पीरियड आते ही मुस्लिम लड़कियों की शादी जायज: कब बदलेगा कठमुल्लों का कानून

शादी की न्यूनतम उम्र कितनी हो इस पर भारत में अरसे से बहस चल रही है। अंग्रेजी राज में इस संबंध में पहली बार कानून बना। बाद में कई बार बदलाव हुए। लेकिन, मुसलमान बदलाव से अछूते रहे। समान उम्र को लेकर हाई कोर्ट में याचिका से जगी उम्मीदें।

माहवारी क्या है?

माहवारी महिलाओं के शरीर में होने वाली एक सामान्य वैज्ञानिक क्रिया है। किशोरवय से शुरू होकर अमूमन अधेड़ावस्था तक यह मासिक प्रक्रिया चलती है। विज्ञान के नजरिए से देखें तो पीरियड गर्भाशय की आंतरिक सतह एंडोमेट्रियम के टूटने से होने वाला रक्त स्राव है। गर्भधारण और शरीर में हार्मोन नियंत्रण के लिए इस प्रक्रिया का सामान्य होना आवश्यक है।

क्या माहवारी का शादी की उम्र से कोई रिश्ता है?

नहीं। अमूमन माहवारी 15 साल की उम्र में शुरू हो जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अध्ययन बताते हैं कि 20 साल की उम्र से पहले शादी और मॉं बनने का महिलाओं के आगे के जीवन पर प्रतिकूल असर पड़ता है।

फिर पीरियड शुरू होते ही मुस्लिम लड़कियों की शादी क्यों जायज है?

दकियानूसी सोच, कठमुल्लों के दबाव और मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट 1937 की वजह से यह स्थिति है। यूनिसेफ के आँकड़े बताते हैं कि भारत में 27 फीसदी लड़कियों की शादी 18 साल और 7 फीसदी की 15 साल की उम्र से पहले हो जाती है। इसमें एक बड़ा हिस्सा मुस्लिम समुदाय का है।

क्या बाल विवाह निषेध कानून (पीसीएमए) 2006 मुसलमानों पर लागू होता है?

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जवाब हाँ भी है और ना भी है। कानूनी स्थिति बेहद स्पष्ट नहीं है। दिल्ली हाईकोर्ट ने 2012 में एक 15 साल की लड़की की अपनी मर्जी से शादी को वैलिड मानते हुए कहा था कि इस्लामिक कानून के मुताबिक लड़की मासिक धर्म शुरू होने के बाद अपनी इच्छा के मुताबिक शादी कर सकती है। गुजरात हाई कोर्ट ने 2015 में कहा था कि बाल विवाह निषेध कानून 2006 के दायरे में मुसलमान भी आते हैं। अक्टूबर 2017 में सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस एमबी लोकुर और दीपक गुप्ता ने मुसलमानों के अलग विवाह कानून को पीसीएमए के साथ मजाक बताया था। सितंबर 2018 में पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने कहा था कि मुस्लिम समुदाय पर यह कानून लागू नहीं होता। अदालत का कहना था कि मुस्लिम पर्सनल लॉ स्पेशल एक्ट है, जबकि पीसीएमए एक सामान्य एक्ट है।

तीन तलाक की तरह मुस्लिम लड़कियों को इस कलंक से भी मिलेगा छुटकारा?

उम्मीद बॅंधी है। दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर कर सभी धर्मों में शादी की उम्र को लड़के और लड़कियों के लिए एक समान न्यूनतम 21 साल करने की माँग की गई है। इस पर अगली सुनवाई 30 अक्टूबर को होनी है।

याचिका दाखिल होने से उम्मीदें जगने का कारण भी तीन तलाक का ही मामला देता है। फरवरी 2016 में उत्तराखंड की शायरा बानो ने तीन तलाक, बहुविवाह और निकाह हलाला पर प्रतिबंध की मॉंग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। अगस्त 2017 सुप्रीम कोर्ट ने एक साथ तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया। जुलाई 2019 मोदी सरकार ने एक साथ तीन तलाक को अपराध बनाने वाला कानून बनाया।

ब्याह की उम्र कितनी, बहस पुरानी

शादी की न्यूनतम उम्र कितनी हो इस पर भारत में अरसे से बहस चल रही है। अंग्रेजी राज में इस संबंध में पहली बार कानून बना। बाद में कई बार बदलाव हुए। लेकिन, मुसलमान बदलाव से अछूते रहे।

