Tuesday, June 2, 2020
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बाबा साहब आज अगर जिन्दा होते, तो ये देखकर खुद को ही चाबुक मार रहे होते

सेक्युलर देश में हिन्दुओं की आस्थाओं को निशाना बनाने के लिए इतना उतावलापन क्यों है? इस धर्म निरपेक्ष देश में हर दूसरे मुद्दे पर अक्सर हिन्दू आस्थाओं का अपमान करना क्यों इतना आसान है? कभी हिन्दुओं के त्योहारों का मजाक बनाया जाता है तो कभी त्रिशूल जैसे प्रतीकों का उपहास बनाया जाता है।

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आशीष नौटियाल
पहाड़ी By Birth, PUN-डित By choice

भारत जैसे देश में अक्सर मत, धर्म, सम्प्रदाय आदि पर चर्चा और बहस देखना बहुत स्वाभाविक बात है। इसी क्रम में सरकार पर विपक्ष द्वारा आरोप भी लगाए जाते रहते हैं कि सम्प्रदाय और जातियों और समाज को तोड़ने में उसका हाथ रहता है। जब-जब वर्तमान सरकार पर इस प्रकार के आरोप कॉन्ग्रेस द्वारा लगाए गए, तब ऐसा प्रतीत होता है, मानो क़तील शिफ़ाई की ग़ज़ल पढ़ते हुए कॉन्ग्रेस कह रही हो ‘ले मेरे तजरबों से सबक़ ऐ मिरे रक़ीब, दो-चार साल उम्र में तुझ से बड़ा हूँ मैं।”

चाहे दैनिक सस्ते इंटरनेट को श्रेय दीजिए, नेहरू के समाजवाद को श्रेय दीजिए या फिर कंधे पर ढोकर भारत देश में कंप्यूटर ले आने वाले राजीव गाँधी को श्रेय दीजिए, मोदी सरकार के दौरान डिजिटल इंडिया खूब फला-फूला है। इसी का इस्तेमाल सोशल मीडिया पर सब लोगों ने अपने अपने तरीके से जमकर किया है।

इसी डिजिटल क्रान्ति का एक नमूना ट्विटर पर आज फिर से ट्रेंड करने लगा और इस विचारधारा के अनुयायियों द्वारा द्वारा बेहद तत्परता से इस तस्वीर को बड़े स्तर पर फैलाया जा रहा है।

इस तस्वीर में किसी कुत्सित मस्तिष्क के रचनाकार ने भारत देश के संविधान के वास्तुकार कहे जाने वाले बाबा साहब अम्बेदकर के हाथों में चाबुक थमाया है और यह दर्शाया गया है कि वो बंधक बनाए गए हिन्दू देवताओं, राम और श्री कृष्ण को कोड़े (चाबुक) मार रहे हैं। निश्चित रूप से यह चित्र घृणित, उन्मादी मानसिकता की उपज से ज्यादा और कुछ भी नहीं है।

अक्टूबर 20, 2018 को ट्विटर पर बाबा साहब के नाम पर चल रहे एक ट्विटर यूज़र ने इस तस्वीर को पोस्ट किया था और आजकल चुनाव से ठीक पहले यह दुबारा शेयर की जा रही है। समाज को तोड़ने के लिए इस तरह के प्रपंच गढ़ने वाले लोग कौन हैं और उन्हें किसने शरण प्रदान की है? सेक्युलर देश में हिन्दुओं की आस्थाओं को निशाना बनाने के लिए इतना उतावलापन क्यों है? इस धर्म निरपेक्ष देश में हर दूसरे मुद्दे पर अक्सर हिन्दू आस्थाओं का अपमान करना क्यों इतना आसान है? कभी हिन्दुओं के त्योहारों का मजाक बनाया जाता है तो कभी त्रिशूल जैसे प्रतीकों का उपहास बनाया जाता है। क्या बाबा साहब का इस तरह से चित्रण करने वाले को यह आभास भी है कि उसकी इस घटिया हरकत पर खुद बाबा साहब कितने दुखी होते? क्या धार्मिक प्रतीकों द्वारा अपनी कुंठा की अभिव्यक्ति करने वाले जानते हैं कि बाबा साहब ने कहा था कि भविष्य में समाज को धर्म से ही नैतिकता सीखनी होगी?

