Wednesday, September 30, 2020
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क्या रोजगार-शिक्षा में नैतिकता और मूल्य पिछले जमाने की बात हो चुकी हैं?

जो विद्यार्थी गलत तरीके से पैसे देकर शिक्षक की नौकरी पा भी लें तो वे क्या पढ़ाएँगे और क्या नीति की बातें सिखाएँगे? बात सिर्फ शिक्षकों की नहीं है। धाँधली करके प्राप्त की गई किसी भी नौकरी के किसी भी पर पहुँचा अधिकारी क्या उस पद के साथ ईमानदार रह पाएगा? क्या वह आगे भी रिश्वतखोरी नहीं करेगा?

किसी देश को अगर अपंग बनाना हो तो उसकी शिक्षा प्रणाली को खोखला कर दो। भारत में तो पहले ही सौ प्रतिशत शिक्षा का आंकड़ा नहीं है, तिस पर आए दिन आती धाँधली की ख़बरें यही सोचने पर मजबूर करती हैं कि यह देश कैसी बुनियाद पर खड़ा है? ईमानदारी की बातें करता कौन सा ऐसा व्यक्ति है जो पूर्णतः ईमानदार है? शिक्षक, डॉक्टर, इंजीनियरिंग, कलेक्टर कौन रिश्वत देकर बना है या मेहनत से? कैसे पता लगाएँगे? किस पैमाने से जाँचेंगे?

करीब आठ साल पहले मैं बतौर शिक्षक, शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा बनना चाहती थी। इसी उद्देश्य के साथ पुणे से भोपाल आई थी। हाथ में थी बनस्थली यूनिवर्सिटी से एम.टेक की डिग्री और सीडेक से आर्टिफीसियल इंटेलीजेंस में एक वर्ष का अनुभव।

वरन नौकरी पाने के लिए यह काफी नहीं, इस बात का एहसास भोपाल पहुँचकर हुआ। भोपाल, जहाँ सौ से ज़्यादा इंजीनियरिंग कॉलेज हैं, जिनमें सैकड़ों में शिक्षक हैं; वहाँ नौकरी मिलना आपकी डिग्री, आपके कार्य अनुभव या आपके ज्ञान से ज़्यादा जुगाड़ और पहचान पर निर्भर था। कुछेक कॉलेजों में अप्लाई करने के बाद जब यह एहसास हुआ तो मन डूबने लगा। कोशिश करती रही और एक दिन एक कॉलेज में भर्ती हुई। उसके बाद प्रिंसिपल से हर दूसरे दिन होने वाली उसूलों की लड़ाई ने सात माह बाद ही कॉलेज छोड़ने पर मजबूर कर दिया। वे चाहते थे मैं रटंत विद्या को आधार बनाऊँ, जबकि मेरा पढ़ाने का तरीका समझ पर आधारित था। यह अलग बात है कि जब रिजल्ट आया तो उन्हें अपना उत्तर मिल गया लेकिन, मैं हर दिन की लड़ाई से थक चुकी थी और नौकरी छोड़ दी।

शिक्षा स्तर पर यह धाँधली सिर्फ जुगाड़ और पहचान तक नहीं सिमटी थी। यह आँखों देखी बात है कि इंजीनियरिंग कॉलेजों में पढ़ाने वाले कई शिक्षक इस लायक ही नहीं थे। शिवानी (कुंजी) आधारित उनका ज्ञान जाने बच्चों को क्या सिखाता होगा? इसी बीच एक और धाँधली के बारे में पता लगा, एम.टेक की थीसिस पैसे देकर लिखवाने की धाँधली। पूरा व्यापार था। बीई करके नीम-हकीम ज्ञान वाले बच्चे शिक्षक बन रहे थे और साथ में एमटेक कर रहे थे। अपनी थीसिस पैसे देकर लिखवा रहे थे और उस थीसिस के आधार पर नौकरी को पक्का करवा रहे थे। पढ़ाई और परीक्षाओं में जुगाड़ से पास हो रहे थे। यह देखना मेरे लिए शिक्षा व्यवस्था में बिखरे उस ज़हर को छू लेने जैसा था जिससे मैं पूर्णतः अनभिज्ञ थी।

