Tuesday, June 22, 2021
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टिकरी बॉर्डर पर किसान आंदोलन में फिर से यौन उत्पीड़न की घटना क्या सन्देश देती है?

किसानों को समर्थन देने की मंशा लेकर पहुँचने वाले लोग विरोध की जगह जाने के लिए स्वतंत्र हैं पर इसके साथ किस तरह का जोखिम जुड़ा हुआ है, उसकी भी समझ लेकर जाएँ।

टिकरी बॉर्डर पर फिर से यौन उत्पीड़न के घटना की खबर है। खबर के अनुसार उपस्थित किसानों की सहायता के लिए बनाए गए एक अस्थाई अस्पताल में कोरोना और टीकाकरण को लेकर जागरूकता फैलाने अमेरिका से आई एक महिला ने इंस्टाग्राम पर अपनी पोस्ट में यह आरोप लगाया है कि अस्थाई अस्पताल में डॉक्टर के सहायक के रूप में काम कर रहे लोगों ने उसके साथ छेड़छाड़ और उसका यौन उत्पीड़न किया। पीड़िता ने यह आरोप भी लगाया कि जब उसने अस्पताल में कार्यरत डॉक्टर स्वाईमान सिंह को घटना की जानकारी दी तो उन्होंने अपने सहायकों के खिलाफ कार्यवाई करने से यह कहते हुए मना कर दिया कि पीड़िता तो कुछ दिनों के लिए अमेरिका से आई है, ये सहायक तो बहुत दिनों से काम कर रहे हैं, ऐसे में वे इनके खिलाफ कोई कदम नहीं उठा सकते।

इस अस्थाई अस्पताल का नाम पिंड कैलिफ़ोर्निया है।

जब से किसानों ने आंदोलन शुरू किया है, टिकरी में ऐसी यह दूसरी घटना है। पहली घटना करीब एक महीना पहले हुई थी, जिसमें पश्चिम बंगाल से आंदोलन करने आई एक युवती के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ था। बाद में युवती की कोरोना संक्रमण से मृत्यु हो गई थी। अप्रैल महीने में हुई इस आपराधिक घटना में आम आदमी पार्टी के दो नेताओं सहित तीन लोगों के शामिल होने की खबर थी।

अधिकतर लोगों के लिए यह दुःख और शर्म की बात है। पर क्या सब इस घटना से शर्मिंदा होंगे? शायद नहीं। आंदोलनकारियों और आन्दोलनजीवियों की सहायता करने के लिए तत्पर लोगों के साथ ऐसा अपराध यदि एक बार हो तो माना जा सकता है कि आंदोलन में लिप्त लोगों को शायद ऐसे अपराध की आशा न होगी इसलिए ऐसी कोई संभावित घटना न हो, इसके लिए उन्होंने किसी तरह का इंतज़ाम करने के बारे में नहीं सोचा होगा। पर यदि ऐसा अपराध एक ही जगह दो बार हो जाए तब?

तब भी क्या आंदोलन के लिए लोगों को इकट्ठा करने का काम जिन्होंने किया है, वे अपनी जिम्मेदारियों से मुँह मोड़ सकते हैं? बलात्कार की पहली घटना का खुलासा भी तब हुआ, जब युवती की मृत्य हो गई। यदि ऐसा न होता तो शायद उस अपराध की जानकारी बाहर न आती। चिंता का विषय यह था कि जब बातें सामने आनी शुरू हुईं तब पता चला कि न केवल योगेंद्र यादव को बल्कि उनकी पत्नी को भी अपराध की जानकारी पहले से थी और पुलिस के पास जाने की जगह ये लोग लड़की के पिता को साधने में लगे रहे ताकि बातें बाहर न आएँ।

इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ है। जब पीड़िता ने डॉक्टर से शिकायत की तो उसका सीधा जवाब था कि वो आरोपियों के विरुद्ध इसलिए कुछ नहीं कर सकता क्योंकि ये लोग आंदोलन के लिए बहुत दिनों से काम करते रहे हैं। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि कैसे लोगों को लेकर ये आंदोलन चलाया जा रहा है? यह कैसा आंदोलन है, जिसमें एक महीने के अंतराल में यौन अपराध की दो घटनाएँ हो जाती हैं और दोनों बार आंदोलन चलाने वाले अपराध को छिपाने की कोशिश करते हैं?

पहली बार अपराध का पता देर से इसलिए चला क्योंकि कोशिश करके लड़की के पिता को कई दिनों तक चुप करवाया गया। एक कारण शायद यह भी था कि पीड़िता के पिता इस आशा में थे कि शिकायत करने के बाद जिम्मेदार लोग कार्रवाई करेंगे। दूसरी बार अपराध का खुलासा शायद इसलिए हो पाया क्योंकि पीड़िता अपने फैसले लेने के लिए भी स्वतंत्र थी और उसे बताने के लिए भी। दूसरी बार भी यदि कोई भारतीय महिला होती तो शायद अपराध की जानकारी इतनी जल्दी बाहर न आती।

इस तरह का अपराध होने के बाद आंदोलनकारियों के बचाव में सबसे बड़ा एक तर्क यह दिया जाता है कि अपराध के ऐसे आरोप इसलिए लगाए जा रहे हैं ताकि आंदोलन और किसानों को बदनाम किया जाए। यह कैसा तर्क है? यह कैसे संभव है कि एक भीड़ जो सफल आंदोलन चलाने का दावा करती है, उसे यह नहीं पता कि उसके बीच कौन लोग रह रहे हैं? कौन लोग हैं, जो लगातार रह रहे हैं?

कोई तो नियम होगा वहाँ आने-जाने और बराबर रहने वालों के लिए? खासकर ऐसी जगह, जहाँ लोग सात महीने से हैं और जहाँ यह तक सुनिश्चित किया गया है कि पाँव की मालिश करने के लिए मशीन आवश्यक है? जिन आंदोलन के लिए तरह-तरह की सुविधाएँ सुनिश्चित की गई हैं, वहाँ यह कैसे सुनिश्चित नहीं किया जा सका कि उपस्थिति रहने वाले हर व्यक्ति की जानकारी रहे?

आंदोलन से सहमत न रहने वाले भी नहीं चाहेंगे कि आंदोलन की जगह ऐसे अपराध हों पर उन लोगों को भी विचार करने की आवश्यकता है जो आंदोलन के प्रति अपना समर्थन दिखाने के लिए स्थल पर आना तो चाहते हैं पर आंदोलन की उनकी जानकारी किसी तरह के प्रोपेगंडा पर आधारित है।

जिस तरह की बातें और तर्क सुनाई या दिखाई देते हैं, उससे यह साफ़ हो जाता है कि किसान आंदोलन केवल किसानों और उनकी समस्याओं के बारे में नहीं रहा। इसके साथ कई और ग्रुप जुड़ गए हैं, जिनका अपना निहित स्वार्थ है। ऐसे में केवल किसानों को समर्थन देने की मंशा लेकर पहुँचने वाले लोग विरोध की जगह जाने के लिए स्वतंत्र हैं पर इसके साथ किस तरह का जोखिम जुड़ा हुआ है, उसकी भी समझ लेकर जाएँ तो व्यक्तिगत तौर पर उनके लिए सही रहेगा।

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