Saturday, July 31, 2021
Homeबड़ी ख़बरजब अदरक-लहसुन तहज़ीब का भार हिन्दुओं की रीढ़ तोड़ता है, तब मध्यस्थता होती है

जब अदरक-लहसुन तहज़ीब का भार हिन्दुओं की रीढ़ तोड़ता है, तब मध्यस्थता होती है

हिन्दुओं ने अपनी मंदिरों के दीवारों में मस्जिदें देखी हैं, और रोज देखते हैं। हिन्दुओं ने मस्जिदों की सीढ़ियों में मंदिर के अवशेष देखे हैं। हिन्दुओं ने काशी विश्वनाथ को मस्जिद से ढकने की कोशिशें देखी हैं। हिन्दुओं ने राम के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न को स्वीकारा है। हिन्दुओं ने इस केस को जानबूझकर टालने की हर कोशिश होती देखी है।

अस्सी प्रतिशत जनसंख्या, केन्द्र में ‘हिन्दुत्व प्रोपेगेंडा’ के नाम पर हर रोज गाली सुनती मोदी की सरकार, राज्य में प्रखर हिन्दुत्व के पोस्टर ब्वॉय जो स्वयं महंत हैं, और हिन्दुओं के हाथ में क्या आता है? लहसुन। जी, हिन्दुओं के हाथ लहसुन ही आता रहा है क्योंकि हम अपने वेदों, उपनिषदों, पुराणों और शास्त्रों के एक ही हिस्से के दर्शन से ‘सर्वसमावेशी’ और ‘प्लूरलिस्टिक’ बनने के चक्कर में अपनी अस्तित्व से समझौता किए जा रहे हैं, किए जा रहे हैं, किए जा रहे हैं…

दशकों से केस खिंच रहा है, कोर्ट पर कोर्ट, तारीख़ पर तारीख़, जज पर जज और वकील पर वकील, और इस देश का उच्च न्यायालय कहता है कि बेटा तीन हिस्से में रोटी तोड़कर खा लो। फिर अपील होती है, तो सालों बाद सुप्रीम कोर्ट कहने लगता है बैठकर बात कर लो। आखिर न्यायालयों का औचित्य क्या है? फिर तो राम जन्मभूमि का मसला खाप पंचायत को दे देते?

जब साक्ष्य हैं, खुदाई हो चुकी है, जानकार लोगों ने किताबें और शोधग्रंथ लिखकर रख दिए हैं, तब न्याय के सबसे बड़े दरवाज़े की घंटी इतनी ऊँची क्यों कर दी गई है कि आम आदमी की उँगलियाँ पहुँच न सके? आखिर, क्या वजह है कि लगातार मुद्दे को टालते रहने के बाद सुप्रीम कोर्ट को अतंरराष्ट्रीय स्तर के ‘बिचौलियों’ को इसमें लाना पड़ रहा है?

तुमने राम के अस्तित्व को नकारा, हिन्दुओं ने सुन लिया; तुमने मंदिर के न होने की बात की, खुदाई में मंदिर निकल आए; तुमने इतिहास को नकारना चाहा, लेकिन तथ्य यही हैं कि हिन्दुओं के हजारों बड़े और लाखों छोटे मंदिर तोड़े गए। आखिर सहिष्णुता की चादर हिन्दुओं के ही घर तक क्यों?

इस कोर्ट ने इस न्यायिक प्रक्रिया का इतना मजाक बनाया कि संवैधानिक पीठ में पाँच धर्म के जज रख दिए थे! क्यों? ट्रिपल तलाक के मसले पर सुनवाई होनी थी। इससे आखिर सुप्रीम कोर्ट क्या संदेश देना चाह रहा था? या, आज जो रिटायर्ड जस्टिस इब्राहिम खलीफुल्ला को मध्यस्थता कमिटी का चेयरमेन बनाने की बात हुई है, उससे सुप्रीम कोर्ट क्या संदेश देना चाह रही है?

