Sunday, December 5, 2021
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ईशनिंदा कानून की माँग, यूनिफॉर्म सिविल कोड का विरोध: भारत में हिंदू बना रहे सेकुलर, मुस्लिमों को चाहिए शरिया

समस्या यह है कि भारत जैसे लोकतान्त्रिक और धर्मनिरपेक्ष देश में मुस्लिम समाज औरों से धर्म निरपेक्षता की उम्मीद करता है पर खुद धर्मनिरपेक्ष होने के लिए तैयार नहीं है।

शुक्रवार 22 नवंबर के दिन इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अंतर्धार्मिक विवाह सम्बंधित जनहित याचिकाओं की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार से कहा है कि वो समान नागरिक संहिता (यूनिफॉर्म सिविल कोड) लागू करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सुझाए गए दिशा निर्देशों पर विचार करते हुए पूरे देश में समान नागरिक संहिता लागू करे। न्यायालय के इस सुझाव के बाद एक बार फिर समान नागरिक संहिता विमर्श का विषय बन गया है। इसी वर्ष जुलाई में दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी केंद्र सरकार से इस दिशा में कदम उठाने का सुझाव दिया था। इससे पहले वर्ष 2019 में सर्वोच्च न्यायालय की एक पीठ ने समान नागरिक संहिता न लाने के लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराया था।

पिछले कई वर्षों से समान नागरिक संहिता राजनीतिक और सामाजिक विमर्श के केंद्र में रहा है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के इस अवलोकन के साथ ही इधर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के एक सम्मेलन की समाप्ति पर आये प्रस्ताव ने न केवल समान नागरिक संहिता की आवश्यकता को नकार दिया बल्कि देश में ईशनिंदा के विरुद्ध कानून की भी माँग की है। मजे की बात यह है कि बोर्ड ईशनिंदा के विरुद्ध कानून की माँग करते हुए केवल उन लोगों के लिए दंड विधान की बात की जो मुसलमानों के नबी मोहम्मद के खिलाफ अनादर दिखाते हैं। बोर्ड की माँग है कि आए दिन सोशल मीडिया पर मोहम्मद साहब के खिलाफ लिखी जाने वाली बातें और पोस्ट को ईशनिंदा माना जाए और ऐसा करने वालों के खिलाफ ईशनिंदा के तहत कानूनी कार्रवाई हो।

क्या है ईशनिंदा के विरुद्ध कानून

दुनियाँ के विभिन्न देशों के ईशनिंदा के विरुद्ध कानून लागू हैं ताकि ईशनिंदा करने वालों के विरुद्ध इन कानूनों के तहत कार्रवाई हो। ईशनिंदा के विरुद्ध ये कानून मुस्लिम बहुल देशों के साथ-साथ ईसाई बहुल देशों में भी लागू हैं। यह अलग बात है कि दोनों तरह के देशों में इन कानून के लचीलेपन की सीमाओं में बहुत अंतर है। जहाँ ईसाई बहुत देशों में ईशनिंदा, ईश का अनादर और उसकी आलोचना को लेकर कानूनी दिशा निर्देश काफी हद तक विस्तृत और साफ़ हैं, मुस्लिम बहुल देशों में ऐसा नहीं है। जहाँ ईसाई बहुल देशों में ईशनिंदा के विरुद्ध लागू कानून में ईशनिंदा की सजा अर्थदंड से लेकर कारावास है, कई मुस्लिम देशों जैसे ईरान, नाइजीरिया, पकिस्तान, सोमालिया और सऊदी अरब में ईशनिंदा की सजा मृत्युदंड है।

यही कारण है कि मुस्लिम बहुल देशों में इन कानूनों का अधिकतर अल्पसंख्यकों के विरुद्ध इस्तेमाल किया जाता रहा है। पाकिस्तान के अलावा अरब देशों, मुस्लिम बाहुल्य उत्तरी अफ्रीकी देशो में भी ईशनिंदा के विरुद्ध बने कानूनों का दुरुपयोग वहाँ रहने वाले अल्पसंख्यकों के विरुद्ध होते हुए देखा गया है। हाल के वर्षों में पाकिस्तान जैसे देश में ईशनिंदा के विरुद्ध लागू कानून के सहारे न केवल अल्पसंख्यकों को बल्कि बहुसंख्यक समाज के लोगों के खिलाफ भी तरह-तरह की कार्रवाई की गई है। अधिकतर मुस्लिम देशों में ईशनिंदा के विरुद्ध कार्रवाई न केवल व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता के विरुद्ध है बल्कि ऐसी कानूनी प्रक्रियाएँ आधुनिक वैश्विक और लोकतान्त्रिक परिवेश के भी विरुद्ध दिखाई देती हैं।

समान नागरिक संहिता की आवश्यकता क्यों है?