शिक्षक के अलावा छात्र स्तर पर भी गजब धाँधली थी। इंजीनियरिंग कॉलेजों में 60 विद्यार्थियों वाली कक्षाओं में पैसे लेकर 120 तक छात्र ठूँसे जा रहे थे। शिक्षकों को भी भर्ती के इस काम में लगाया जाता था और जो जितने बच्चे लाता था, उसे उतना मुनाफा मिलता था। मुख्य ब्रांच भी पैसों के दम पर बाँटी जा रही थीं। यह ऐसी धाँधली थी, जिसमें सरकार से ज़्यादा वे लोग दोषी हैं जो इस गधा दौड़ में अपने बच्चे की काबिलियत और विषयिक रुझान दरकिनार करके बढ़िया से बढ़िया कॉलेज से उसके माथे पर इंजीनियरिंग का ठप्पा देखना चाहते हैं।

यह परतों में दबा-छुपा ऐसा घोटाला है जिसे कोई ‘बड़ी-बात’ नहीं मानता। न करने वाले, न करवाने वाले और न ही शिकार होने वाले। मध्यप्रदेश में हुए व्यापम घोटाले के सामने इसे कौन बड़ा मानेगा। जिस देश के अधिकन श व्यक्ति छोटे-बड़े रूप में बेईमान हों, वहाँ छोटे-मोटे घोटाले बात करने लायक नहीं माने जाते।

मध्य प्रदेश व्यापम घोटाले में 2000 से अधिक लोग गिरफ्तार हुए थे। लगभग 40 मौतें हुई थीं। कितने ही बच्चों का भविष्य दाव पर लगा। वे बच्चे, जिन्होंने दिन-रात मेहनत की होगी, जिनके माता-पिता ने पैसे जोड़-जोड़कर कोचिंग की फीस भरी होगी, उन बच्चों के स्थान पर सीट उसको मिलती है जो अपने ज्ञान से नहीं वरन पैसों के दम पर दाखिला पाता है। इस घोटाले में नेताओं, उच्च अधिकारियों से लेकर व्यवसायी भी शामिल थे।

माँ बचपन में सिखाती थीं कि ज्ञान प्राप्त करो, स्वयं को शिक्षित करो क्योंकि शिक्षा ही ऐसा हथियार है जो तुमसे कोई नहीं छीन सकता। लेकिन, वर्तमान में माँ की यह बात थोड़ी ‘अ-प्रैक्टिकल’ लगती है। जिस ज्ञान के आधार पर कोई छात्र अपने लिए उच्च शिक्षा के सपने देखता हो उसका वह अधिकार तो कोई भारी-जेब वाला मार जाता है।

पिछले दिनों संज्ञान में आए उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के घोटाले ने एक बार फिर यही सोचने पर मजबूर किया कि नौकरी और बेरोजगारी की मारा-मारी में परीक्षा देने वाला, परीक्षा लेने वाला और परीक्षा करवाने वाला तीनों ही अपने-अपने स्तर पर मौके का फायदा उठाने से नहीं चूक रहे। इन घोटालों में सिर्फ नेता या अधिकारी दोषी नहीं हैं बल्कि वे लोग भी उतने ही दोषी हैं जो चोरी हुए पेपर्स का इस्तेमाल करते हैं, अपनी जगह दूसरे लोगों को परीक्षा देने भेजते हैं या किसी होनहार की सीट मारकर उसकी जगह पैसों से सीट पाते हैं। ये वही लोग हैं जो अपना मामला फिट होते ही ईमानदारी की बातें करते या बेईमानी की शिकायत करते अगले ही चौराहे पर हमसे टकरा जाएँगे।

मुझे बीते साल का एक मामला याद आता है। एक महोदय जिन्होंने जाने कैसे माध्यमिक विद्यालय में सरकारी शिक्षक की नौकरी प्राप्त कर ली। उनका मुख्य व्यवसाय एक फर्नीचर की दुकान है और साइड व्यवसाय शिक्षक की वह नौकरी जो उन्हें जुगाड़ से मिली। मैंने उन्हें कभी विद्यालय पढ़ाने जाते नहीं देखा। वे प्रिंसिपल के पद पर हैं और यदा-कदा जब दुकान का सीजन न हो, बाजार मंदा हो तो विद्यालय तक टहल आते हैं। अब सोचिए कि उस गाँव के सरकारी विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चों का भविष्य कैसा होगा?

उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग वाले घोटाले में दोषी सिर्फ अंजू लता कटियार नहीं हैं, जिन्होंने ₹2 करोड़ में विद्यार्थियों का भविष्य बेच दिया, बल्कि वे विद्यार्थी भी हैं जिन्होंने नौकरी पाने के लिए गलत रास्ता अपनाया। जो विद्यार्थी गलत तरीके से पैसे देकर शिक्षक की नौकरी पा भी लें तो वे क्या पढ़ाएँगे और क्या नीति की बातें सिखाएँगे? बात सिर्फ शिक्षकों की नहीं है। धाँधली करके प्राप्त की गई किसी भी नौकरी के किसी भी पर पहुँचा अधिकारी क्या उस पद के साथ ईमानदार रह पाएगा? क्या वह आगे भी रिश्वतखोरी नहीं करेगा?

