Wednesday, October 21, 2020
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‘क्रीमी लेयर’ और सामाजिक न्याय का अपहरण

कुछ जरूरत से ज्यादा अधिकार-सचेत और साधन-संपन्न दलित-पिछड़ों की "नव-वर्चस्ववादी" मानसिकता सामाजिक-आर्थिक विकास के आख़िरी पायदान पर ठिठके अपने ही आरक्षित समुदाय के भाई-बहिनों को हिस्सेदारी नहीं देना चाहती।

सन् 1990 ई. में मंडल कमीशन लागू होने के बाद सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में पिछड़ी जातियों के लिए 27% आरक्षण का प्रावधान किया गया था। यह समावेशी विकास और न्यायपूर्ण समाज की स्थापना की दिशा में की गई एक महत्वपूर्ण पहल थी। समाज की पिछड़ी जातियों के लिए किए गए इस संवैधानिक प्रावधान में ‘पिछड़ेपन’ के निर्धारण के लिए तीन आयामों को आधार बनाया गया था- सामाजिक पिछड़ापन, आर्थिक पिछड़ापन और शैक्षणिक पिछड़ापन। ये तीनों ही मानदंड समय-समय पर पुनरीक्षित होते रहे हैं। इसीलिए पिछड़े वर्गों की सूची में नई-नई जातियाँ शामिल होती रही हैं।

सामाजिक न्याय की अवधारणा से उद्भूत आरक्षण का प्रावधान डॉ. भीमराव अम्बेडकर की सामाजिक न्याय-बुद्धि की संवेदनशील आयोजना है। समाज एक स्थिर या जड़ इकाई नहीं है। वह निरंतर गतिशील और विकसनशील सरणि है। इस आयोजना को फलीभूत करने के लिए समय-समय पर इसके प्राप्य और संभाव्य का आकलन किया जाना चाहिए। साथ ही, आरक्षण के उद्देश्यों और आधारों की भी समीक्षा की जानी चाहिए। ‘हम कौन थे, क्या हो गये हैं और क्या होंगे अभी’ जैसी समीक्षात्मक दृष्टि ही राष्ट्रीय विकास-योजनाओं में सबकी भागीदारी सुनिश्चित कर सकती है।

‘पिछड़ेपन’ के निर्धारण में भारत सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण मंत्रालय का 8 सितंबर, 1993 का कार्यालय ज्ञापन महत्वपूर्ण आधार-सरणि है। इस कार्यालय ज्ञापन में स्पष्ट किया गया है कि किन सरकारी और संवैधानिक पदों पर बैठे हुए और किस आयवर्ग के लोग ‘पिछड़ेपन’ के दायरे में नहीं आते हैं। यह कार्यालय ज्ञापन पिछड़ेपन के दायरे में न आने वाले “क्रीमी लेयर” व्यक्तियों के बारे में स्पष्ट निर्देश देता है।

इस ज्ञापन के बिंदु क्रमांक VI के अनुसार कुल 1 लाख रुपए वार्षिक से अधिक आय (कृषि आय को छोड़ कर) वाले व्यक्ति क्रीमी लेयर माने जाएँगे और वे आरक्षण लाभ की परिधि से बाहर होंगे। अभी यह आय-सीमा 8 लाख रुपए वार्षिक है। इस कार्यालय ज्ञापन के इसी बिंदु की भेदभावपूर्ण व्याख्या की गयी। और केंद्र/राज्य सरकारों के विभागों में कार्यरत व्यक्तियों और पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स एवं बैंक, विश्वविद्यालय आदि स्वायत्त निकायों में कार्यरत व्यक्तियों के वेतन को क्रीमी लेयर की आय गणना में शामिल करने को लेकर भेदभाव किया गया है।

