Wednesday, October 21, 2020
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हिन्दीभाषियों का घमंड और कुतर्क बनाम हिन्दी से घृणा करने वाले कूढ़मगज

सबकी समृद्धि इसी में है कि इनके शब्दों को दूसरे के साहित्य में, बोलचाल में जगह मिले, एक-दूसरे के इलाकों में वो साइनबोर्ड पर दिखें, कोई कनपुरिया तमिल में बोल कर दूसरे पर इम्प्रेशन झाड़े और कोई कन्नडिगा दूसरे लड़के को कहे कि 'अबे जानते हो, बनारस के घाट पर दस रुपए की चार इडली मिलती है!'

हिन्दी को समर्पित दिवस आया और चला गया। वही हुआ जो हर साल होता है। कुछ लोगों ने खूब लिखा कि हिन्दी के लिए ये होना चाहिए, वो करना चाहिए। कुछ लोगों ने अंग्रेजी में लिख कर अपनी बुद्धिमत्ता, कटाक्ष या घृणा का परिचय दिया। राजनैतिक दृष्टिकोण से भी बातें हुईं कि हिन्दी को थोपना जरूरी नहीं। मैंने भी लिखा कि थोपा नहीं जा रहा, एक व्यवहारिक बात कही जा रही है कि जिस भाषा को सबसे ज्यादा लोग बोलते-समझते हैं, उसे प्रोत्साहन मिले तो उसे एक जोड़ने वाली भाषा के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

आप तार्किक बातें करते हैं तो कुछ लोग सुनते हैं, कुछ लोग पहले से ही मूड में रहते हैं कि अगर हिन्दी पर कुछ कहा जा रहा है तो बेकार का प्रमोशन होगा और वाहियात तर्क दिए जाएँगे। वो कमेंट में पिल पड़ते हैं, बिना पढ़े। साथ ही, दूसरे तरह के लोग दिमाग बंद कर के सीधे कहने लगते हैं कि हिन्दी ही सबसे श्रेष्ठ है, सबको पढ़ाओ। दोनों ही कूढ़मगज लोग हैं।

हिन्दीभाषियों के कुतर्क

पहले वाले एक्सट्रीम में रहने वाले लोगों को इससे भी दिक़्क़त है कि हिन्दी में उर्दू और अंग्रेजी बहुत ज़्यादा घुस गया है, इसे साफ करने की जरूरत है। ये लोग यह बात नहीं जानते कि हिन्दी स्वयं कोई स्वतंत्र भाषा नहीं है, बल्कि कई क्षेत्रीय भाषाओं के शब्दों और संस्कृत के व्याकरण से अत्यधिक प्रभावित है हिन्दी। इसमें हिन्दीभाषी क्षेत्र के हर भाषा के शब्द हैं, इसी कारण ये इतनी समृद्ध है।

जिन्हें लगता है कि हिन्दी तो शुद्ध ही बोली जानी चाहिए, वो वास्तविकता के धरातल से ऊपर हवा में चल रहे हैं। उन्हें यह पता नहीं कि भाषा इवॉल्व कैसे करती है, उसकी फ़्लेक्सिबिलिटी या लोच उसके बेहतर होने में बहुत बड़ा कारण बनती है। अंग्रेजी ने कई भाषाओं के शब्दों को लिया और आज दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में से एक है। उपनिवेशवाद भी उसका एक कारण है, लेकिन उसके बावजूद उसकी स्वीकार्यता हर जगह बढ़ी ही है।

इसलिए, ऐसा कहना कि उर्दू और अंग्रेजी के शब्द निकाल देने चाहिए, निहायत ही गलत और नकारात्मक बात है। अगर भारत की ही सारी भाषाएँ हिन्दी से अपने शब्द वापस माँग लें तो हिन्दी के पास अपना कुछ बचेगा ही नहीं। इसलिए, आप क्या बोलते हैं, उसे आज के दौर की वास्तविकताओं के हिसाब से बोलिए।

