Monday, April 19, 2021
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मजहबी नारे चिल्लाती, मंदिर तोड़ती भीड़ को मजहब बताने में शर्म क्यों आती है?

इस भीड़ का नारा वही है जो आईसिस का नारा है। इसके हाथों में वही पत्थर है जो कश्मीर के आतंकियों के बचाव में उतरे कट्टरपंथियों के हाथों में होता है। ये उतने ही बेखौफ हैं जितने बेखौफ वो आत्महंता आतंकी होते हैं जो देह पर बम बाँध कर बहत्तर हसीनों के योनि और स्तनों से लिपटने की ख्वाहिश पाले अपने परखच्चे उड़ा लेते हैं।

‘एक समुदाय के लोग’ मंदिर में घुस गए और तोड़फोड़ मचाई। वाह! कितना क्यूट वाक्य है। अंग्रेजी वाले और भी क्यूट लाइन्स लिखते हैं, ‘पीपल फ्रॉम अ कम्यूनिटी’। समस्या क्या है? जब भीड़ की एक निश्चित पहचान है, और तुम्हें पता है कि ये भीड़ एक खास कम्यूनिटी या समुदाय विशेष की है, तो फिर उसके नामकरण में समस्या क्यों?

कब तक मीडिया ऐसी बेहूदगी करता रहेगा? जब आरोपित मजहबी नाम वाला हो, जब भीड़ इस्लामी हो, तो ‘अ कम्यूनिटी’ या ‘समुदाय विशेष’ क्यों लिखा जाता है? आखिर ऐसा क्या विशेष है इस समुदाय में? एक विचित्र तर्क यह भी आता है अगर मीडिया ‘उसका मजहब लिखेगी तो साम्प्रदायिक तनाव बढ़ जाएगा।’ क्या बेहूदी दलील है!

मतलब, हिन्दू नाम वाले के हाथों चोर को मारा जाए तो उसमें ‘नो जय श्री राम’ (#NoJaiSriRam)आ जाते हैं, कठुआ में आठ हिन्दू नाम वाले अपराधी संलिप्त हों तो पूरा सनातन धर्म ही सवालों के दायरे में आ जाता है, त्रिशूल पर कंडोम लगा कर वायरल किया जाता है, और जो हिन्दू नहीं हैं वो भी ‘आई एम अ हिन्दू, आई एम अशेम्ड’ की तख्ती गले में टाँगे नाचने लगते हैं।

लेकिन, एक इस्लामी भीड़ मथुरा के भरत यादव की जान ले ले, मँगरू को तीन मजहबी चाकुओं से गोद दें, सरे राह प्रेम करने के लिए हिन्दू लड़के को कट्टरपंथी काट दे, दिल्ली में मंदिर पर ‘अल्लाहु अकबर’ का नारा लगाती एक भीड़ चढ़ाई कर दे, मौलवी मस्जिद के भीतर किसी बच्ची का रेप करे, बंगाल में लगभग हर जिले में दो समुदायों के दंगे हों, तो वहाँ मजहब के नाप का लोप हो जाता है। कहा जाता है कि शांति भंग हो जाएगी!

लेकिन शांति ही तो भंग वैसे भी हो रही है। एक फेसबुक पोस्ट समाने आया जिसमें हिन्दुओं पर लगातार होते रहे आक्रमणों को सीधे शब्दों में जताया गया है:

1000 साल पहले हमारे मंदिरों को तोड़ा गया
700 साल पहले हमारे मंदिरों को तोड़ा गया
30 साल पहले हमारे मंदिरों को तोड़ा गया
6 महीने पहले हमारे मंदिरों को तोड़ा गया
आज हमारे मंदिर को तोड़ा गया
फिर भी, हम ही बर्बर बहुसंख्यक हैं।

