घर के इन दीमकों का क्या करें? ‘हा-हा’ रिएक्शन देने वालों का भी मज़हब नहीं होता?

ये कोई एक्सिंडेंटल बात नहीं है कि वो 'एंग्री' रिएक्शन दे रहे थे, और 'हा-हा' चला गया। जितनी संख्या में दिया जा रहा, उस पर कोई सर्वेक्षण किया जाए तो पता चल जाएगा कि एक ठीक-ठाक प्रतिशत इतनी संवेदनहीनता दिखाने के साथ ही, आतंकियों के साथ खड़ा हो जाता है।

संवेदना मनुष्यों में एक बुनियादी भाव के रूप में बचपन से उपस्थित होती है। ध्यान रहे, मैं मनुष्यों की बात कर रहा हूँ, जिनमें मैं इन आतंकियों और उनकी हिमायत करने वालों को नहीं गिनता। जिनमें संवेदना नहीं होती, वो कई बार चुप रह जाते हैं क्योंकि कोई ख़बर उन्हें उस स्तर पर विचलित नहीं करती। ख़बरों का, ऐसी घटनाओं का, मानवीय क्षति का, हमारी निकटता से बहुत बड़ा संबंध होता है। यानी, आप घटना से प्रभावित लोगों से खुद को किस स्तर पर जोड़ कर देखते हैं। 

पुलवामा में 40 से ज़्यादा जवानों के जीवन का अंत हो गया, उनके प्राणों की बलि देश के नाम चढ़ गई। ये भारतीय इतिहास के सबसे बड़े आतंकी हमलों में से एक है। ज़ाहिर है कि ऐसे मौक़ों पर पूरा देश एक साथ खड़ा हो जाता है। माफ़ कीजिएगा, पूरा देश खड़ा नहीं होता क्योंकि कुछ लोगों की भावनाएँ हिंसा और आतंक के साथ महज़ इसलिए जुड़ जाती हैं क्योंकि बम फेंकने वालों के नाम इस्लामी हैं, और उनके भी। इतना काफी होता है खुद को एक आतंकी विचारधारा से जोड़ देने के लिए। 

आपने तस्वीर देख ही ली। तस्वीर लगे कि फोटोशॉप है तो पुलवामा पर लिखे गए लेखों, या किसी भी न्यूज़ वेबसाइट के फेसबुक पेज पर जाकर इससे संबंधित ख़बरों में ‘हा-हा’ रिएक्शन देने वालों के नाम देख लीजिए, आपको पता चल जाएगा कि मैं क्या कहना चाह रहा हूँ। 

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मीडिया में ऐसे लोगों को ‘समुदाय विशेष’ कहा जाता है, जबकि इनकी विशेषता के नाम पर आतंकियों और हिंसक गतिविधियों में लिप्त लोगों के साथ खड़े होने के अलावा और कुछ नहीं दिखता। ये कुछ मुसलमान हैं इस देश के। भले ही, कल को लोग यह भी कहने लगें कि ‘हा-हा’ रिएक्शन देने वालों का कोई मज़हब नहीं होता, वो बात और है। 

मैं बस तथ्यों की बात कर रहा हूँ। ये कोई एक्सिंडेंटल बात नहीं है कि वो ‘एंग्री’ रिएक्शन दे रहे थे, और ‘हा-हा’ चला गया। जितनी संख्या में दिया जा रहा, उस पर कोई सर्वेक्षण किया जाए तो पता चल जाएगा कि एक ठीक-ठाक प्रतिशत इतनी संवेदनहीनता दिखाने के साथ ही, आतंकियों के साथ खड़ा हो जाता है। क्या इसे देखकर यह मानने में आसानी नहीं होती कि इन्हीं नाम के कई लोग ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ का नारा लगा सकते हैं?

