Wednesday, March 3, 2021
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The Print वालों, सीधे-सीधे बोलो हिन्दू प्रतीकों से सुलग जाती है (सीने में आग)

झंडेवालाँ में हनुमान जी का निर्माण शुरू 1994 में हुआ। तब देश में ‘सेक्युलर’ कॉन्ग्रेस की सरकार थी, और 2007 में जब यह बनकर ख़त्म हुई तो देश में सोनिया 'माता' और दिल्ली में शीला दीक्षित थीं- क्यों नहीं रोक लिया? तब डर क्यों नहीं पैदा हो रहा था?

सुबह-सुबह उठते ही मोबाइल पर देखा द प्रिंट वालों ने दिल्ली के झंडेवालाँ वाले हनुमान जी की तस्वीर के साथ कुछ लिखा है। सुबह-सुबह बजरंगबली के दर्शन से मन प्रफुल्लित होने की बजाय दुश्चिंता से भर गया, क्योंकि पत्रकारिता के समुदाय विशेष की फ़ितरत पता है- हिन्दुओं की असली तारीफ़ करने की बजाय ये लोग खौलता तेल पी लेना पसंद करेंगे।

और मैं सही था- वह लेख इस बारे में था कि कैसे हिन्दू नेताओं और देवी-देवताओं की भव्य प्रतिमाएँ, उनके भव्य स्मारक समुदाय विशेष को ‘नर्वस’ कर रहे हैं।

जी हाँ। नर्वस- यानी बेचैन, परेशान। हिन्दू भव्यता समुदाय विशेष को बेचैन कर रही है- ऐसा मैं नहीं, प्रिंट कह रहा है।

बात हिन्दू मूल्यों की

लेख की शुरुआत में ही, बाकायदा लेखिका की पीएचडी का हवाला देकर, हाइपरलिंक लगा कर, बता दिया जाता है कि लेखिका समाजशास्त्र की ‘तीसमारखां’ जानकार हैं (और इसलिए इस मुद्दे पर वह जो कुछ बोलें तो उसे हमें चुपचाप सर झुकाकर मान लेना होगा)। आगे लेखिका बतातीं हैं कि प्रतिमाएँ और स्मारक किसी भी समय पर राष्ट्र के मूल्यों को प्रक्षेपित करते हैं। यानी हिन्दुओं की मूर्ति और स्मारक अगर समुदाय विशेष में बेचैनी भर रहे हैं तो ऐसा तभी हो सकता है जब दो में से एक बातें हों-

  1. या तो हिन्दू मूल्यों में ही अपने आप में ऐसी कोई खराबी है, जिससे समुदाय विशेष का डरना लाजमी है,

    और या फिर

  2. समुदाय विशेष की खुद की मूल प्रकृति और प्रवृत्ति ही यह हो कि हिन्दू मूल्यों का सांकेतिक, प्रतीकात्मक उत्थान भी उनके लिए बेचैनी का सबब हो जाए।

मुझे कोई तीसरा कारण नहीं दिखता, खुद लेखिका द्वारा वर्णित प्रतिमाओं के महत्व की संरचना के भीतर।

अब आते हैं हिन्दू मूल्यों पर। तो मुझे तो हिन्दू धर्म के मूल्यों में ऐसा कुछ नहीं दिखता, जिससे किसी को हिन्दू मूल्यों के नाम से ही बेचैनी होने लगे। न हम अपने पंथिक विचारों को इकलौता सच, इकलौता सही रास्ता मानते हैं, न ही हमारे किसी शास्त्र में ऐसा लिखा है कि जो तुमसे अलग विचार या कर्म करने की हिमाकत करे उसे परिवर्तित करो, मार डालो या सेक्स-गुलाम बनाकर बेच दो। इतिहास में शायद ही कोई वर्णन मिले जब किसी हिन्दू राजा ने अपने धर्म को मानने के लिए किसी दूसरे को मजबूर किया हो। हम तो “एकं सद् विप्राः बहुधा वदन्ति” पर चलने वाले लोग हैं। तो अगर फिर भी हिन्दू मूल्यों के भव्यीकरण से समुदाय विशेष में बेचैनी का भाव आ रहा है तो उसके लिए जिम्मेदार कौन है?

बात मुख्य चित्र की  

लेखिका जी और द प्रिंट वालों, आप प्रतिमा-निर्माण को ‘पालतू प्रोजेक्ट’ तो नरेंद्र मोदी का बता रहे हो, लेकिन तस्वीर झंडेवालाँ वाले हनुमान जी की क्यों लगा रखी है? यह बनना शुरू 1994 में हुआ था, तब भी देश में ‘सेक्युलर’ कॉन्ग्रेस की सरकार थी, और 2007 में जब यह बनकर ख़त्म हुई तो देश में सोनिया माता और दिल्ली में शीला दीक्षित थीं- क्यों नहीं रोक लिया?