इस तस्वीर को चुनाव से ठीक पहले सोशल मीडिया पर फैलाया जा रहा है, जिसका मकसद सिर्फ प्रायोजित तरीके से सामाजिक टकराव पैदा करना है

नवीन समाज में धर्म की आवश्यकता प्राचीन समाज से कहीं अधिक होगी: अम्बेदकर

अम्बेदकर के नाम पर अपनी घृणित विचारधारा को बेचने वालों को यह जानना आवश्यक है कि हालाँकि अम्बेदकर ने धर्म में निहित सामाजिक भेदभाव की निंदा की लेकिन वो धर्म को समाज का आधार मानते थे। अम्बेदकर एक ओर जहाँ इस बात से असहमत थे कि सभी धर्म अच्छे हैं, वहीं दूसरी ओर उनका विचार था कि धर्म जीवन के लिए अपरिहार्य है और सार्वजनिक जीवन में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।

हमारे समय के सबसे बड़े संविधानवादी और विधिक सुधारक यानी, बाबा साहब के ही यह विचार थे, जिन्हें बहुत कम प्रकाश में लाया गया है। हिन्दू देवताओं का अपमान कर सामाजिक सद्भाव बढ़ाने वाले ‘विचारकों’ को जानना चाहिए कि यह बात भी उन्ही बाबा साहब ने ही कही है कि धर्म की आलोचना की जा सकती है लेकिन, उन्होंने धर्म को कभी खारिज नहीं किया और ना ही नकारा।

मार्क्स की तर्ज पर ही ‘मेरा कोई देश नहीं है’ कहने वाले अम्बेदकर के नाम पर हिन्दुओं को अपमानित करने वाले, सड़कों पर उपद्रव मचाने वाले और मनु स्मृति की फोटोकॉपी जलाने वाले शायद अम्बेदकर को वास्तव में नहीं जानते हैं, और यह भी निश्चित है कि उन्होंने मनु स्मृति की तरह ही अपने विचारों के पुरोधा को भी कभी नहीं पढ़ा है। महात्मा गाँधी से जब बाबा साहब ने ‘मेरा कोई देश नहीं है’ कहा था तो उनका तात्पर्य हमेशा श्रमिक से से होता था, यानि श्रमिक वर्ग का कोई देश नहीं होता। ठीक इसी तरह से उन्होंने समाज के किसी देवता के प्रति आस्था नहीं जताई थी, भले ही उन्होंने कभी हिन्दू प्रतीकों को कोड़े मारने के विचार को भी तवज्जो नहीं दी थी।

लेकिन, यह श्रमिक आधुनिक है। इस प्रकार के चित्रण द्वारा अपने मन का द्वेष निकालने वाले ये श्रमिक मात्र अपनी घृणा को कागज पर रख रहे होते हैं। वास्तव में वे एक ऐसा वर्ग तैयार करना चाहते हैं, जो उनकी इसी विचारधारा को युगों तक सराहे, जो बाबा साहब जैसे किसी नाम से जन्म लेकर किसी दुराग्रही की रचनात्मकता के नाम से बाजार में बेची जा सके।  

आर्य-अनार्य सिध्दांत से लेकर आरक्षण तक के मूल में कॉमन क्या है?