दूसरी बात जो हिन्दीभाषियों में देखने को मिलती है वो यह है कि इसमें एक प्रकार का घमंड है। यह घमंड किस बात का है मेरी समझ में नहीं आता। हिन्दीभाषी राज्यों की हालत देखिए कि जीडीपी में कितना योगदान है, वहाँ शिक्षा और स्वास्थ्य में क्या झंडे गाड़े गए हैं। किस बात का घमंड है आपको? साहित्य का? हर भाषा का साहित्य समृद्ध है और हिन्दी से सैकड़ों साल पुराना है उनका साहित्य।

दूसरी भाषाएँ हीन कैसे हो जाती हैं? ख़ैर, किसी भी भाषा पर घमंड जताने वालों को गम्भीरता से नहीं लेना चाहिए। कोई भी भाषा किसी दूसरी से कमतर या बेहतर नहीं है। जो ऐसा सोचते हैं, चाहे वो बंगाली हों, तमिल हों, मराठी हों या बिहारी, उन्हें अपने दिमाग का इलाज कराना चाहिए।

चूँकि आपके द्वारा बोली जाने वाली भाषा सबसे ज्यादा लोगों के द्वारा बोली जाती है, तो उसकी इसी ‘सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा’ होने के कारण उसे सबको सिखाने की बातें हो रही हैं। इसका यह बिलकुल मतलब नहीं है कि चूँकि ये सबको सिखाने की बात हो रही है तो ये महान हो गई। बिल्कुल नहीं, क्योंकि किसी की व्यवहारिकता मात्र उसे सबसे बेहतर नहीं बना देती। हमारे पास एक भाषा को ज्यादा लोगों तक पहुँचाने का विकल्प है, तो हमें उस पर उसकी व्यवहारिकता के लिहाज से विचार करना चाहिए।

हिन्दी सबसे ज्यादा बोली जाती है, समझी जाती है, इसका मतलब है कि सबसे कम लोगों को यह भाषा सिखानी पड़ेगी। इसलिए, इसे एक लिंक लैंग्वेज बनाने की बात होती है। वरना कोई गुजराती हिन्दी को लेकर क्यों कैम्पेन करेगा, ये मेरी समझ से बाहर है। हाँ, भाषा थोपी नहीं जानी चाहिए। जैसा कि मैंने पिछले लेख में लिखा था कि हर बच्चे को तीन भाषाएँ सिखाइए ताकि वो भारत को आगे चल कर समझ सके। दक्षिण वाले को उत्तर, उत्तरपूर्व और पश्चिम की भाषाएँ सिखाइए; उत्तर वाले को दक्षिण, पूरब और पश्चिम की; पूरब वाले को उत्तर, पश्चिम और दक्षिण की; तथा पश्चिम वाले को उत्तर, दक्षिण और पूरब की। या, इसी तरह से जिसके मूल में भारतीयता सन्निहित हो, राजनैतिक स्वार्थ या घृणा नहीं।

हिन्दी से घृणा करने वालों के कुतर्क

इसके दूसरे एक्सट्रीम पर वो लोग हैं जो हिन्दीभाषियों को घृणा से देखते हैं। एक बंगाली व्यक्ति ने लिखा कि हिन्दी वाले गुटखा खाने वाले हैं, गाली देने वाले हैं, भ्रूणहत्या करने वाले हैं, ज्यादा बच्चे पैदा करने वाले हैं, ढोकला चुराने वाले हैं, भुजिया खाने वाले रक्तचूसक कीड़े हैं। कोई पढ़ा लिखा व्यक्ति जब ऐसी घृणा दिखाता है तो सबसे पहली बात यही निकल कर आती है कि इनकी मानसिक बीमारी के लिए चिकित्सा की संस्तुति की जानी चाहिए क्योंकि इन्होंने बस एक ट्वीट से जता दिया कि शिक्षित होने और टाइप कर पाने में बहुत अंतर है।