और अगर उस ‘सेक्युलर’ समय की मूर्तियों से भी समुदाय विशेष ‘नर्वस’ हो रहे हैं तो फिर तो क्या हमें मान लेना ही चाहिए कि उनकी बेचैनी अपनी सुरक्षा को लेकर नहीं, हिन्दू प्रतीक चिह्नों (और लेखिका के हिसाब से उन चिह्नों द्वारा इंगित हिन्दू मूल्यों) से घृणा को लेकर है? और अगर ऐसा है तो हम क्या करें? और क्यों करें?

20% बनाम 80%

लेखिका आगे याद दिलातीं हैं कि भारत की 20% आबादी गैर-हिन्दू है। अव्यक्त रूप से इसका मतलब यह है कि 20% समुदाय विशेष को खुश रखने के लिए सार्वजनिक जीवन से हिन्दू मूल्यों की अभिव्यक्ति समाप्त कर देनी चाहिए।

20% आबादी की असहिष्णुता के लिए 80% लोग अपने जीवन मूल्यों की अभिव्यक्ति बंद कर दें? और वो भी इसलिए नहीं कि उनके भय का कोई तर्कसंगत कारण है, बल्कि केवल इसलिए कि उन्हें दूसरे के मज़हब की अभिव्यक्ति नहीं बर्दाश्त!

और वह भी तब जब 20% को पहले से ही वह सभी वीवीआइपी अधिकार हैं जो 80% लोगों को नहीं है। केवल संवैधानिक और वैधानिक बात करूँ तो समुदाय विशेष को संविधान के अनुच्छेदों 25 से लेकर 30 तक का संरक्षण प्राप्त है, जो केवल और केवल अल्पसंख्यकों के लिए ही है, बहुसंख्यकों के लिए नहीं। और इसी आधार पर सबरीमाला की परंपरा भंग की गई, मंदिर को अपवित्र किया गया। अय्यप्पा के भक्तों की हर गिड़गिड़ाहट को हर दरवाजे पर यही कह कर दुत्कार दिया गया कि परम्पराओं और धार्मिक संस्थानों का संवैधानिक संरक्षण अल्पसंख्यकों को ही देता है संविधान, बहुसंख्यकों को नहीं।

RTE (शिक्षा का अधिकार) के अंतर्गत एक-चौथाई सीटों का लाभ भी केवल हिन्दुओं द्वारा चल रहे शिक्षण संस्थानों पर ही लागू है- मदरसों से लेकर ईसाईयों के कॉन्वेंट स्कूल तक इससे छूट पाते हैं, और जमकर अपने मूल्य बच्चों के बचपन और किशोरावस्था में घोलते हैं। हिन्दू अगर कोई स्कूल चलाए तो कानूनन उसे आर्थिक बोझ का सामना करना पड़ता है जबकि अल्पसंख्यक स्कूल इससे बच जाते हैं।

इसके बाद भी अगर समुदाय विशेष वाले दो-तीन मूर्तियों से बेचैन हो रहें तो हिन्दू क्या करें? और क्यों करें?

ईशा के आदियोगी शिव को जबरदस्ती घसीटा

इस लेख में निजी संस्था ईशा फाउंडेशन द्वारा स्थापित 112 फीट की आदियोगी शिव प्रतिमा का उसी साँस में जिक्र किया गया है, जिसमें सरकारी खर्चे पर बन रही शिवाजी महाराज, सरदार पटेल आदि की प्रतिमाओं की बात हो रही है। ऐसा जानबूझकर इसलिए किया लेखिका ने ताकि बिना खुलकर झूठ बोले लोगों के मन में यह भ्रम फैलाया जा सके कि आदियोगी की प्रतिमा भी सरकारी संसाधनों से बनी है। जबकि सच्चाई यह है कि यह प्रतिमा एक निजी संस्थान ने अपने पैसे और अपनी जमीन पर तैयार की है।

और इसको घसीटने की कोशिश से लेखिका के पूरे लेख की मंशा साफ़ हो जाती है- कि समुदाय विशेष तब तक ‘बेचैन’ रहेंगे जब तक धर्म और संस्कृति, हिन्दू पंथ और सम्प्रदाय की हर अभिव्यक्ति बंद नहीं हो जाती। केवल सरकारी ही नहीं, निजी भी। यही हिन्दूफोबिया है

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