Tuesday, October 19, 2021
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आत्मनिर्भरता की रीति में बनी नई शिक्षा नीति

इस नीति की आत्मा साफ है। त्रि-भाषा फॉर्मूला ना केवल हमें आत्मनिर्भर बनाएगा, बल्कि उस गौरवमयी ऐतिहासिक संस्कृति का भी साक्षात्कार करने का मौका देगा जिसकी वैज्ञानिकता और उसको संवहन करने वाली मानव सभ्यता का प्राकृतिक स्वरूप आज भी अंग्रेजी भाषियों के लिए कॉपीराइट के रूप में जीविका चलाने तक सीमित हैं।

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 को मँजूरी मिल चुकी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कैबिनेट ने इस नीति को मँजूरी देते हुए कहा कि यह विद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में “परिवर्तनकारी सुधार” का मार्ग प्रशस्त करेगा।

पिछले दिनों कुछ अंतरराष्ट्रीय अखबारों में खबर छपी थी कि इस नीति का विवादास्पद निर्णय यह है कि प्राथमिक स्कूल, चाहे वह निजी हों या सार्वजनिक, बच्चों को “मूल भाषा” या “क्षेत्रीय भाषा” में शिक्षित करने की आवश्यकता होनी चाहिए, ना कि अंग्रेजी में।

इस निर्णय को विवादास्पद बताते हुए वहाँ यह तर्क दिया गया है, “उच्च शिक्षा, रोजगार और अंतरराष्ट्रीय अवसरों के विस्तार के लिए अंग्रेजी भाषा की दक्षता को महत्वपूर्ण माना जाता है।” उनके द्वारा दिए गए तर्क के कुछ गूढ़ निहितार्थ हैं। जिसका सीधा संबंध देश की शिक्षण-अधिगम व्यवस्था में छिपी अंग्रेजी मानसिकता की निर्भरता को बरकरार रखने से है ना कि आत्मनिर्भर भारतीय गौरव के प्रफुल्लित और उन्मुक्त होने से।

आज का भारत नया भारत है। हमारा देश बहुभाषी है। हमारे देश में जितनी भाषाएँ एकल भारतीय संस्कृति और सभ्यता को वहन करती हैं उतनी तो बाकी पूरे विश्व की भाषाएँ पृथक निवास करती हैं। इतिहास साक्षी है कि उन्नीसवीं-बीसवीं सदी में औपनिवेशिकता या किसी एक विचारधारा को बढ़ावा देने के लिए जिस मानव मूल्यों पर सर्वप्रथम प्रहार किया गया, वह थी भाषा।

औपनिवेशिकता जहाँ समाज को गुलामी की जंजीरों में कैद कर देती है, वहीं विचारधारा संस्कृति के मूल्यों को बाँध लेती है। बात स्पष्ट है कि समाज में किसी भी रूप में परिवर्तन कराना हो तो भाषा को पकड़ो।

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में कहीं भी इस बात का बिल्कुल ही जिक्र नहीं है कि अंग्रेजी को एकदम हटाया जाए। इस नीति में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जो भी विदेशी भाषा है, उसको विदेशी भाषा के रूप में पढ़ाया जाए। कक्षा पाँच तक कोई भी बालक/ बालिका अंग्रेजी को पढ़कर अंतरर्राष्ट्रीय रोजगार के लिए नहीं जाता है ना ही हमारे देश में यह सिस्टम शुरू है कि कक्षा पाँच तक अंग्रेजी माध्यम से पढ़कर नौकरी दी जाए।

रोजगार के लिए भी एक उम्र निर्धारित है। उस उम्र से पहले आप रोजगार नहीं कर सकते। इस नीति में दिए गए त्रि-भाषा फार्मूला से एक बात सत्य है और वह यह है कि बालक का संज्ञानात्मक और मनौवैज्ञानिक विकास के साथ-साथ संरचनात्मक देशज विकास हो।

यह सर्वविदित है कि अंग्रेजी भाषा के विद्यालय पारंपरिक रूप से अमीर भारतीय परिवारों के पक्षधर रहे हैं। अब ‘सबका साथ, सबका विश्वास और सबका विकास’ की बात पूरे देश में गूँजायमान है । भाषा इसकी प्रमुख कड़ी है। आप इस बात का खुद अंदाजा लगा लीजिए कि एक मुहल्ले में रहने वाले बच्चों के बीच शाम को जब एक बच्चा उड़िया या अपनी मातृभाषा में बोले और दूसरा अंग्रेजी में तो बाल मनोविज्ञान पर क्या असर पड़ेगा।