अभी पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग और स्वायत्त निकायों में छोटे-बड़े सभी पदों पर कार्यरत व्यक्तियों के वेतन को क्रीमी लेयर के लिए निर्धारित आय-सीमा में जोड़ा जाता है। जबकि क्रीमी लेयर के लिए निर्धारित आय-सीमा में राज्य और केंद्र सरकार में कार्यरत व्यक्तियों के वेतन को नहीं जोड़ा जाता है। सरकारी नौकरियों के समूह क और समूह ख (जोकि उपरोक्त कार्यालय ज्ञापन के बिंदु क्रमांक IIA और II B के अनुसार क्रीमी लेयर माने गए हैं) की तरह पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग में पदक्रम की स्पष्टता नहीं होती और वेतनमान और भत्तों आदि के मामले में सरकारी नौकरियों से उनकी समरूपता या समानता (Equivalence) भी नहीं होती।

इसी कार्यालय ज्ञापन के बिंदु क्रमांक II C के अनुसार यथाशीघ्र तमाम बैंकों, विश्वविद्यालयों और भेल, गेल जैसे नवरत्नों के कर्मियों के वेतनमान और भत्तों आदि की सरकारी कर्मचारियों के साथ समानता या समरूपता की जानी चाहिए थी, जोकि नहीं की गई। विभिन्न प्रतिष्ठानों,संस्थानों और सरकारों में कार्यरत व्यक्तियों के वेतन को क्रीमी लेयर के लिए निर्धारित आय सीमा में शामिल करने को लेकर अस्पष्टता से ‘भेदभाव’ की स्थिति बनी हुई थी।

इस तथ्य को समझते हुए राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग से परामर्श के आधार पर वर्तमान केंद्र सरकार ने एक कानून बनाने का निर्णय किया है। इस कानून द्वारा सभी नौकरी पेशा व्यक्तियों की वेतन सहित सभी स्रोतों से आय (कृषि आय को छोड़कर) को क्रीमी लेयर के लिए निर्धारित आय की गणना में जोड़ा जाएगा। इससे अब तक चला आ रहा उपरोक्त भेदभाव मिट सकेगा। साथ ही, अपेक्षाकृत समर्थ और संपन्न लोग क्रीमी लेयर में आने के कारण आरक्षण की परिधि से बाहर हो जाएँगे। इससे आरक्षण जैसे संवैधानिक प्रावधान का लाभ अधिक जरूरतमंद और वास्तविक हकदार अभ्यर्थियों तक पहुँच सकेगा।

लेकिन कुछ मलाईमार लोगों द्वारा सरकार की इस सुचिंतित और न्यायपूर्ण पहल का विरोध किया जा रहा है। इनमें समूह क और ख के अलावा सरकारी नौकरियों में लगे हुए लोग सर्वाधिक हैं। उनका यह विरोध अत्यंत दुःखद और निराशाजनक है। निश्चय ही, यह विरोध स्वार्थ-प्रेरित है। विरोध करने वालों का तर्क यह है कि जब तक पिछड़े वर्गों के लिए निर्धारित 27% पदों को विभिन्न विभागों में भरा नहीं जाता, तब तक “क्रीमी लेयर की आय-गणना” के साथ किसी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं की जानी चाहिए।

वे यह भी चाहते हैं कि क्रीमी लेयर की आय-सीमा को भी बढ़ाकर 20 लाख रुपए वार्षिक किया जाना चाहिए, ताकि ज्यादा-से-ज्यादा लोग आरक्षण की परिधि में आ सकें। उनका एक तर्क यह भी है कि इससे (सभी पदों के वेतन को क्रीमी लेयर निर्धारण में शामिल करने से) आरक्षण का आधार सामाजिक न रहकर आर्थिक हो जाएगा। जबकि वास्तविकता यह है कि आय सीमा या आर्थिक स्तर सामाजिक रूप से पिछड़ी जातियों के व्यक्तियों का ही देखा जाएगा। इसलिए आरक्षण का मूल आधार तो सामाजिक पिछड़ापन ही रहेगा। उनकी आशंका यह भी है कि नए बनने वाले कानून से काफी लोग क्रीमी लेयर में आ जाएँगे और पिछड़े वर्ग के लिए निर्धारित पदों के लिए योग्य व्यक्ति नहीं मिल सकेंगे और वे सीटें एनएफएस हो जाया करेंगी। वे इस नए बनने वाले कानून को सामाजिक न्याय की हत्या करने जैसा बता रहे हैं। उनके अनुसार यह कानून आरक्षण के खिलाफ साजिश है।