ये पोस्ट उन लाखों लोगों के मन की सामूहिक अभिव्यक्ति है जो यह कह रहे हैं कि हिन्दुओं की सहिष्णुता का फ़ायदा उठाते-उठाते भारत के कुछ लोगों का गिरोह पीड़ित को ही आक्रांता बताने पर तुला हुआ है। जिस तरह के नैरेटिव गढ़े जा रहे हैं, उसके अनुसार आने वाले दिनों में, हो सकता है कि नई थ्योरी के अनुसार, बताया जाएगा कि गोरी, गजनवी, खिलजी, बाबर आदि तो किसी दूसरे देश में चिल कर रहे थे, उसे एक हिन्दू राजा ने अपने घोड़े से बाँध कर घसीटा था, और उसी अपमान का बदला लेने के लिए उसने भारत के तमाम मंदिरों को तोड़ा, गाँवों को उजाड़ा, नालंदा को आग लगा दिया, यहाँ की बहू-बेटियों का बलात्कार किया।

क्योंकि यही हो ही रहा है। एक आतंकी जब सेना द्वारा घेर कर मारा जाता है तो बताया जाता है कि वो तो बचपन से पढ़ने में तेज था, गालिब की शायरी सुनाता था, लेकिन एक दिन सेना के एक अधिकारी ने उसे कान पकड़ कर उठक-बैठक करने को कहा और वो आतंकवादी बन गया। धन्य हैं ऐसे माँ-बाप जो अपने बच्चों के आतंकी बनने को इस तरह के कुतर्क से जस्टिफाय करते हैं, और धन्य है हमारा पाक अकुपाइड पत्रकार गिरोह जो हर आतंकी के बाप के पजामे के नाड़े की लम्बाई निकाल लेता है और कहता है वो नाड़ा तो किसी हिन्दू टेलर ने सिला था।

यही वो दोगलापन है जिसके कारण मेनस्ट्रीम मीडिया के एक हिस्से को लगातार गालियाँ पड़ती हैं और वो निर्लज्ज होकर अपने मालिक के ‘बदनामी में भी तो नाम है’ वाले ध्येय वाक्य से चलते रहेंगे। आखिर एक आतंकी विचारधारा को, एक ऐसी भीड़ को जिसके लिए ‘अल्लाहु अकबर’ कहते हुए मंदिर पर हमला बोलना सामान्य-सी बात है, उसको किस लिहाज से डिफेंड किया जा रहा है?

हर मजहबी आतंकी नहीं है, हर मजहबी मंदिर नहीं तोड़ रहा, लेकिन जो तोड़ रहे हैं वो कौन हैं? वो ‘तीन शब्दों वाला’ विशेष नारा किस मजहब का है? जिस आसानी से दो किशोरों के द्वारा बनाया विडियो, जिसमें एक लड़का दूसरे को ‘जय श्री राम’ बोलने कहता है, सारे हिन्दुओं के सर मढ़ दिया जाता है, वही सहजता, एक भीड़ के ‘मजहबी नारे’ चिल्लाने के बाद भी क्यों नहीं दिखाई जाती?

ये आतंकी भीड़ अपने आप को क्या समझती है? ये भीड़ और इस मजहब के वो लोग जो बाबरी मस्जिद गिराए जाने पर बुक्का फाड़ कर अभी भी अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक खेलते रहते हैं, वो क्या भूल जाते हैं कि पीपल का एक पेड़ भी सनातन आस्था का प्रतीक है? वो क्या नहीं जानते कि मंदिर चाहे दो सौ फीट ऊँची हो, या दस फीट, वो सनातन आस्था का ही प्रतीक है, न कि उसकी ऊँचाई से आस्था कम या ज़्यादा हो जाती है?

फिर ये दोगले विचारक, ये बर्बाद लिबरपंथी, ये माओवंशी लेनिन की नाजायज कामपंथी वामभक्त औलादें किस हिसाब से हिन्दुओं के आरोपित होने पर, गले में तख्तियाँ लपेटे, अपने स्थान विशेष में छुपाई मोमबत्तियाँ फटाक से निकाल कर हैशटैग-हैशटैग करने लगते हैं, लेकिन हिन्दुओं की लिंचिंग पर वो जलती हुई मोमबत्तियाँ वापस अपने स्थान विशेष में रख लेते हैं? क्या जलन नहीं होती इन्हें? इतना दोगलापन क्या एक साथ हो जाने पर इनके दिमाग पर असर नहीं करती?