दूसरे ने लम्बा लेख लिखा कि हिन्दीभाषियों की साजिश है कि क्षेत्रीय भाषाओं को फूहड़ बता दिया जाए, ताकि हिन्दी स्वतः बेहतर दिखने लगे। ये बात मैंने पहली बार सुनी। खोजने की कोशिश की कि ऐसी बात किसी ने कभी कही हो, या जताई ही हो, कोई नहीं मिला। आगे यहाँ तक लिखा गया कि हिन्दी एक एलीट जबान है, जो उत्तर भारत में भी थोपी गई है।

ये बात अनभिज्ञता और घृणा दोनों से उपजी है। हिन्दी के कारण कितनी बोलियाँ नष्ट हुईं? हाँ, अंग्रेजी के कारण कई भारतीय भाषाएँ शिक्षा के माध्यम के तौर पर गायब हो चुकी हैं, या सिर्फ सरकारी विद्यालयों में सिमट कर रह गई हैं। जहाँ तक हिन्दी को एलीट कहने की बात है, वो अनभिज्ञता इसलिए है कि जब राज्य सरकार शिक्षा नीति लाती है, तो उसे एक भाषा चाहिए जिसे ‘मीडियम ऑफ इन्सट्रक्शन’ की तरह लागू किया जा सके।

यहाँ लोग कहेंगे कि हर जिले की अपनी बोली है, उसमें शिक्षा क्यों नहीं दी जाए। ये कहने में आसान लगता है, लेकिन उसके प्रभाव को हम भूल जाते हैं। यही उत्तर प्रदेश बोर्ड से पढ़ा विद्यार्थी जब किसी आईसीएसी वाले से बहुत कम नंबर लिए डीयू में एडमिशन के लिए पहुँचता है, और स्वयं को बेहतर कहते हुए भी एडमिशन नहीं ले पाता क्योंकि डीयू के लिए प्रतिशत ही मानदंड है, तो उसे अच्छा नहीं लगता।

हर जिले में अलग भाषा क्यों, एक जिले में ही कई बोलियाँ बोली जाती हैं, फिर तो हर गाँव के हिसाब से पढ़ाई होनी चाहिए, परीक्षाएँ हों, बोर्ड हों… इस कुतर्क का कोई अंत नहीं है। हिन्दी को सरकारी विद्यालयों में शिक्षा का माध्यम बनाना उसकी लिपि को समझने की सहजता और उसके वहाँ की मूल भाषाओं को समाहित करने की क्षमता के कारण है न कि ये जताने के लिए कि हिन्दी महान है, क्षेत्रीय भाषाएँ फूहड़।

राजनीति देखने वाले लोग

कुछ लोग हिन्दी के खिलाफ बस इसलिए बोल रहे हैं क्योंकि उन्हें इसमें राजनीति दिख रही है। राजनीति देख पाना एक सही बात है, लेकिन परिणामवश आप भाषा को ही हीन बताने पर पिल पड़े हैं तो आप दया के पात्र हैं। हिन्दी ने कभी नहीं कहा कि वो महान है, या उसे ही पढ़ाया जाना चाहिए। न ही हिन्दी के साहित्यकारों ने अपनी गाथा गाते हुए दूसरी भाषाओं को घटिया या मछली खाने वालों की भाषा कहा है। ये अपने छोटे होने, संकीर्ण मानसिकता का परिचायक है।

राजनीति कोई कर रहा है, कोई नेता इसे ऐसे दिखा रहा है कि वो सिर्फ अपने सत्ता के दम्भ में आ कर हर जगह हिन्दी लगवा देगा, तो बेशक वो व्यक्ति हिन्दी की सेवा नहीं कर रहा, वो अपना स्वार्थ साध रहा है। साथ ही, जो नेता इसे अपनी संस्कृति पर हमला बता रहे हैं, उनसे सीधा सवाल है कि हिन्दी की पढ़ाई संस्कृति पर हमला कैसे करती है? क्या पूरे देश में अंग्रेजी पढ़ने से संस्कृतियाँ बर्बाद हो गईं? जब तक आपको यह न कह दिया जाए कि आपके राज्य की भाषा स्कूलों में मत पढ़ाइए, तब तक हिन्दी हमला कैसे कर रही है समझ में नहीं आता।