वास्तव में, इस तर्क की आधारहीनता और अर्थहीनता इस तथ्य से ही स्पष्ट हो जाती है कि आजकल न सिर्फ पिछड़े वर्गों, बल्कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों तक के लिए निर्धारित एक-एक पद के लिए सैकड़ों आवेदक होते हैं। और इन वर्गों के “क्रीमी लेयर” बाजी मार ले जाते हैं और वास्तविक दलित-पिछड़े ताकते रह जाते हैं। वास्तविकता यह है कि आरक्षण का लाभ सर्वाधिक वंचित और पिछड़े लोगों तक नहीं पहुँच पा रहा है। पिछड़े-वंचित तबकों के ही जो अपेक्षाकृत उच्चवर्गीय और समर्थ लोग हैं, खाते-पीते और खुशहाल लोग हैं, वही आरक्षण का लाभ ले रहे हैं। इसीलिए माननीय उच्चतम न्यायालय ने कई बार अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए भी “क्रीमी लेयर” निर्धारित करने की बात की है, ताकि आरक्षण जैसे संवैधानिक प्रावधान का लाभ संबंधित वर्गों और समाजों के लक्षित और अधिकारी व्यक्तियों और समूहों तक पहुँच सके।

उल्लेखनीय है कि कोई भी प्रावधान या उपचार सापेक्षिकता में ही सर्वाधिक प्रभावी हो सकता है। पिछड़ी जातियों और समूहों में सापेक्षिकता के सिद्धांत को लागू करके आरक्षण को भी अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। प्रतियोगिता या प्रतिस्पर्धा में सापेक्षिकता का विशेष महत्त्व है। इसीलिए विभिन्न आयोगों और समितियों की सिफारिशों के आधार पर कई राज्य सरकारों ने सापेक्षिक पिछड़ेपन के आधार पर अति पिछड़े और अति दलितों की अलग उपश्रेणियाँ बनाकर उनके आंतरिक संरक्षण और समुचित विकास की पहल की है।

महात्मा गाँधी से लेकर पंडित दीनदयाल उपाध्याय तक भारत के तमाम सामाजिक विचारकों ने ‘पंक्ति में खड़े हुए अंतिम व्यक्ति के हित-चिंतन, विकास और संरक्षण की विचारणा’ दी। आरक्षण का मूल मंतव्य भी अंतिम जन को मुख्यधारा में शामिल करना है। वस्तुतः सरकार की यह पहल सामाजिक न्याय और समावेशी समाज की स्थापना के इसी भावबोध से अभिप्रेरित है। लेकिन इसका विरोध आरक्षित वर्गों की उस “नव-वर्चस्ववादी” मानसिकता द्वारा किया जा रहा है, जो मुखर है और आरक्षण के ऊपर सिर्फ अपनी इजारेदारी बनाए रखना चाहती है।

यह मानसिकता नहीं चाहती कि इन संवैधानिक प्रावधानों का लाभ सर्वाधिक वंचित-उपेक्षित व्यक्तियों और जातियों तक पहुँचे। कुछ जरूरत से ज्यादा अधिकार-सचेत और साधन-संपन्न दलित-पिछड़ों की “नव-वर्चस्ववादी” मानसिकता सामाजिक-आर्थिक विकास के आख़िरी पायदान पर ठिठके अपने ही आरक्षित समुदाय के भाई-बहिनों को हिस्सेदारी नहीं देना चाहती। उनकी यह मानसिकता तथाकथित सवर्णों की उस मानसिकता से तनिक भी अलग नहीं है, जो पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के योग्यतम अभ्यर्थियों को नियुक्ति के समय एनएफएस कर देती है।