भारत देश की आज़ादी के संघर्ष में सबसे देर से कूदने वालों में से एक नाम बाबा साहब अम्बेदकर का भी था। आरक्षण जैसी दलीलों के वक़्त कॉन्ग्रेस द्वारा अम्बेदकर से अक्सर यह प्रश्न भी किए गए कि वो भारतीय जनमानस को आखिर कितना समझते हैं? यह वो समय था जब आरक्षण जैसी कमजोर कड़ी को ब्रिटिश हुकूमत ने भाँप लिया था। इस समाज में वर्तमान में दलित और सवर्ण की लड़ाई में मेनस्ट्रीम मीडिया ने बड़े स्तर पर झोंके का प्रयास किया है। कॉन्ग्रेस अक्सर दावे करती है कि सामाजिक एकता को तोड़ने और वोट बैंक की खातिर होने वाले दंगे अक्सर सरकार द्वारा प्रायोजित होते हैं। लेकिन हिन्दू धर्म के भीतर ही इतने बड़े बँटवारे को हवा मात्र एक दिन में ही नहीं दी गई। इसके लिए मैक्समूलर के सिद्धांतों, आर्य-अनार्य सिद्धांत से लेकर बाबा साहब अम्बेदकर को इस विभाजन का पूरा श्रेय दिया जा सकता है। हालाँकि, भीमराव अम्बेदकर को इतने बड़े विभाजन के लिए मैक्समूलर जितना जिम्मेदार इसलिए भी नहीं ठहराया जाना चाहिए क्योंकि अक्सर बाबा साहब के विचारों का सही तरह से जनता और समाज तक प्रतिपादन ही नहीं किया गया।

अम्बेदकर की ‘फिलाॅसफी ऑफ़ हिन्दुइज़्म’ में भी धर्म मानव जीवन का मूल हिस्सा था

वर्तमान समय में दलितों के सबसे बड़े चिंतक माने जाने वाले अम्बेदकर ने 1950 में लिखे अपने लेख ‘फिलाॅसफी ऑफ़ हिन्दुज़्म’ (हिंदुत्व का दर्शन) में लिखा था कि धर्म, मानव समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा इसलिए है, क्योंकि वह मानव जीवन के आधारभूत प्रश्नों से जुड़ा हुआ है, जिनमें जन्म और मृत्यु, भोजन और रोग आदि शामिल हैं। इसमें बाबा साहब ने प्रकाश डालते हुए नवीन और प्राचीन समाज में धर्म की आवश्यकता के विवरण पर लिखा था, “आधुनिक समाज को पुरानी दुनिया की तुलना में धर्म की कहीं अधिक जरूरत है।’’ उनका तात्पर्य था कि नैतिकता के रूप में धर्म, आधुनिकता की जरूरत हमेशा है। शायद इसी वजह से उन्होंने बौद्ध धर्म भी स्वीकारा।

क़ानून समाज को बदलने के लिए काफी नहीं: अम्बेदकर

अम्बेदकर का कहना था कि आधुनिक समाज को धर्म की जरूरत इसलिए है, क्योंकि विधि यानी, कानून, जो कि व्यवस्थाओं का संकलन है और जिसमें हम आधुनिक लोग बहुत अधिक विश्वास करते हैं, समाज को बदलने के उपकरण के रूप में अप्रभावी और अविश्वसनीय है। अम्बेदकर ने लिखा था, ‘‘कानून का उद्धेश्य अल्पसंख्यकों को सामाजिक अनुशासन के दायरे में रखना है। बहुसंख्यकों को तो नैतिकता के सिद्धांतो के आधार पर अपने सामाजिक जीवन का संचालन करने के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए और छोड़ देना पड़ता है। इसलिए नैतिकता के अर्थ में धर्म, हर समाज का शासी सिद्धांत होना चाहिए।‘‘

क्या मनुस्मृति जला देने से सामाजिक बराबरी हासिल की जा सकती है?