और ये मध्यस्थता कैसे होगी? बंद कमरे में। बंद कमरे में मध्यस्थता नही होती, डील होती है। अगर ये सवाल करोड़ों लोगों की भावनाओं का है, तो फिर खुली जगह पर इन बिचौलियों के तर्कों का प्रसारण होना चाहिए ताकि हर पक्ष के लोग जाने सकें कि क्या बातें हो रही हैं। न्यायिक व्यवस्था भारतीय नागरिक का अंतिम पड़ाव है, जहाँ अभी भी लोग विश्वास जताते हैं। सुप्रीम कोर्ट जब इस तरह की बातें करता है तो  वो सिर्फ अपना ही उपहास नहीं करता, बल्कि व्यवस्था पर लोगों को सवाल उठाने का मौका देता है क्योंकि ऐसी बातें तर्क से परे होती हैं। 

इसे महज़ संयोग माना जाए कि सुप्रीम कोर्ट ने लॉटरी सिस्टम से ऐसा किया है, या फिर ये जानबूझकर लिया गया एक क़दम है कि किसी समुदाय या मतावलंबियों को बताया जाए कि सुप्रीम कोर्ट ने सबका ध्यान रखा है? मुझे किसी इब्राहिम, खेहार, जोसफ़, नरीमन, गोगोई की योग्यता पर शक नहीं है, मुझे अजीब लगता है कि न्याय के जिस मंदिर में साक्ष्य सर्वोपरि होते हैं, वहाँ इस तरह के टोकनिज्म की क्या ज़रूरत है?

मेरी समस्या जस्टिस खलीफुल्ला को लेकर नहीं है, न ही मेरी योग्यता है कि मैं उनकी दक्षता पर सवाल करूँ, लेकिन एक सामान्य विवेक का प्राणी होने के कारण मेरी अभिव्यक्ति यही है कि जब कोर्ट के भीतर अधिकतर पार्टियों ने मध्यस्थता से इनकार कर दिया, तो फिर सुप्रीम कोर्ट इंटरनेशनल दलालों को मैदान में उतारकर क्या संदेश देना चाह रही है?

फिर तो सड़कों से कानून भी बनें क्योंकि हमारी सर्वोच्च न्यायिक संस्था ने बंद बक्सों में पड़े साक्ष्यों को एक तरह से दरकिनार करते हुए, एक बार फिर से करोड़ों लोगों को ठगने की कोशिश की है। आखिर जब कोर्ट यह मानता है कि यह ज़मीन से बढ़कर भावनाओं का मसला है, तो फिर कोर्ट यह भी बताए कि किन-किन मसलों को भावनाओं से जोड़कर देखा जाए, किन मसलों को छोड़ दिया जाए।

कोर्ट चाहे जितना कह ले, लेकिन ये मसला घूम-फिर कर ज़मीन का ही है। ये मसला एक इस्लामी आतंकवादी बाबर द्वारा इस देश पर किए गए अत्याचार के प्रतीक की पुनर्स्थापना का है, जो कि भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा पर एक वैसे घाव की तरह है, जिसका इलाज जल्दी होना चाहिए। पहले तो ऐसे मसलों पर बात ही नहीं होनी चाहिए, और अगर हो भी रही है तो खुदाई में निकले मंदिर और बक्सों में बंद सबूतों को बाहर लाकर, उस पर निर्णय हो, न कि दलाली से, जिसके लिए आपने मीडिएशन और मध्यस्थता जैसे सुनने में अच्छे लगने वाले शब्द बना दिए हैं। 

मसला ज़मीन का ही है, और मसला न्यायालय ही सुलझाए। हिन्दुओं ने अपनी मंदिरों के दीवारों में मस्जिदें देखी हैं, और रोज देखते हैं। हिन्दुओं ने मस्जिदों की सीढ़ियों में मंदिर के अवशेष देखे हैं। हिन्दुओं ने काशी विश्वनाथ को मस्जिद से ढकने की कोशिशें देखी हैं। हिन्दुओं ने राम के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न को स्वीकारा है। हिन्दुओं ने इस केस को जानबूझकर टालने की हर कोशिश होती देखी है।

अगर अब भी मोदी और योगी जैसे ‘हिन्दू हृदय सम्राट’ का तमग़ा लेकर घूमने वाले लोगों ने इस पर संवैधानिक दायरे में रहकर दख़लंदाज़ी नहीं की, तो ये मामला हिन्दुओं को उस कोने में ढकेल देगा जहाँ से उनके पास दो ही विकल्प बचेंगे: मणिकर्णिका घाट या मणिकर्णिका की तलवार।

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अजीत भारती
पूर्व सम्पादक (फ़रवरी 2021 तक), ऑपइंडिया हिन्दी

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