Thursday, May 28, 2020
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गुजरात के 20 बच्चों की हत्या हुई है, ज़िम्मेदारी भाजपा सरकार की है, एलियन्स की नहीं

क्या सरकार कोचिंग वालों के ऊपर एक्शन लेकर अपना पल्ला झाड़ सकती है? अगर सरकार दोषी हुई तो क्या उस सबसे बड़े अफसर पर हत्या का मुकदमा चलेगा जिसके कार्यक्षेत्र में यह विभाग आता है?

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अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
सम्पादक (ऑपइंडिया) | लेखक (बकर पुराण, घर वापसी, There Will Be No Love)

आग लगी, कुछ बच्चे जल गए, कुछ डर से कूद गए और मर गए। सूरत की बात है। सूरत गुजरात में आता है। गुजरात में भाजपा की सरकार है। सरकारों का काम होता है हर कमर्शियल संस्थान की फायर ऑडिट करना। सरकारों का काम यह भी होता है कि स्कूलों के पाठ्यक्रम में आपदा से त्वरित बचाव के उपाय बताना। सरकारों का बहुत काम होता है, लेकिन सरकारें वैसे काम नहीं करतीं।

बीस बच्चों की जान चली गई। शॉर्ट सर्किट से आग लगी और सीढ़ियों वाले हिस्सों में फैली। भगदड़ मची और कई लोग दम घुटने की वजह से मर गए। कुछ बच्चे इस आशा में कूद गए कि कहीं बच जाएँगे। कुछ बचे, कुछ उतने भाग्यशाली नहीं थे।

जब आग लगती है, और वो बिजली के तारों में लगी हो तो धुआँ इतना सघन और ज़्यादा उठता है कि आप न साँस ले पाएँगे, न आगे बढ़ पाएँगे क्योंकि दिखना बंद हो जाता है। खास कर वैसी जगहों में जो बंद हो। 2008 में मैं एक ऐसी ही आग में फँसा था, और हमारे ऑफिस के सारे लोगों का सौभाग्य था कि अधिकतर लोग धुएँ के ऊपर पहुँचने से पहले टॉप फ़्लोर से छत पर पहुँच गए थे। मैं सीढ़ियों से बहुत दूर एक केबिन में खाना खा रहा था, और जबकि किसी को याद आई कि मैं रह गया तो वो अपनी जान पर खेल कर मुझे गरियाने आया कि वो भी मरेगा, मैं भी।

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मैंने उस आग की भयावहता को देखा है जब मेरे लिए छत तक जाने की दस सीढ़ियाँ दस किलोमीटर जैसी हो गई थी। आपका शरीर जवाब देने लगता है क्योंकि आप धुएँ को फेफड़ों में भरते हैं जिसमें ऑक्सीजन नहीं होता। दिमाग सुस्त होने लगता है और आप बेहोश होते हैं, फिर कोई मदद न मिले तो आप मर जाते हैं। मेरा शरीर जब जवाब देने लगा और सामने दो मीटर चौड़े, ढाई मीटर ऊँचे खुले दरवाज़े को गर्मी के दोपहर की चिलचिलाती धूप को धुएँ ने ऐसे ढक लिया था कि मुझे लगा आज छत पर नहीं पहुँच पाऊँगा। लेकिन शायद वहाँ कुछ दोस्त इंतजार में थे, और उन्होंने मुझे खींच लिया। मैं बच गया।

सूरत के कोचिंग सेंटर के बच्चे नहीं बचे। सरकार ने ‘एन्क्वायरी’ के आदेश दे दिए हैं। नेताओं ने शोक संदेश जारी कर दिए हैं। परिवार वालों को चार लाख की सरकारी मदद की घोषणा भी हो गई है। एक दिन यह खबरों में भी चला। सोशल मीडिया पर दो दिन रहा। कल ये गायब हो जाएगा। देश बड़ा है, नई खबरें आएँगी, कोई और आपदा, इस आपदा की जगह ले लेगी। हम उस पर चर्चा करने लगेंगे।

कमर्शियल कॉम्प्लेक्स में आग से बचाव को लेकर कई नियम कानून होते हैं। आपके पास अग्निशमन यंत्र होने चाहिए, उसकी तय समय पर चेकिंग होनी चाहिए, कर्मचारियों को इसके इस्तेमाल की जानकारी होनी चाहिए। सरकार के कर्मचारी उसका ऑडिट करते हैं, और सेफ़्टी का सर्टिफ़िकेट दिया जाता है। आप समझ सकते हैं कि भारत जैसे देश में यह काम कितनी जगहों पर सही तरीके से होता होगा, और भगवान को अगरबत्ती दिखा कर कम्पनी बचाए रखने की प्रार्थना से सारे काम होते रहते होंगे।