आरक्षण को असफल करने में और उसके प्रावधानों का गोलमाल करने में सवर्ण जातियों और सम्पन्न पिछड़ों-दलितों का अद्भुत गठजोड़ है। सवर्ण समाज के लोग दलित-वंचित-पिछड़े समाज के लोगों को उनका हक और हिस्सा नहीं देते और उनके हक को हड़पने की नई-नई तरकीबें खोजते रहते हैं। ठीक इसी प्रकार आरक्षण के खाए-अघाए और अपेक्षाकृत समर्थ-सम्पन्न पिछड़े-दलित अपनी ही जाति/वर्ग के सर्वाधिक वंचितों की सत्ता, नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में भागीदारी नहीं होने देना चाहते। वे इसे अपना एकाधिकार मान बैठे हैं। वे भी इस अधिकार-वंचना के लिए नायाब तर्क ढूँढते रहते हैं।

अपने आरक्षित चरागाहों में अपने भाई-बहनों का प्रवेश उनके लिए असह्य ही है। ये आरक्षित क्षेत्र अघोषित नो एंट्री जोन बना दिए गए हैं। यही पश्चिम प्रेरित पूँजीवादी चरित्र है, जो साधनों-संसाधनों और सुविधाओं पर अपना वर्चस्व और स्थाई स्वामित्व चाहता है। लेकिन समय आ गया है कि अब हमें ‘तोड़ने ही होंगे मठ और गढ़ सब’, वे चाहे जिसके हों। जिनके पिछड़ेपन, अभाव और वंचना के मद्देनज़र यह प्रावधान किया गया, उन तक इसे पहुँचाना राज्य और नागरिक समाज का संयुक्त दायित्व है।

इसीलिए सरकार द्वारा क्रीमी लेयर निर्धारण में अभी तक चले आ रहे भेदभाव और अन्याय को समाप्त किया जा रहा है। अब वेतन सहित सभी स्रोतों से आय को क्रीमी लेयर निर्धारण का आधार बनाया जा रहा है। इसमें कृषि आय को भी शामिल किया जाना चाहिए। यह कानून सामाजिक न्याय की दिशा में की जा रही एक बड़ी और प्रगतिशील पहल है। इसका स्वागत किया जाना चाहिए।

सरकार को क्रीमी लेयर के लिए निर्धारित वर्तमान आय सीमा 8 लाख रुपए वार्षिक को भी बहुत अधिक नहीं बढ़ाना चाहिए। इससे समाज के सर्वाधिक वंचित और पिछड़े व्यक्तियों के साथ न्याय सुनिश्चित हो सकेगा। इसके साथ ही, सरकार पिछड़े वर्गों और अनुसूचित जातियों और जनजातियों में उनके पिछड़ेपन के आधार पर वरीयता क्रम में दो या तीन उपश्रेणियाँ बना सकती है। एक आरक्षित उपश्रेणी में अभ्यर्थी/आवेदक न मिलने की स्थिति में दूसरी आरक्षित उपश्रेणी के अभ्यर्थी/आवेदक को अवसर देने का प्रावधान किया जाना चाहिए ताकि श्रेणी विशेष के लिए आरक्षित पदों पर अनिवार्यतः उसी श्रेणी के लोगों को अवसर मिले और उनके लिए आरक्षित पद अभ्यर्थियों के अभाव में न तो खाली रहें और न ही सामान्य श्रेणी द्वारा लील लिए जाएँ।