इस नीति की आत्मा साफ है। त्रि-भाषा फॉर्मूला ना केवल हमें आत्मनिर्भर बनाएगा, बल्कि उस गौरवमयी ऐतिहासिक संस्कृति का भी साक्षात्कार करने का मौका देगा जिसकी वैज्ञानिकता और उसको संवहन करने वाली मानव सभ्यता का प्राकृतिक स्वरूप आज भी अंग्रेजी भाषियों के लिए कॉपीराइट के रूप में जीविका चलाने तक सीमित हैं।

अगले दशक में भारत सबसे अधिक युवा संपन्न देश होगा। इस आधार पर नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में प्रत्यक्ष रूप से एक बात तय कर दी गई है कि ‘मैं भी आत्मनिर्भर हूँ’ का आत्मसंबल प्रत्येक युवा को प्रेरित करेगा। जिस गरीब वंचित और पिछड़े लोगों की केवल बात अब तक की जाती रही है, वो सबसे अधिक आँगनबाड़ी या प्राथमिक विद्यालयों से ही शिक्षित होने का प्रयास करते रहे हैं।

इस नई शिक्षा नीति में जो प्रमुख बातें विद्यमान हैं, उनमें– विद्यालय स्तर पर 2025 तक पूर्व प्राथमिक शिक्षा का सार्वभौमिकरण करना, मध्याह्न भोजन को पूर्ण रूप से विस्तारित करना, आँगनबाड़ी केंद्रों को और अधिक मजबूत करना, प्री-स्कूलिंग से ही सभी के लिए मूलभूत साक्षरता जिसमें विशेष रूप से भाषा और गणित गुणवत्ता शिक्षण-अधिगम पर अधिक ध्यान देना, ‘चलो स्कूल चलें’ जैसी तैयारी के लिए विशेष मॉड्यूल बनाना। एक महत्वपूर्ण, बात जो कि आज भी सबसे भयावह स्वरूप में है कि शिक्षक-बालक अनुपात को 1:30 से भी कम करना और विशेष रूप से शिक्षा अधिकार को ग्रेड-12 तक बढ़ाने की बात को लक्षित किया गया है।

पूरे देश में प्रत्येक बच्चे के लिए एकसमान और समावेशी शिक्षा का प्रावधान किया गया है, जिसमें विशेषकर शैक्षिक संरचना को लचीला और एकीकृत पाठ्यक्रम एवम् मूल्यांकन को समावेशी और प्रौद्यौगिकी सुलभ किए जाने का प्रावधान है। पाठ्यक्रम के राष्ट्रीय पाठ्यचर्चा की रूपरेखा को सभी भाषाओं में सर्वसुलभ करवाया जाएगा।

पाठ्यचर्चा में वैज्ञानिक स्वभाव, नैतिक तर्क, भाषा प्रगाढ़ता, डिजिटल साक्षरता एवं अन्य विषयो को समावेशित की जाने की बात कही गई है। केवल यही नहीं, महिला, ट्रांसजेंडर, सीखने में कमजोर और शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के लिए, संप्रदाय विशेष और अन्य शैक्षिक रूप से अल्पसंख्यकों को प्रोत्साहित करने के लिए हस्तक्षेप की बात की गई है।

कुछ विशेष रणनीतियाँ बनाई गई हैं, जिनमें प्रमुख हैं- राष्ट्रीय छात्रवृत्ति कोष, वंचित जिलों में विशेष शिक्षा क्षेत्र बनाना, कमजोर जिलों को वित्तपोषण और अन्य सहायता प्रदान कराना, कम प्रतिनिधित्व वाले समूहों के शिक्षकों की भर्ती, शहर में रहने वाले गरीबों पर ध्यान देना इत्यादि। इस आधार पर चलते हुए 2030 तक सभी विद्यालयों में सकल नामांकन अनुपात को शत प्रतिशत या यूँ बोलें कि पूर्ण करना रखा गया है।

उच्चतर शिक्षण-प्रशिक्षण व्यवस्था में संस्थागत पुनर्गठन और उनका समेकन करना शामिल है। अर्थात लगभग पंद्रह हजार बड़े और बहुविषयक संस्थानों में आठ सौ विश्वविद्यालयों और चालीस हजार महाविद्यालयों को एकीकृत कर दिया जाएगा। इनका वितरण मिशन नालंदा और मिशन तक्षशिला के आधार पर किया जाएगा।

मिशन तक्षशिला के द्वारा 2030 तक हर जिले में कम से कम एक उच्चतर शिक्षण संस्थान और मिशन नालंदा के तहत समान क्षेत्रीय वितरण के साथ पूरे देश में 2030 तक 100 टाइप-1 और 200 टाइप-2 के उच्चतर शिक्षण संस्थान व्यवस्थापित किए जाएँगे।

