिया है। ये बहरों को सुनाने वाली धमाकों की गूँज सी लगती है। या तो व्यवस्था में सुधार कीजिए या धमाके फिर, फिर और फिर सुनने की तैयारी कर लीजिए। फैसला आपके अपने ही हाथ में है!

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