मनुस्मृति जलाकर और हिन्दू आस्थाओं को ठेस पहुँचाकर अल्पकालिक रोष व्यक्त करते हुए अक्सर दलित समाज भूल जाता है कि वह कोई बड़ा परिवर्तन नहीं ला रहे हैं बल्कि इस अंतराल को और बढ़ा रहे हैं। जिस भीमराव अम्बेदकर का हवाला देकर अक्सर हिन्दू देवी देवताओं का अपमान करने वाले आगे बढ़ रहे हैं, उन बाबा साहब के विचार पढ़े जाने चाहिए। अम्बेदकर के अनुसार, “जहाँ तक मेरा संबंध है, मेरे विचार से इस मत का अनुसरण करके आगे बढ़ना उचित होगा कि यदि किसी भी आंदोलन अथवा संस्था का दर्शन जानना है, तब उस संस्था और आंदोलन के अंतर्गत जो क्रांतियाँ आई हैं, उनका आवश्यक रूप से अध्ययन किया जाए। क्रांति दर्शन की जननी है, चाहे उसे दर्शन की जननी न भी माना जाए, फिर भी वह ऐसा दीप है, जो दर्शन को प्रकाशयुक्त बनाता है। धर्म भी इस नियम का अपवाद नहीं हो सकता। इसलिए मेरी दृष्टि से सबसे अच्छा तरीका यही है कि यदि हम किसी धर्म के दर्शन का मूल्यांकन करना चाहते हैं और इसके लिए कोई कसौटी निश्चित करना चाहते हैं, तब उस धर्म में जो क्रांतियाँ आई हैं, उनका अध्ययन करें। यही एक तरीका है, जिसे मैं अपनाना चाहता हूँ।”

सभ्य समाज में नैतिकता को धर्म के कारण पवित्रता प्राप्त होती है: अम्बेदकर

अम्बेदकर के शब्दों को मैं हूबहू रख रहा हूँ, ताकि उन्हें उन्हीं के शब्दों में पढ़कर समझा आ सके। धर्म और नैतिकता पर अम्बेदकर ने लिखा, “धर्म में ईश्वर की कल्पना का उदय कब और कैसे हुआ, यह कहना संभव नहीं है। यह तो हो सकता है कि ईश्वर की कल्पना का मूल समाज के महान व्यक्ति की पूजा में हो, जिससे मनुष्य की जीवित ईश्वर में श्रद्धा का, यानि किसी सर्वश्रेष्ठ को देखकर ईश्वर मानने के आस्तिकवाद का उदय हुआ होगा। यह हो सकता है कि ईश्वर की कल्पना, यह जीवन किसने बनाया है, जैसे दार्शनिक विचार के फलस्वरूप अस्तित्व में आई होगी, जिससे एक सृष्टि के निर्माणकर्ता के रूप में, उसे बिना देखे मानने से ईश्वरवाद का उदय हुआ होगा। धर्म और नैतिकता का संबंध कैसे स्थापित हुआ। यह संबंध धर्म और ईश्वर के बीच स्थापित संबंध से भी अधिक स्वाभाविक और दृढ़ है, परंतु फिर भी धर्म और नैतिकता, इन दोनों का मिलन नियमित रूप से कब हुआ, यह बताना कठिन है। चाहे कुछ भी हो, यह वस्तु स्थिति है कि सभ्य समाज का धर्म और आदिम समाज का धर्म दो महत्त्वपूर्ण कारणों से भिन्न-भिन्न हैं। सभ्य समाज में ईश्वर का धर्म की योजना में समावेश है। सभ्य समाज में नैतिकता को धर्म के कारण पवित्रता प्राप्त होती है।”

इस तरह के विवादित चित्र देखकर पता चलता है कि भीमराव अम्बेदकर को हम सबने कितने गलत तरीके से पढ़ा है। हमने उनके नाम पर समाज को सवर्ण और दलित के टकराव में झोंका है। हमने अम्बेदकर की गलत व्याख्या करने का मार्ग चुना है, उनके नाम पर भड़क कर सड़कों पर अराजकता फैलाई है। पवित्र मानकों को अपमानित कर एक बड़े हिस्से को ठेस लगाकर हम बाबा साहब अम्बेदकर के दोषी बन चुके हैं।

