Zomato वालो, हलाल के समय ‘Food has no Religion’ कहाँ गया?

जोमैटो के संस्थापक दीपिंदर गोयल के अनुसार वह 'idea of india' के प्रति गौरान्वित हैं, और अपने ग्राहकों और साझीदारों की विभिन्नता का भी उन्हें गर्व है। और उनके कथित 'मूल्यों' के आड़े आने वाले किसी भी ग्राहक का बिज़नेस छोड़ने में उन्हें कोई अफ़सोस नहीं है।

ट्विटर पर एक और सांस्कृतिक लड़ाई शुरू हो गई है। फ़ूड डिलीवरी सर्विस Zomato ने ट्विटर पर खाने के साथ-साथ ज्ञान देना भी शुरू कर दिया है। आज जोमैटो ने बताया कि खाने का कोई मज़हब नहीं होता, बल्कि खाना अपने आप में मज़हब होता है।

जोमैटो के एक ग्राहक ने खाने की डिलीवरी लेने से मना कर दिया क्योंकि खाना पहुँचाने वाला मुस्लिम था, और श्रावण के महीने में वह गैर-हिन्दू के हाथ से खाना नहीं स्वीकार करना चाहता था। इसपर कैंसलेशन फ़ीस काटना ज़ोमाटो का हक़ था, जो उन्होंने काटी। लेकिन साथ ही पलट कर ‘ज्ञान’ देना शुरू कर दिया कि खाने का कोई मज़हब नहीं होता, बल्कि खाना अपने आप में मज़हब होता है।

इतना नैतिक ज्ञान बघारना काफी नहीं था जोमैटो के लिए। उसके संस्थापक दीपिंदर गोयल ने भी नैतिक शिक्षा की क्लास ट्विटर पर लेनी शुरू कर दी। उनके अनुसार वह ‘idea of india’ के प्रति गौरवान्वित हैं और अपने ग्राहकों और साझीदारों की विभिन्नता का भी उन्हें गर्व है। साथ ही उनके कथित ‘मूल्यों’ के आड़े आने वाले किसी भी ग्राहक का बिज़नेस छोड़ने में उन्हें कोई अफ़सोस नहीं है।

खोखले मूल्य

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जोमैटो के तथाकथित मूल्य कितने खोखले हैं, इसकी नज़ीर यह है कि जब एक मुसलमान ने गैर-हलाल खाने के लिए शिकायत की, तो जोमैटो उसके चरणों में गिर गया। उस समय उसके ‘मूल्य’ हवा हो गए, जबकि हलाल गैर-हलाल का मुद्दा भी उतना ही मज़हब और आस्था का विषय है, जितना खाना पहुँचाने वाले का हिन्दू होना या न होना।

जिन्हें लग रहा है कि यह एकतरफ़ा राजनीति है, उन्हें यह याद दिलाया जाना ज़रूरी है कि संघियों का आर्थिक बहिष्कार करने की अपीलें भी हुईं हैं इस देश में, और उस समय आज ‘राजनीतिकरण मत करो’ बोलने वाले हमेशा की तरह नदारद थे।

मैं उस व्यक्ति ने जो ट्वीट किया उससे सहमति नहीं रखता। लेकिन तथ्य यह भी है कि ऐसी चीज़ों से निपटने का एक प्रोफेशनल तरीका होता है, सोशल मीडिया पर ज्ञान बाँटने और नैतिकता के ठेकेदार बनने का काम कॉर्पोरेट कंपनियों का नहीं होता।

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