कई स्कूलों में इसकी ट्रेनिंग दी जाती है। मेरे स्कूल में दी जाती थी। लेकिन बाकी स्कूलों के बारे में मुझे पता है कि दूसरी क्लास की किताब में लाल-पीले रंग की आग और दमकल की फोटो दिखा कर ही फायर सेफ़्टी ख़त्म हो जाती थी। सड़क की बायीं ओर चलने से लेकर, घंटी बजाने और कूड़ेदान में कूड़ादान फेंकने से लेकर आग बुझाने की बात दो पन्ने में, प्राइमरी कक्षा में पढ़ा दी जाती है। और वो भी रटा दी जाती है कि सवाल आएँ तो जवाब लिख दिया जाए। वही बच्चा सड़क की दाहिनी ओर चलता है, मम्मी के कहने पर कूड़ादान बाहर फेंक देता है, और सायकिल चलाते वक्त घंटी नहीं बजाता।

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वैसा ही व्यक्ति कोचिंग संस्थान खोलता है। वैसा ही व्यक्ति सरकार चलाता है। वैसा ही व्यक्ति कोचिंग में पढ़ता है। और, वैसा ही व्यक्ति लाशों की संख्या में से एक संख्या मात्र बन कर चला जाता है। ये आपदा नहीं, हत्याकांड है। इस हत्या का ज़िम्मा सबसे ज़्यादा कोचिंग संस्थान और सरकार पर है, और फिर आधा ज़िम्मा हमारे तंत्र का है जहाँ हम तैयार नहीं करते लोगों को।

जब उस आग से बच कर मैं घर आया, तो हमारे मित्र के भाई थे उन्होंने बताया कि वो हाल ही में एक फायर ड्रिल में गए थे। धुएँ से बचने का सबसे पहला तरीक़ा है ज़मीन पर लेट जाना क्योंकि धुआँ ज़मीन पर सबसे बाद में भरता है, क्योंकि उसकी प्रवृति ऊपर रहने की होती है। उसके बाद नाक पर किसी कपड़े को रख कर साँस लेने की कोशिश करनी चाहिए। अगर कहीं पानी हो, तो रुमाल या कपड़ा भिंगाकर नाक पर रख लीजिए, जान बचने की पूरी संभावना है। आप दम घुटने से नहीं मरेंगे। अगर पानी न मिले तो जान बचाने के लिए शरीर से लिक्विड निकालिए। कपड़े पर थूकिए, या फिर मूत्र का प्रयोग कीजिए। बचे रहने की संभावना बढ़ जाएगी

ये बातें मैं जानता था, लेकिन स्कूल के बाद भूल गया था। क्योंकि स्कूल में भी ड्रिल हमेशा नहीं होती थी। हो सकता है कि ये बातें आग लगने के वक्त याद न रहे, लेकिन अगर सबने वही पढ़ाई की होती, हर स्कूल में आपदा को लेकर तैयारी का चैप्टर प्रैक्टिकल के तौर पर पढ़ाया जा रहा होता, तो आपका सहकर्मी, आपका सहपाठी, आपका मित्र, आपकी बहन, आपकी बेटी आपको उस समय सलाह देकर बचाने की कोशिश कर सकते थे।

लेकिन, हमने कहीं नहीं पढ़ा। पढ़ा भी तो परीक्षा पास करने के लिए, जान बचाने के लिए नहीं। सरकारों ने नियम बनाए लेकिन यह याद नहीं कि ऑडिट किया कि नहीं। हो सकता है कि यह आपदा एक दुर्घटना हो, संस्थान ने ऑडिट भी कर रखा हो, उसके पास सेफ़्टी का सर्टिफ़िकेट भी हो। सर्टिफ़िकेट तो बन जाते हैं, लेकिन कई खबरें बताती हैं कि वहाँ अग्निशमन यंत्र थे ही नहीं! बीस जानें गईं। क्या सरकार कोचिंग वालों के ऊपर एक्शन लेकर अपना पल्ला झाड़ सकती है? अगर सरकार दोषी हुई तो क्या उस सबसे बड़े अफसर पर हत्या का मुकदमा चलेगा जिसके कार्यक्षेत्र में यह विभाग आता है?

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नौकरशाहों, जनप्रतिनिधियों और वकीलों ने सारे कानून अपने हिसाब के कर रखे हैं। ज़िम्मेदारी सबसे निचले व्यक्ति पर थोपी जाती है, वो सस्पैंड होता है, बाकी लोगों पर असर नहीं होता। मोदी जी ने आज कहा है कि विश्व भारत की तरफ देख रहा है। रवीश जी ने कहा कि भारत में अब राजनीति का युग बदल गया है। भाजपा के समर्थक खुश हैं कि अब स्पष्ट बहुमत फिर से मिला है।

क्या हमारे तरीके बदलेंगे? क्या सरकार इन बातों पर गम्भीर होगी कि कोटा में बच्चे आत्महत्या कर रहे हैं तो उसके लिए कुछ किया जाए? क्या स्कूलों के पाठ्यक्रम से लेकर पैरेंटल काउन्सलिंग जैसी चीज़ों पर बातें होंगी? क्या शिक्षा में किताबों की भागीदारी की बराबरी में लाइफ स्किल्स यानी जीवन जीने के लिए ज़रूरी बातों पर बच्चों को तैयार किया जाएगा? या फिर आपदाएँ नाम बदल कर आती रहेंगी, सरकारें चलती रहेंगी, सिस्टम भी चलता रहेगा?

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