कल एक और ख़बर इसी तरह की धाँधली की पढ़ी। जिसके मुताबिक़ तेलंगाना स्टेट बोर्ड ऑफ इंटरमीडिएट एजुकेशन द्वारा होने वाले इंटरमीडिएट के सप्लीमेंट्री पेपर्स उस पुलिस स्टेशन से ही गायब हो गए जहाँ वे सुरक्षा हेतु रखे गए थे।

यह ख़बर पढ़कर पहली बार तो हँसी आई। जो पुलिस स्टेशन में ही सुरक्षित नहीं वह कहाँ सुरक्षित होगा। फिर लगा कि पास होने की होड़ और अगली कक्षा में पहुँचने की बेकरारी को किसी व्यवसायी ने भाँप लिया और अपना शिकार ढूँढ लिया।

मेरी नज़र में इस तरह के घोटाले नेताओं, सुरक्षा अधिकारियों, शिक्षा से जुड़े उच्च अधिकारियों को तो दोषी ठहराती ही है, साथ-साथ उन माता-पिता को भी दोषी ठहराती है जो कुनीति के रास्ते सफलता हासिल करने का मंत्र अपने बच्चों के कानों में फूँकते हैं।

इस तरह के घोटाले देश और सरकार के साथ दग़ाबाज़ी तो हैं ही साथ ही उन चंद ईमानदार विद्यार्थियों के साथ भी अन्याय है जो इस बेईमानी की दुनिया में आज भी ईमानदारी, मेहनत और ज्ञान के बूते पर कहीं पहुँचने की चाहत रखते हैं। उन गरीब माता-पिता के साथ भी अन्याय है जो एक-एक पैसा जोड़कर अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए, कुछ बनाने के लिए संस्थानों में दाखिला दिलवाते हैं। और उस मानसिकता और विचार के प्रति भी अन्याय है जो यह मानती है कि शिक्षा ही किसी देश को आगे बढ़ा सकती है। खोखली शिक्षा, धांधली से पाई गई सीटें और रिश्वत से पाई गई नौकरी क्या सच में देश को आगे बढ़ाएगी?

मेरी भारत सरकार से विशेष गुज़ारिश है कि इस तरह के घोटालों के विरुद्ध विशेष नीतियाँ और जाँच बैठाएँ। कड़े कानून और सज़ा मुकर्रर करें, ताकि देश मजबूत बुनियाद पर खड़ा हो, न कि खोखली-चरमराती शिक्षा प्रणाली पर आधारित।

यह लेखिका के निजी अनुभव और विचार हैं।

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अंकिता जैनhttp://www.ankitajain.in
बनस्थली विद्यापीठ से एम्.टेक कंप्यूटर साइंस. स्पेशलाइजेशन आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस। विप्रो गुडगाँव में एप्लीकेशन डेवलपर, सीडेक-पुणे में रिसर्च एसोसिएट एवं बंसल इंस्टिट्यूट ऑफ़ रिसर्च एंड टेक्नोलॉजी भोपाल में बतौर असिस्टंट प्रोफेसर काम कर चुकी हैं। 2012 में रिलीज़ हुए भारत के सबसे बड़े फ़्लैश मोब गीत “आय लव यू मुंबई… मुंबई 143” के बोल लिखे. इस गीत को लिम्का बुक ऑफ़ नेशनल रिकॉर्ड में भी स्थान मिला। रेडियो-ऍफ़एम् के दो प्रसिद्ध शो “यादों का इडियट बॉक्स विथ नीलेश मिश्रा” एवं “यूपी की कहानियाँ” में दो दर्जन कहानियाँ लिखीं। मध्यप्रदेश बायो-डाइवर्सिटी बोर्ड द्वारा बनायी “धान” पर आधारित डाक्यूमेंट्री की स्क्रिप्ट राइटर। अहा ज़िन्दगी, प्रभात खबर 'सुरभि', लल्लनटॉप, प्रजातंत्र, जानकीपुल, कविताकोश आदि में लेख, कविताएँ, कहानियाँ प्रकाशित। अब तक दो किताबें “ऐसी-वैसी औरत” हिन्द युग्म प्रकाशन, दिल्ली एवं "मैं से माँ तक" राजपाल एंड सन्स, दिल्ली द्वारा प्रकाशित।

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