उच्चतर शिक्षण संरचना में उच्च गुणवत्ता के साथ उदार शिक्षा की बात की गई है। प्रभावी शिक्षण माध्यम के आधार पर सीखने के अनुभवों को उभारना, शिक्षा का अंतरराष्ट्रीय करण सुगम करना, प्रौद्यौगिकी का अभीष्टतम प्रयोग करना, इसके लिए एक स्वायत्त निकाय राष्ट्रीय शैक्षिक प्रौद्यौगिकी फोरम का निर्माण करना, मुक्त और दूरस्थ शिक्षा को बढ़ावा देना आदि बातों का समावेश है।

शिक्षण वातावरण इस प्रकार पैदा किया जाएगा, जिससे देश में वंचित समूहों को सुगमता से शैक्षिक पहुँच प्राप्त हो सके। कई निकास विकल्पों के साथ चार और पाँच साल का एकीकृत स्नातक और परास्नातक कार्यक्रम होगा, जिसमें प्रथम वर्ष पूर्ण होने पर- सर्टिफिकेट, द्वितीय वर्ष- डिप्लोमा, तृतीय वर्ष- डिग्री, चतुर्थ वर्ष -डिग्री (ऑनर्स), पंचम वर्ष -स्नातकोत्तर की डिग्री दी जाएगी।

इनमें विषयों का चुनाव मेजर और माइनर के रूप में होगा। इसमें मेजर रूप में मुख्य विषय और माइनर रूप में वैकल्पिक विषय होंगे। एमफिल डिग्री को समाप्त कर दिया गया है। इस नीति के द्वारा अध्ययन के विषयों का रचनात्मक संयोजन इस प्रकार किया जाएगा कि स्नातकोत्तर और डॉक्टरेट की शिक्षा अनुसंधान आधारित विशेषज्ञता प्रदान करे।

उच्चतर शिक्षा प्रणाली के अभिन्न अंग के रूप में व्यावसायिक शिक्षा को और अधिक विकसित किया जाएगा। इस उच्चतर शिक्षा के क्रियान्वयन, शासन और विनियमन के लिए राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा नियामक प्राधिकरण, उच्च शिक्षा अनुदान परिषद (यूजीसी का परिवर्तित और परिवर्धित स्वरूप), व्यावसायिक मानक सेटिंग बॉडीज, राष्ट्रीय मूल्यांकन और प्रत्यायन परिषद, सामान्य शिक्षा परिषद एवं अन्य परिषदों, नियामक, प्राधिकरण, विनियमन शासन की व्यवस्था या तो परिवर्धित होगी नहीं तो नए स्वरूप से की जाएगी।

अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन की स्थापना की जाएगी जिसमें कम से कम बीस हजार करोड़ का वार्षिक अनुदान सरकार की तरफ से दिया जाएगा जो उत्तरोत्तर रूप से प्रत्येक दशक में बढ़ता रहेगा। इसका प्रमुख उद्देश्य सामाजिक विज्ञान, कला और मानविकी, प्रौद्यौगिकी और विज्ञान जैसे विषयों में अनुसंधान को प्रोत्साहित कर उसकी क्षमता को बढ़ावा देना, गुणवत्ता में उत्तरोत्तर वृद्धि करना आदि विषय शामिल हैं।

सार्वजनिक सर्वसुलभ शिक्षा के आधार पर शिक्षक शिक्षण-प्रशिक्षण व्यवस्था को बड़े ही गंभीरता से लिया गया है। विद्यालयी शिक्षा के रूप में शिक्षण व्यवस्था को चार वर्षीय पाठ्यक्रम में बदल दिया गया है। उच्चतर शिक्षण व्यवस्था को परिणाम आधारित बनाया जाएगा। इस शिक्षण व्यवस्था में और अधिक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अनुसंधान विषयों को बढ़ावा दिया जाएगा।

कुल मिलाकर कहा जाए तो इस नई शिक्षा नीति-2020 में जितने भी मानक तय किए गए हैं उनमें शिष्य-शिक्षक-व्यवस्था तीनों ही अंगों के प्रत्येक पहलुओं को बहुत ही विस्तृत ढंग से सहआधारित और विकासोन्मुखी बताने का प्रयास किया गया है। विगत पाँच वर्षों में जिस अमृत को निचोड़कर नई शिक्षा नीति के रूप में देश के सम्मुख लाया गया है, उसके समुचित क्रियान्वयन को लेकर हम आशान्वित हैं।

(लेखक डॉ. संदीप कुमार पाण्डेय, रूसी अध्ययन संस्थान, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर हैं)

 

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