Monday, August 2, 2021
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बिहार में शराब बंदी ने दिया है महिलाओं को गरिमामय जीवन जीने का अधिकार

आज प्रगतिशील महिलाओं की चुप्पी बहुत ही बड़ी निराशाजनक और संदेहास्पद है। बिहार में पूर्ण शराबबंदी और दहेज विरोधी कानून के लागू होने के मसले पर बिहार की महिलाएँ खुश हैं। आंदोलन की शुरुआत भले ही बंगाल और दिल्ली से हुई थी, लेकिन उसका सकारात्मक प्रभाव बिहार में ही दिख रहा है।

शराब-बंदी और दहेज विरोधी आंदोलनों का भारत में अपना इतिहास रहा है। इन आंदोलनों को आश्चर्यजनक तरीके से भारत में अलग अलग तरीकों से स्त्रियाँ चलाती रही हैं। जिसका एक सिरा समाज सुधार से जुड़ता है तो वहीं दूसरा सिरा नारीवादी आंदोलनों की पृष्ठभूमि को आधार देता है। नारीवादी आंदोलन की पृष्ठभूमि ही स्वतंत्र भारत में महिलाओं की उपेक्षा,शोषण और श्रम में लिंग आधारित भेदभाव को समाप्त करने तथा बराबरी के सिद्धांतों की नीति को लेकर आगे बढ़ा।

जनवरी, 1930 में महात्मा गाँधी ने इर्विन के नाम ग्यारह सूत्री माँग जारी किया था, जिसमें आम तथा खास, सभी प्रकार की माँगें उठाई गईं थीं। इन माँगों में शराब बंदी (पूर्णरूपेण मदिरा निषेध) सबसे सबसे अधिक प्रभावी था। महत्मा गाँधी ने कई स्थलों पर माना है कि शराब बंदी के जरिए ही स्त्री-हिंसा पर बहुत हद तक काबू किया जा सकता है। यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि महात्मा गाँधी स्त्रियों को मुख्यधारा में लाने के सबसे बड़े पैरवीकार थे। हालाँकि, दांडी मार्च की सूची में जब गाँधी ने किसी महिला को शामिल नहीं किया था, तो उस समय राष्ट्रवादी महिलाओं ने गाँधी का मुखर विरोध भी किया था और बाद में महिलाएँ भी इस ऐतिहासिक आंदोलन में शामिल हुई थीं। महिलाओं की जिद और उपेक्षा के कारण ही गाँधी को झुकना पड़ा था। सरल भाषा में कहूँ तो यह वही समय था, जब भारत में महिला आंदोलनकारियों की छवि निर्मित हो रही थी।

नारीवाद के इस आंदोलन ने आजाद भारत में कई रूपों में अपना विस्तार किया। सत्तर-अस्सी के दशक में इसी आंदोलन ने सरकार से लेकर, न्यायालयों तक को दहेज, बाल-विवाह जैसी सामाजिक कुरीतियों की ओर ध्यान खींचा। सत्तर-अस्सी के दशक में घरेलू-हिंसा, दहेज-हत्या के मामले बढ़ने लगे। पत्र-पत्रिकाओं में इससे संबन्धित मुद्दों पर विचार होने लगे। उस दौर में प्रकाशित ‘इन सर्च ऑफ आंसर्स’ में 6 नवविवाहिताओं की आत्महत्या से पूर्व लिखे पत्रों को छापा गया, जिसमें एक पत्र बहुत भावुक कर देने वाला था। राजनीति के गलियारों से लेकर, चौराहों तक पर इसे पढ़ा गया। इस पत्र ने दहेज विरोधी आंदोलन को एक मुकाम तक पहुँचाया और दहेज-हत्या को लेकर कानून बनवाया।

पत्र का अंश

”मैं बहुत दूर जा रही हूँ। मुझे माफ कर देना….
जब से मैं आपके घर में आई हूँ, आपके परिवार की कठिनाइयाँ बढ़ गई हैं। मेरा आपके घर आना आपके लिए शुभ नहीं है, इसलिए मैं दूर जा रही हूँ। मैं इस बात की पूरी कोशिश कर रही हूँ कि मैं किसी भी हाल में जीवित न बचूँ क्योंकि मेरे जीवित बच जाने से मेरे साथ साथ आपका जीवन भी तबाह हो जाएगा। मुझे इलाज के लिए अस्पताल न ले जाना।
मैं अपने साथ मेरे गर्भ में पलने वाले आपके बच्चे को भी लेकर जा रही हूँ। इसके लिए भी मुझे माफ कर देना। आपकी दुबारा विवाह करने की इच्छा थी, दूसरा विवाह जरूर करना। दहेज में जो कपड़े मैं अपने साथ लाई थी, आप उन्हें या तो जला देना या फिर मेरे माता- पिता को वापस कर देना। जो कपड़े मुझे आपके परिवार की ओर से दिये गए थे, आप उन्हें प्रेस करवा कर नई दुल्हन के लिए रख देना।
नई दुल्हन के आने के बाद उसकी बातों को सुनने की कोशिश करना, उसके साथ झगड़ा मत करना। अगर उसके माँ-बाप आपका ज्यादा ख्याल न रखें तो भी खुश रहना। आपको ऐसी बातों को नजरंदाज करना होगा, वरना उसकी जिंदगी भी बर्बाद हो जाएगी। अगर वह तुमसे अकेले में कोई बात करे, तो उस बात को अपने घर के भीतर किसी अन्य सदस्य को मत बताना।
‘केवल तुम्हारी’