समाज में जाति के नाम पर होने वाले दंगों के बारे में देश की सबसे प्राचीन पार्टी कॉन्ग्रेस की मानें तो यह सब नेताओं द्वारा कराया जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि दलित आंदोलन, साम्प्रदायिक हिंसाएँ, ये सब एक तरह से काँग्रेस ने फिरौती की तरह इस्तेमाल की हैं, जिसे वो अपने वोट बैंक से उन्हें सत्ता न सौंपने के जुर्म में वसूलती है। वर्ष 2018 में देखा गया कि अप्रैल के माह बड़े स्तर पर उत्पात और अराजकता फैलाई गई और दोष सरकार पर थोपने के प्रयास किए गए। कॉन्ग्रेस नेताओं ने मौका तलाशकर धरना और अनशन किया, शाम होते ही जमकर दावत उड़ाने की खबरें सोशल मीडिया पर पढ़ने को मिलीं। अनशन के नाम पर छोले-भटूरे उड़ाने वाले कॉन्ग्रेस के नेताओं की तस्वीरें वायरल हुई।

इस तरह से कॉन्ग्रेस के भीतर महात्मा गाँधी आज भी विद्यमान देखे गए, लेकिन कारण इस बार भिन्न थे! एक बापू थे, जिन्होंने जब अनशन किया था तो अंग्रेजों के हाथ-पाँव फूल गए थे, और एक ये कॉन्ग्रेस के नेता भी थे, जिनके अनशन से उनके अपने ही पेट फूल गए थे। देश काल वातावरण कुछ भी हो, कॉन्ग्रेस हमेशा गाँधी के नाम को प्रासंगिक कर ही देती है।

हिन्दुओं की आस्थाओं को ठेस लगाना नहीं है विकल्प 

दलित समाज के अग्रणी नेता अक्सर उस संविधान के खिलाफ शहर जला देते हैं, जिसे बाबा साहब अम्बेदकर ने लिखा था। खुद को दलित समर्थक बताकर अपनी आवश्यकतों के अनुरूप बाबा के विचारों को मानना और फिर उनका तिरस्कार करना भी समाज की आस्थाओं का अपमान है। दंगे करना, आग लगाना, शहर जलाना समाधान नहीं है, ना ही सोशल मीडिया पर हिन्दू देवताओं को कोड़े मारने जैसी विकृत मानसिकता से बदलाव आ सकेगा। बाबा को मानने वालों को जानना चाहिए कि ऐसा करना संविधान का अपमान है, वही संविधान जिसके वास्तुकार स्वयं बाबा साहब हैं।

शोषण के मूल को ही जड़ से मिटा दिया जाना एक अच्छा विकल्प हो सकता है, हमें वो जातियाँ सरेंडर कर देनी चाहिए जिनके नाम पर हम कभी आरक्षण लेते हैं, तो कभी विक्टिम कार्ड खेलकर शहर और कस्बों को जला देते हैं। सरकारी काम-काज में जाति वाले कॉलम को छोड़ देने पर परिवर्तन का पहला कदम कहा जा सकता है। वैसे भी संविधानवाद के बावजूद भी वर्ण और जाति व्यवस्थाएँ संविधान का खुला उपहास है और यह संविधान के अस्तित्व को आधारहीन बना देता है।

ऐसा किया जाना जरुरी है, ताकि देश का प्रथम नागरिक भी आजादी के वर्षों बाद भी अपनी जाति के बजाए अपनी योग्यता और पद से पहचाना जा सके, UPSC में नाम लाने वालों को उनकी उपलब्धि के लिए पहचान मिल सके, वरना हमेशा डिबेट का केंद्र संघर्ष से बदलकर जाति में ही तब्दील होता रहेगा। ये उसी तरह की क्रान्ति है, जिसके बारे में बाबा साहब अपनी पुस्तक में लिख चुके हैं। जो परिवर्तन इतने वर्ष नहीं आया, वो किसी घृणित चित्रण को वायरल कर के नहीं बल्कि इस प्रकार के समाधानों से ही आ सकेगा।

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आशीष नौटियाल
पहाड़ी By Birth, PUN-डित By choice

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