1860 के इंडियन पीनल कोड में शादी की उम्र का कोई जिक्र नहीं था, लेकिन 10 साल से कम उम्र की लड़की के साथ शारीरिक संबंध को गैरकानूनी बताया गया था। फिर धर्म के आधार पर शादी की उम्र को लेकर कानून आए। इंडियन क्रिश्चियन मैरिज एक्ट 1872 में लड़के की न्यूनतम उम्र 16 साल और लड़की की न्यूनतम उम्र 13 साल तय की गई। 1875 में आए मेजोरिटी एक्ट में पहली बार बालिग होने की उम्र 18 साल तय की गई। इसमें शादी की न्यूनतम उम्र का तो कोई जिक्र नहीं था, लेकिन लड़के और लड़की दोनों के बालिग होने की उम्र 18 साल मानी गई।

1927 में ‘एज ऑफ कंसेट बिल’ लाकर 12 साल से कम उम्र की लड़की की शादी को प्रतिबंधित किया गया। 1929 में पहली बार शादी की उम्र को लेकर कानून बना। बाल विवाह निरोधक कानून 1929 के अनुसार शादी के लिए लड़के की न्यूनतम आयु 18 साल और लड़की की न्यूनतम आयु 16 साल तय की गई।

1955 में हिंदू मैरिज एक्ट बना जो हिंदुओं के साथ जैन, बौद्ध और सिखों पर भी लागू था। इसके मुताबिक शादी के लिए लड़के की न्यूनतम उम्र 18 साल और लड़की की 15 साल रखी गई। पारसी मैरिज एक्ट में भी लड़के की उम्र 18 और लड़की की उम्र 15 साल रखी गई।

1978 में बाल विवाह कानून में संशोधन किया गया। इसमें लड़के की शादी की न्यूनतम उम्र 21 साल और लड़की की 18 साल कर दी गई। 2012 में सिखों के लिए अलग से आनंद मैरिज बिल लागू किया गया।

1929 के बाल विवाह निषेध अधिनियम को निरस्त कर केंद्र सरकार बाल विवाह निषेध कानून 2006 लेकर आई। नवंबर 2007 से यह कानून लागू किया गया। यह कानून सभी धर्मों पर लागू होता है। लेकिन, मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट 1937 की वजह से यह पूरी तरह कारगर साबित नहीं हो पा रहा।

दिल्ली हाई कोर्ट में शादी के समान उम्र को लेकर याचिका दाखिल करने वाले वकील अश्विनी उपाध्याय के मुताबिक भारत में मुस्लिम लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र 15 साल है, क्योंकि भारत में इसे मासिक धर्म शुरू होने की उम्र माना गया है। बीते साल लॉ कमीशन ने भी शादी की उम्र लड़के-लड़कियों के लिए समान करने की सलाह दी थी। कमीशन ने कहा था कि शादी की उम्र में अंतर रखना रूढ़िवाद को बढ़ावा देता है और इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है।

तुष्टिकरण नीति से कठमुल्लों की बल्ले-बल्ले

1929 के कानून का मुसलमानों ने विरोध किया। अंग्रेजों ने भारत में सांप्रदायिकता की लकीर खींचने के लिए, जो बाद में देश के विभाजन की वजह बनी, उनकी मॉंग मान ली। मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट 1937 अमल में आया। इसके मुताबिक मुस्लिम लड़कियों की शादी की कोई न्यूनतम उम्र नहीं होगी। मासिक धर्म शुरू होने की उम्र पर पहुॅंचने के बाद मुस्लिम लड़कियों की इच्छा के मुताबिक किसी भी उम्र पर शादी की जा सकेगी।

अंग्रेज गए, नेहरू-गाँधी आ गए

दुर्भाग्य देखिए। अंग्रेज चले गए और उनके बाद सत्ता में कॉन्ग्रेस आई। ज्यादातर समय कमान नेहरू और गॉंधी परिवार के सदस्यों के हाथ रही। इन्होंने भी अंग्रेजों की तरह सियासी फायदे के लिए तुष्टिकरण की नीति को जोर-शोर से बढ़ाया। शाहबानो प्रकरण में राजीव गॉंधी की सरकार द्वारा अदालत का फैसला पलटना इसकी एक नजीर है। यही कारण है कि आजाद भारत में बाल विवाह अधिनियम में बदलाव के बावजूद मुस्लिम पर्सनल लॉ को छुआ भी नहीं गया।

लेकिन, तीन तलाक के मामले में जिस तरह मोदी सरकार ने विपक्ष की आलोचनाओं और कठमुल्लों के विरोध को नजरंदाज कर मुस्लिमों महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान को तरजीह देते हुए कानून बनाया है, उससे मुस्लिम लड़कियों को इस कलंक से भी जल्द ही मुक्ति मिलने की उम्मीद की जा सकती है।

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