राजनीति से जुड़े लोग अगर चाहते हैं कि दक्षिण के लोग, या गैर-हिन्दीभाषी हिन्दी को अपनाएँ तो आप यह भी सुनिश्चित कीजिए की हिन्दीभाषी राज्यों के पर्यटन स्थलों, दिशानिर्देश वाले बोर्डों पर लिखी बातें हर राज्य की भाषा में उपलब्ध हो। आप बोर्ड बड़ा करें, या नाम छोटे करें, ये आपकी समस्या है। या फिर दक्षिण के राज्यों से ऐसे अनुबंध किए जाएँ कि हमारे राज्य में आपके राज्य की भाषा को हर जगह प्राथमिकता दी जाएगी, हर जगह दिखाया जाएगा, ताकि आपके नागरिकों को समस्या न हो।

ताली दोनों हाथों से बजती है

जब तक आप एक हाथ नहीं बढ़ाएँगे, दूसरा इसे अपने ऊपर हमले की तरह देखेगा क्योंकि वहाँ के नेता के लिए इसका डर पैदा करना एक मुद्दा है। एक नई भाषा जानना किसी भी लिहाज से नकारात्मक नहीं, वह आपको हमेशा मदद ही करेगी। लेकिन यह नई भाषा सिर्फ तमिलनाडु के लिए हिन्दी सीखना ही न रहे, बिहार में भी कन्नड़ बन कर दिखे, उड़ीसा में मणिपुरी बन कर दिखे, गुजरात में तमिल बन कर दिखे, कश्मीर में तेलुगु बन कर दिखे।

इसलिए, हिन्दी न तो सबसे महान भाषा है, न ही यह गुटखा खाने वालो की भाषा है। सारी भाषाएँ राष्ट्र की धरोहर हैं, विरासत हैं। सबकी समृद्धि इसी में है कि इनके शब्दों को दूसरे के साहित्य में, बोलचाल में जगह मिले, एक-दूसरे के इलाकों में वो साइनबोर्ड पर दिखें, कोई कनपुरिया तमिल में बोल कर दूसरे पर इम्प्रेशन झाड़े और कोई कन्नडिगा दूसरे लड़के को कहे कि ‘अबे जानते हो, बनारस के घाट पर दस रुपए की चार इडली मिलती है!’

ताली दो हाथों से बजती है। हमारी पीढ़ी तो इसी राजनीति में निकल गई। हमारे बच्चे अगर घर आएँ और बताएँ कि ‘मम्मी, तुम्हें पता है मम्मी को तमिल में क्या कहते हैं?’ इससे किसी भी माँ को कभी ऐसा नहीं लगेगा कि उसका बच्चा संस्कृति त्याग रहा है। मम्मी सुनने में समस्या नहीं तो अम्मा, आई, तल्ली, अव्वा, तल्लई सुनने में क्या समस्या है!

पूरी मानवता नई चीजें सीखने में लगी है, हर जगह भाषाओं को बचाने के लिए तमाम प्रयत्न किए जा रहे हैं, और यहाँ हम 130 करोड़ की आबादी लिए अपनी संस्कृति को समृद्ध करने की जगह अपनी घृणा और पूर्वग्रहों से उसे संकुचित करने की फिराक में हैं। इतने लोग हैं, अगर एक-एक नई भाषा सीख लेंगे तो उस भाषा और संस्कृति को बढ़ने का ही मौका मिलेगा।

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अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
सम्पादक (ऑपइंडिया) | लेखक (बकर पुराण, घर वापसी, There Will Be No Love)

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