समकालीन नारीवादी आंदोलन में दहेज के विरुद्ध प्रारम्भिक विरोध हैदराबाद में वर्ष 1975 में प्रगतिशील महिला संगठन द्वारा दर्ज करवाया गया था। फिर बाद में नए सिरे से यह आंदोलन दिल्ली में शुरू हुआ, जो देश के कई कोनो तक पहुँचने में सफल रहा। 1979 में दहेज के खातिर दिल्ली में ही तरविंदर कौर ही हत्या कर दी गई, पुलिस ने इसे आत्महत्या बताकर केस को ख़त्म करने की कोशिश की, जिसके प्रतिकार में भयंकर जुलूस निकला और उसके बाद प्रदर्शनों की बाढ़ सी आ गई।

दहेज-विरोधी आंदोलन के एक वर्ष बाद अनेक राज्य सरकारों ने दहेज हत्या के विरुद्ध कानून बनाना शुरू कर दिया। सन 1978 में तत्कालीन प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने दहेज के लिए महिलाओं के उत्पीड़न को रोकने के लिए संसद के अगले सत्र में विधेयक प्रस्तुत करने की पहल की। दिल्ली पुलिस ने दहेज से संबन्धित घटनाओं को देखने के लिए अलग समिति बनाई। समाज सुधारकों ने दहेज-लोलुप परिवारों को सामाजिक बहिष्कार की घोषणा की ।

इस प्रकार दहेज को सामाजिक अपराध घोषित करने की परिकल्पना तो मूर्त हो सकी, लेकिन व्यावहारिक तौर पर यह बहुत हद तक अमूर्त ही बना रहा। इसके कई कारण हैं। समाज सुधारकों ने इसे अपना टास्क मान लिया और राजनेताओं ने अपने सुधारवाद को बहुत हद तक सीमित कर लिया। राजनीतिक एजेंडे से धीरे-धीरे यह गायब होता चला गया।

आश्चर्यजनक रूप से यह भी देखा गया कि नारीवादी आंदोलन कई मुद्दों पर बिखर भी गया और अधिकांश नारीवादी महिलाओं ने नारीवाद की पाश्चात्य व्याख्या करनी शुरू कर दी। देहमुक्ति आंदोलन इसी मानसिकता का प्रतिफल है। भारतीय महिलाओं की रोज की दिक्कतों से दूर नारीवाद देहवादी व्याख्या में मशगूल हो गया। उसके एजेंडे से समरसता और सामंजस्य का लोप हुआ और उसने पितृसत्ता की आड़ में अपने निशाने पर पुरुष-समाज को ही ले लिया। बहुत ऐसे संदर्भ भी सामने आए, जहाँ परिवार के बच सकने की संभावनाओं के बाबजूद भी आत्मनिर्भरता की पैरवी करते हुए नारीवादियों ने स्वछंद जीवनशैली को प्रश्रय दिया। यह नारीवादी मुहिम की सीमा है। बहुत जरूरी है इसके आवश्यक संदर्भों के विस्तार की। पार्टीगत राजनीतिक एजेंडे को बढ़ाने के खातिर नारीवाद का सर्वाधिक नुकसान हुआ। प्रगतिशीलता को सामयिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य दिये बगैर उनका मिशन अधूरा रहेगा।

आज प्रगतिशील महिलाओं की चुप्पी बहुत ही बड़ी निराशाजनक और संदेहास्पद है। बिहार में पूर्ण शराबबंदी और दहेज विरोधी कानून के लागू होने के मसले पर बिहार की महिलाएँ खुश हैं। आंदोलन की शुरुआत भले ही बंगाल और दिल्ली से हुई थी, लेकिन उसका सकारात्मक प्रभाव बिहार में ही दिख रहा है।

शराबबंदी और दहेजबंदी दोनों ही मसले एक दूसरे से जुड़कर ही औरतों को समाज में सम्मान दिलवा सकते हैं। आत्मनिर्भर बनाने के लिए हमने औरतों के लिए आरक्षण के प्रावधान किए हैं। हालाँकि, शराब एकमात्र कारण नहीं है, लेकिन निश्चित रूप से एक कारण है, जिसकी वजह से औरतों को केवल देह के रूप में देखने की परिपाटी विकसित हुई। इसी कारण घरेलू-हिंसा को बल मिलता रहा। आज बिहार औरतों की मुक्ति की प्रस्तावना लिखने जा रहा है। यह ‘मौन-क्रांति’ ही है, जो अब किसी भी बिहार की बेटी को दहेज और घरेलू -हिंसा के खातिर आत्महत्या के दहलीज तक नहीं पहुँचने देगी।

महिला सशक्तिकरण के जरिए बिहार के राजनीतिक और सामाजिक जीवन में बदलाव पर यह समीक्षा बशिष्ठनारायण सिंह जी की फेसबुक वॉल से लिया गया है।

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