Thursday, August 13, 2020
Home विचार सामाजिक मुद्दे मातृभाषया सह सापत्न्यम् आक्रान्तृभाषाभिः गर्लफ्रेंड् इव व्यवहारः किमर्थम्?

मातृभाषया सह सापत्न्यम् आक्रान्तृभाषाभिः गर्लफ्रेंड् इव व्यवहारः किमर्थम्?

तदुत्तरितुं चलवाणीं पिटपिटायमाना एव आस्म तावता अन्यैः मित्रैरङ्गीकृतम्। अस्माभिर्लिखितमर्धवाक्यं निरस्तव्यम् अभवत्। दौर्भाग्यवशात् अस्माकं पिटपिटायनस्य गतिः अतिमन्दा। पश्चात् अस्माभिः किञ्चित् कालं यावत् जल्पितं ततः अध्ययने संलग्नितम्।

प्रपरश्वस्तनी कथा, अस्माभिर्मित्राण्युक्तानि चलामो कुत्रचित् लम्बामह इति। ते नितरां विकुण्ठिताः। पृच्छामकुर्वन् ननु बुद्धिर्न खलु भ्रष्टा? मित्रैरेव कथितमिति वयमपि हासम् अकुर्म, नो चेत् बुद्धिभ्रष्ट इत्युच्यमानं दन्तभ्रष्टम् अकारयिष्याम। तदस्तु…

ह्यः अपि मित्रैः सह यूथं रचयितुं वाट्सैपे प्रयोजयामासिम। प्रसङ्गेऽस्मिन्नेकेन मित्रेण स्वरांशः प्रेषितः, नाम ऑडियो-क्लिप्। तदस्माभिश्चालितम् इत्युक्ते प्ले कृतं तदा मित्रस्य ध्वनिः श्रुतः “ब्रोज़ लेट्स हैंग आउट टुमॉरो! आई एंट गॉट टाइम टुडे।”

तदुत्तरितुं चलवाणीं पिटपिटायमाना एव आस्म तावता अन्यैः मित्रैरङ्गीकृतम्। अस्माभिर्लिखितमर्धवाक्यं निरस्तव्यम् अभवत्। दौर्भाग्यवशात् अस्माकं पिटपिटायनस्य गतिः अतिमन्दा। पश्चात् अस्माभिः किञ्चित् कालं यावत् जल्पितं ततः अध्ययने संलग्नितम्।

अध्ययनं समाप्य यावत् किञ्चित् अटामस्तावन्महती रात्रिरतीता। यथा सर्वे जानन्त्येव अटितृणां काव्यं वा स्फुरति दर्शनं वा। ननु राज्ञां नगरी लक्ष्मणपुरी एव अस्माकम्, किन्तु शब्दभाण्डारदारिद्र्यात् काव्यं स्वतः एव दूरे तिष्ठत्यस्मात्। अतः स्फुटमेव वयं दार्शनिकाः बभूविम।

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दर्शनानुगुणमेव शिरःस्फोटोऽपि जातः यदस्माकं भाषया हैंग्-आऊट् कर्तुमुक्तं तदा सर्वेऽस्मासु अहसन् बुद्धिभ्रष्ट इत्युदघोषयन् च किन्तु यदा आङ्ग्लया लम्बितुमुक्तं तदा सर्वे झटिति सिद्धाः।

सामान्यतया तु न कोऽपि ईदृशेषु निरर्थकविषयेष्ववधानं करोति किन्तु वयमत्र निशाचरदार्शनिकाः। प्रत्येकमपि निरर्थकवस्तुनि गभीरं दर्शनं प्रस्तोतव्यमित्येवास्माकं जीवनस्य इतिकर्तव्यता। अस्मिन् कर्तव्यपथि कृतया चेष्टयैवावगतं यदस्मदीया भाषा ‘लाफेबल’ तेषामाङ्ग्लं च ‘शीतलम्’ इति। अपि चायं भेदः न केवलमस्माकं सखमित्रेष्वेव अपितु महति व्यापकस्तरे दृश्यते।