ये और कुछ नहीं है, ये समाज को गृहयुद्ध की ओर ढकेलने का कुत्सित प्रयास है। समुदाय के लोगों को बताते रहो कि तुम्हारे मजहब का एक चोर या कोई आतंकी भी मरे तो वो हिन्दुओं द्वारा तुम्हारे भीतर डर फैलाने का प्रयास है, जबकि तुम्हारे कट्टरपंथी भाई किसी की जान ले लें, तो वो बात इतनी सामान्य है कि उस पर चर्चा भी मत करो।

ये तो नहीं चलेगा। हमारे मंदिरों के ऊपर पत्थरबाजी, और उसके सामने खड़े हो कर ‘अल्लाहु अकबर’ की बात तो नहीं होगी। तबरेज चोर हो या पाँच वक्त का नमाजी, उसकी हत्या सही नहीं है, लेकिन उसको रोहित वेमुला बनाने वाले लोग जान लें, कि हत्या तो मंगरू की भी सही नहीं है, हत्या तो मथुरा के लस्सी विक्रेता की भी सही नहीं है।

इस आतंकी भीड़ को हिम्मत इन्हीं दोगले विचारकों से मिलती है क्योंकि वो जानते हैं कि उनका हर कुकर्म ट्विटर, फेसबुक या टीवी चैनल के स्टूडियो में बैठे किसी लिबरपंथी के द्वारा ‘समुदाय विशेष’ और ‘अभी इलाके में तनाव है’ के बीच भुला दिया जाएगा। इस भीड़ का एक चेहरा है, बिलकुल है, क्योंकि इस भीड़ का नारा वही है जो आईसिस का नारा है। इसके हाथों में वही पत्थर है जो कश्मीर के आतंकियों के बचाव में उतरे लोगों के हाथों में होता है। ये उतने ही बेखौफ हैं जितने बेखौफ वो आत्महंता आतंकी होते हैं जो देह पर बम बाँध कर बहत्तर हसीनों के योनि और स्तनों से लिपटने की ख्वाहिश पाले अपने परखच्चे उड़ा लेते हैं।

जब किसी विडियो में ‘जय श्री राम’ के नारे लगवाने पर ये ज्ञानी लोग हमें बताते हैं कि ये एक धार्मिक नारे का वेपेनाइजेशन है, यानी नारे को हथियार बनाया जा रहा है, तो इन ज्ञानियों के यह भी तो बताना चाहिए कि मंदिर में घुसते, पत्थरबाजी करते, मूर्तियाँ तोड़ते उतरी भीड़ का नारा ‘अल्लाहु अकबर’ वेपेनाइज हुआ है या नहीं। ये नहीं बता पाएँगे क्योंकि इनके स्थान विशेष में दर्द होने लगता है।

अगर हमारे समय के लिबरल और छद्मबुद्धिजीवी इस तरह से सेलेक्टिव होते रहेंगे, वो लगातार एक लाइन पकड़ कर चलते रहेंगे, सारे हिन्दुओं के सर पर कुछ अपराधियों का अपराध बाँटेंगे लेकिन मजहबी भीड़ को फ्री पास दे देंगे, तो इनकी साख तो जाएगी ही, उसके साथ ही ‘सामाजिक सद्भाव’ नाम के शब्दांश कम से कम हिन्दू और दूसरे खास मजहब के संदर्भ में तो इस्तेमाल होने लायक नहीं रहेंगे।

दुर्भाग्य से तथाकथित गंगा-जमुनी तहजीब का वही हाल है जो वास्तव में इन दोनों नदियों का है। गंगा बह रही है, और यमुना वालों ने इतना कचरा जमा कर लिया है कि वो नाला बन कर सूखने के कगार पर है। यमुना में जो बह रहा है, वो भी काले रंग का अपशिष्ट पदार्थ है जो समाज का हिस्सा हो नहीं सकता। अपने दम पर गंगा इसे जिंदा नहीं कर सकती। जब तक समुदाय विशेष और उसके आतंक को डिफेंड करने वाले चिरकुट और लम्पट लोग अपनी आदत से बाज नहीं आएँगे, गंगा-जमुनी तहजीब आतंकियों के दुष्कृत्यों को ढकने का एक जरिया मात्र बन कर रह जाएगा।

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अजीत भारती
पूर्व सम्पादक (फ़रवरी 2021 तक), ऑपइंडिया हिन्दी

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