हमें आरक्षण जैसे संवैधानिक प्रावधान की भावना को समझना चाहिए और उसका सम्मान करना चाहिए। जब सवर्ण समाज के साथ-साथ दलित-पिछड़ा समाज भी आरक्षण जैसे संवैधानिक प्रावधान की सच्ची भावना और उसके वास्तविक उद्देश्य को आत्मसात करेगा, तभी इसके लक्षित फल प्राप्त हो सकेंगे। इधर कुछ वर्षों से आरक्षण सामाजिक न्याय और समावेशी विकास के उपकरण से कहीं अधिक सामाजिक विद्वेष और विभाजन की वजह बनता जा रहा है। आरक्षण जैसे संवैधानिक प्रावधान का लाभ उसके वास्तविक हकदारों तक पहुँचने पर ही सामाजिक न्याय और समावेशी विकास का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकेगा।

सवर्ण समाज को अपने सदियों से अधिकार-वंचित दलित-पिछड़े भाई-बहनों के प्रति सदाशय, उदार और संवेदनशील होने की आवश्यकता है। साथ ही, दलित और पिछड़े वर्गों के भी अपेक्षाकृत समर्थ और संपन्न लोगों को अपने ही समाज के कहीं अधिक असमर्थ, उपेक्षित, गरीब और वंचित व्यक्तियों और जातियों के प्रति उदार और संवेदनशील होने की भी आवश्यकता है।

विभिन्न राजनीतिक दलों के लिए आरक्षण सामाजिक सशक्तिकरण और विकास का साधन न होकर ‘वोट बैंक की राजनीति’ का पर्याय है। सरकारों को भी राजनीतिक रूप से संगठित जातियों और दबाव-समूहों के प्रभाव में आकर आरक्षित वर्ग की सूची को निरंतर बढ़ाते नहीं जाना चाहिए। बल्कि उन्हें सुनिश्चित करना चाहिए कि इन वर्गों के लिए निर्धारित आरक्षण ठीक तरह लागू हो और उसका लाभ उसके वास्तविक हक़दार तबकों तक पहुँचे।

सरकारों की यह कोशिश भी होनी चाहिए कि आरक्षित वर्गों और जातियों की सूची लगातार लंबी होने की जगह क्रमशः छोटी होती जाए। इसके लिए आरक्षण का लाभ लेने वाले लाभार्थियों की आगामी पीढ़ियों को आरक्षण का लाभ नहीं दिया जाना चाहिए। अगर आरक्षण के प्रावधानों से पिछड़ों-दलितों-वंचितों का सशक्तीकरण होता है, तो उन लाभार्थियों की भावी पीढ़ियों को क्रीमी लेयर में शामिल करके भविष्य में आरक्षण लाभ से वंचित क्यों नहीं किया जाना चाहिए? ऐसा करने से ही आरक्षण जैसे संवैधानिक प्रावधान का लाभ त्वरित गति से नीचे तक पहुँचेगा और आरक्षण के क्षेत्र में भी ‘ट्रिकल डाउन’ की सैद्धान्तिकी सचमुच फलीभूत होगी।

भारत जैसे विकासशील देश में सरकारी संस्थान, सेवाएँ, संसाधन और सुविधाएँ सीमित हैं। इसलिए इनका न्यायपूर्ण वितरण कल्याणकारी राज्य का प्राथमिक दायित्व है। समाज के सर्वाधिक वंचित व्यक्ति – दरिद्र नारायण – की हिस्सेदारी सुनिश्चित करके ही राज्य वैधता प्राप्त करता है। ऐसा करने से ही राज्य-व्यवस्था में नागरिकों की आस्था पैदा होती है और विश्वास बरकरार रहता है। इसी से विच्छिन्न और बीमार समाज स्वस्थ, समरस और सौहार्दपूर्ण बनता है।

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प्रो. रसाल सिंह
प्रोफेसर और अध्यक्ष के रूप में हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषा विभाग, जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं। साथ ही, विश्वविद्यालय के अधिष्ठाता, छात्र कल्याण का भी दायित्व निर्वहन कर रहे हैं। इससे पहले दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज में पढ़ाते थे। दो कार्यावधि के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय की अकादमिक परिषद के निर्वाचित सदस्य रहे हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में सामाजिक-राजनीतिक और साहित्यिक विषयों पर नियमित लेखन करते हैं। संपर्क-8800886847

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