उदाहरणार्थं हिन्दुत्वं हि सर्वथा भर्त्सनीयं हिन्दुइज्म तावत् अत्यन्तं स्तुत्यम्। न केवलं तावत्, हिन्दुइज्म हिन्दुत्वात् कियच्छ्रेष्ठमिति वर्णयितुं अखण्डानि पुस्तकानि लेखितानि! एकेन पुस्तकलेखकेन ननु न्यायालये सशपथमुक्तमासीन्नाहं हिन्दुरिति तेनैवाङ्ग्लया पुस्तकं मुद्रापितं कुतोऽहं हिन्दुरिति। प्रायः अस्मद्भाषीयः आङ्ग्लश्च हिन्दुः भिन्नौ। ननु हिन्दुइज्म इति स्वभाषया किमिति पृष्टे सति लेखकः किमुत्तरति न जानीमहे। अस्तु। उच्चस्तरीयाः एताः वार्ताः निम्नकोटिकाः वयम्। ननु निश्चितमेव अस्मदपेक्षया अधिकमेव जानीयात् स पुस्तकप्रकाशनत्वात्। अवश्यमेव स्वभाषया हिन्दुः नाम अतिनीचः हिन्दुः।

किन्तु वार्तेयं न खलु एभिर्महद्भिर्विषयैस्सीमिता। गालीः एव पश्यन्तु। पितृचरणैः संस्कृता वयं गालिदानमसभ्यमिति वयमपि अद्यावधि एवमेव अमनुमहि। किन्तु पितृचरणैर्नैवमुक्तं यदस्मद्भाषीयाः एव गालीः असभ्या इति।

आङ्ग्लगालीस्तु स्वयमेव तत्रभवन्तं लिबरलीकुर्वन्ति। उदाहरणार्थं फगिति। यो यो यावल्लिबरलतया इदमद्भुतं शब्दं प्रयुङ्क्ते स तावदेव मॉडर्नः लिबरलश्च। यो नोपयुङ्क्त यो वा जुगुप्सामनुभवति स ‘सच् ए प्रूड्’ (प्रूड् नाम प्रूडेंट्) इत्युक्ते रूढिवादी इत्युद्घोष्यते। कथा ततोऽपि रञ्जिका भवति यदि भवान् स्वभाषया तर्जयेत्। तदानीं भवान् रूढिवादीति स्थानात् खाटिति अपसृत्य ‘इल बिहेव्ड हेटफुल फास्सिस्ट’ स्तरे प्राप्नोति, फगित्यस्यैव वा भवतानुवादमुक्तं नु स्यात्।

अर्थाद्यदुक्तं तद्यदि अनुचितया भाषयोक्तं तद् मूल्यहीनम्। अस्यापि भाषाभेदस्य सूक्ष्माः स्तराः इतोऽपि सन्ति। यथा आङ्ग्लयैव भवता क्लिष्टाः असमान्याः अप्रयुक्ताः वा शब्दाः प्रयुज्यन्तां ये न कैश्चिदपि अवगम्यन्ते, भवान् ज्ञानी विद्वान् च। स्वभाषया क्लिष्टशब्दैरेकं वा वाक्यमुच्यतां श्रोतृणां भृकुटिः स्वयमेव तनोति कोऽयं पाषण्डी अस्मान् मूर्खयतीति।
किमर्थमिदम्? मातृभाषया सह सापत्नः परकीयाक्रान्तृणां भाषया सह गर्लफ्रेंड् इव व्यवहारः किमर्थम्? तदपि यदा वयं स्वतन्त्रं राष्ट्रं स्मः? स्मः नु?

नास्य प्रश्नस्योत्तरमस्मत्समीपे वर्तते। निशाचरदार्शनिकाः वयं प्रश्नमात्रं कर्तुं समर्थाः। ननूत्तरान्वेषणसमर्थाः यद्यभविष्याम वस्तुतः दार्शनिकाः अभविष्याम। पाठक एव कश्चन उत्तरतु यदीच्छति।

(हिंदी के मूल लेख का अनुवाद याजुषी ने किया है)

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