यह तो एक बात है, दूसरी बात इससे भी थोड़ा बढ़कर है, कई मुसलमान नाम वाले लोग हैशटैग चला रहे हैं ‘हाउ इज़ द जैश’ जो कि ‘उरी’ फ़िल्म के बाद लोकप्रिय हुए संवाद ‘हाउ इज़ द जोश’ पर एक तंज है। ऐसे लोग बहुत हैं, और ट्विटर पर एक हैशटैग सर्च से पता चल जाएगा कि इन आतंकियों के पक्ष में लिखकर हँसने वाले लोग इसी देश के हैं, और मुसलमान नाम वाले ही हैं। मैं फैक्ट चेक करने वालों से आग्रह करूँगा कि पता करें ये लोग कौन हैं। 

कुछ नाम जिसमें मज़हब दिखता है, और घृणा भी

इन सब को देखने के बाद एक आम आदमी अगर ऐसे लोगों से घृणा करने लगता है, तो उसमें क्या गलत है? ऐसे लोग इस देश में ही नहीं, किसी भी सभ्य समाज में रहने लायक नहीं हैं जो इस तरह की दुर्भावना के साथ जीते हैं। ऐसे मुसलमान ISIS को भी समर्थन देते हैं, पाकिस्तान को भी और आतंकियों को भी। यह समझने में आपको हर ऐसे मौक़े पर मदद मिल जाएगी। 

मुझे घिन आती है ऐसे लोगों से। हर किसी राष्ट्रवादी व्यक्ति को ऐसे कीड़ों से घिन आती है जो खाते इस देश का हैं, और गाते पाकिस्तान का हैं। ये गंदी नाले में रेंगने वाले नमकहरामों के झुंड हैं जो उन्हीं लोगों की लाश पर हँस लेते हैं जो उन्हें लगातार ज़िंदा रखे हुए हैं। ऐसे लोगों को पहचान कर इनसे पूछा जाए कि इस अश्लील हँसी का क्या मतलब है? या यह कह कर कन्नी काट लें कि ये तो कहीं के भी मुसलमान हो सकते हैं? लेकिन, क्या सच में ये ‘कहीं के’ मुसलमान हैं, या ‘यहीं के’ मुसलमान हैं जो AMU जैसी संस्थाओं में अपने विचारों की डफली आए दिन बजाते रहते हैं?

और हाँ, ये तर्क तो कोई न ही दे कि ये लोग ‘सच्चे मुसलमान’ नहीं हैं। तो सच्चा मुसलमान जो भी है वो ऐसे लोगों को लेकर चुप कैसे रह जाता है? क्या इन सच्चे मुसलमानों ने कभी ऐसी घटनाओं पर हँसने वाले मुसलमानों की निंदा की है? सोशल मीडिया में तो जिस अनुपात में ऐसे घटिया मुसलमान हैं, उस अनुपात के बहुत ही छोटे अंश में भी इनके प्रति कोई निंदा जैसी बातें देखने को नहीं मिलती। तो फिर ये अच्छे मुसलमान हैं कहाँ? आखिर अच्छे मुसलमान या ऐसी अच्छे मुसलमानों से चलने वाली, ऐसे अच्छे मुसलमानों को चिह्नित करने वाली संस्थाएँ कहाँ हैं?

दुःख की बात यही है कि भारत में ऐसे लोगों को भी ज़िंदा रहने की, अपनी घृणित और कुत्सित सोच पालने की, यहाँ के संविधान के संरक्षण में पनपने की आज़ादी है। जबकि ये वो दीमक हैं जो देश और समाज को लगातार खोखला कर रहे हैं। सेना और हमारे सुरक्षा बलों के जवान बाहरी ख़तरों से तो निपट लेंगे लेकिन ये ‘हा-हा’ करने वाले मुसलमान नाम वालों से कौन निपटेगा? इन्हें क्यों बर्दाश्त किया जा रहा है इस देश के ‘अच्छे मुसलमानों’ द्वारा? 

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