हमारे संविधान निर्माताओं ने संविधान को अंतिम रूप देते हुए यह आशा व्यक्त की थी कि भविष्य में अलग-अलग धर्मों के लिए विवाह, तलाक़ और अन्य सम्बंधित कानूनी प्रक्रिया के लिए समान नागरिक संहिता को लागू किया जाएगा। इसी बात को आगे रखते हुए न केवल सर्वोच्च न्यायलय ने बल्कि अन्य उच्च न्यायालयों ने बार-बार सरकार से समान नागरिक संहिता बनाने का सुझाव दिया। 2019 के अपने फैसले में सर्वोच्च न्यायलय ने कहा कि; हमारे संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 44 के तहत नीति निर्देश दिया था कि उचित समय आने पर सरकार पूरे देश के नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता बनाने और उसे लागू करने की अपनी जिम्मेदारी का पालन करेगी पर यह आज तक नहीं हो सका।

अपने फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने आगे कहा था कि; हिंदू एक्ट 1956 में लागू होने के बाद आज तक नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता की दिशा में सरकार द्वारा कदम नहीं उठाया जा सका और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा शाह बानो मामले में परामर्श के बावजूद सरकार ने इस दिशा में कोई प्रयास नहीं किया। यह बात अलग है कि सर्वोच्च न्यायालय के इस अवलोकन से पहले वर्ष 2018 में लॉ कमीशन ने अपने कंसल्टेशन पेपर में कहा था कि; देश को फिलहाल समान नागरिक संहिता की न तो आवश्यकता है और न ही यह देश के लिए सही रहेगा।

समान नागरिक संहिता की आवश्यकता देश में न केवल लंबे समय से महसूस की जाती रही है बल्कि यह समय-समय पर सामाजिक और राजनीतिक विमर्श का हिस्सा भी रही है। दूसरी ओर मुस्लिम समाज की ओर से इसका लगातार विरोध होता रहा है। जिस समय इलाहाबाद सर्वोच्च न्यायालय की ओर से केंद्र सरकार को सलाह आई ठीक उसी समय आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने न केवल इसका फिर से विरोध किया बल्कि ऐसी संहिता की माँग को दरकिनार करते हुए ईशनिंदा के विरुद्ध कानून बनाने के लिए भी आवाज़ उठा दी। मुस्लिम समाज का यह दृष्टिकोण आश्चर्यचकित नहीं करता। मुस्लिम समाज ने इसी तरह तीन तलाक कानून का भी खुलकर विरोध किया था और उसके विरुद्ध बाकायदा प्रोपेगेंडा भी चलाया था।

समान नागरिक संहिता की आवश्यकता के पक्ष में अभी तक जो भी तर्क आते रहे हैं वह मुख्यतः मुस्लिम समाज में पालन होने वाले विवाह और तलाक़ सम्बन्धी रहे हैं। समस्या यह है कि भारत जैसे लोकतान्त्रिक और धर्मनिरपेक्ष देश में मुस्लिम समाज औरों से धर्म निरपेक्षता की उम्मीद करता है पर खुद धर्मनिरपेक्ष होने के लिए तैयार नहीं है। यही कारण है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की ओर से पारित किए गए जिस प्रस्ताव में ईशनिंदा के विरुद्ध कानून बनाने की माँग की गई है। उसमें केवल मुस्लिम समाज के ईशों की निंदा की बात की गई है। इस माँग में अन्य धर्मों के धार्मिक व्यक्तित्वों के लिए की जाने वाली निंदा की चर्चा नहीं की गई।

यह बात एक लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष देश में रहने वाले एक इतने बड़े समाज के दृष्टिकोण के बारे में बहुत कुछ बताती है।

समय-समय पर यह प्रश्न पूछा जाता रहा है कि समान नागरिक संहिता के विरुद्ध खड़ा समाज क्या खुद के लिए क्रिमिनल लॉ भी मुस्लिम लॉ के अनुसार स्वीकार करेगा? इस प्रश्न को यह समाज बड़े आराम दरकिनार का देता है। वर्तमान केंद्र सरकार से न केवल उसके समर्थक बल्कि एक वृहद भारतीय समाज लंबे समय से समान नागरिक संहिता लाने की आशा रखता है। पिछले कई वर्षों से संसद के लगभग हर सत्र से पहले इस बात की चर्चा होती रही है। संसद के शीतकालीन सत्र से पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा एक बार फिर से सरकार से जो बात कही गई है उसका कितना असर होता है, यह देखना दिलचस्प होगा।

 

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