देश का सबसे ‘बड़ा’ दलित नेता और ‘बयानवीर’ उदित राज का कटा टिकट – ये हैं कारण

उदित राज के संसदीय क्षेत्र से कुछ मतदाताओं ने कहा कि उन्होंने पिछले 5 वर्षों में कभी अपने सांसद की सूरत तक नहीं देखी, वो किस आधार पर अपने आप को सबसे अच्छा परफॉर्म करने वाला सांसद बता रहे हैं?

भाजपा ने दिल्ली की सभी 7 सीटों के लिए प्रत्याशियों के नामों की घोषणा कर दी है। इनमें मनोज तिवारी और गौतम गंभीर जैसे बड़े नाम भी शामिल हैं। नॉर्थ वेस्ट दिल्ली से दलित नेता उदित राज का टिकट काटा जा चुका है। उनकी जगह हंस राज हंस भाजपा के उम्मीदवार हैं। इस सीट के लिए उम्मीदवार की घोषणा में हुई देरी के बाद ही उदित राज बौखला गए थे और उन्होंने ट्वीट पर ट्वीट कर के पार्टी आलाकमान पर निशाना साधना शुरू कर दिया था। हालाँकि, जब तक नॉर्थ वेस्ट दिल्ली का भाजपा द्वारा टिकट का ऐलान नहीं होता, तब तक वो चुप भी रह सकते थे और इन्तजार कर सकते थे लेकिन बड़बोले उदित राज ने सीधा अमित शाह और नरेंद्र मोदी को घेरना शुरू कर दिया। उनका टिकट काटकर पार्टी ने साफ़ सन्देश दे दिया है कि भाजपा में रहकर पार्टी की विचारधारा के ख़िलाफ़ बार-बार बोलने वालों के लिए यहाँ कोई जगह नहीं है।

देखा जाए तो भाजपा सहित कई अन्य दलों में बहुत से ऐसे बयानवीर नेता हैं जो अलूल-जलूल बयानबाज़ी करते रहते हैं लेकिन उदित राज ख़ुद को भाजपा में रहते हुए भी एक अलग ही संस्था समझ रहे थे। उन्होंने पार्टी आलाकमान को अल्टीमेटम देते हुए कहा कि उनकी उम्मीदवारी घोषित करने में हो रहे विलम्ब के कारण उन्हें भाजपा छोड़ने को भी मज़बूर होना पड़ सकता है। 2014 में भाजपा में शामिल होने से पहले भी उदित राज भाजपा का विरोध कर चुके हैं। उन्होंने पिछले आम चुनाव से पहले अपनी पार्टी का भाजपा में विलय कर दिया था, तभी उन्हें लोकसभा का टिकट भी मिला था। उदित राज ख़ुद को देशभर के दलितों का प्रतिनिधि मानते हैं, खुद को दलितों की आवाज़ बताते रहे हैं।

दरअसल, पिछले 5 वर्षों में कई मौकों पर उदित राज ने या तो अपनी ही पार्टी पर निशाना साधा या फिर कुछ ऐसा बयान दिया, जिससे पार्टी की फजीहत हुई और कार्यकर्ताओं में भरम पैदा हुआ। यहाँ तक कि उन्होंने यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक के बयानों पर सार्वजनिक रूप से पलटवार किया। शत्रुघ्न सिन्हा भी भाजपा के ख़िलाफ़ सालों से बयान देते रहे लेकिन उनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई न कर के भाजपा ने उन्हें एक दायरे के भीतर सीमित कर दिया और टिकट से नदारद कर के पार्टी छोड़ने को मज़बूर कर दिया। इससे न तो उन्हें सहानुभूति को भुनाने का मौक़ा मिला और न ही जनता के बीच उनकी ज्यादा चर्चाएँ हुईं। उदित राज वाले मामले में भी भाजपा ने यही रणनीति अपनाई लेकिन थोड़ा संभल कर।

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पिछले वर्ष जब ‘मी टू’ अभियान चल रहा था और महिलाओं द्वारा वर्षों पहले किसी पुरुष द्वारा किए गए दुर्व्यवहार के राज़ खोले जा रहे थे, तब उदित राज ने विवादित बयान दिया था। उन्होंने उस वक़्त कहा था कि पुरुष तो स्वभाव से ही ‘ऐसे’ होते हैं लेकिन महिलाओं को भी क्लीन चिट नहीं दी जा सकती। उन्होंने कहा था कि महिलाएँ 2-4 लाख रुपए लेकर ऐसे आरोप लगा रही हैं और एक के बाद एक पुरुष इसमें फँस रहे हैं। उस दौरान उनके इस बयान से भाजपा की ख़ासी फ़ज़ीहत हुई थी लेकिन दलित नेता होने कारण उनका ज़्यादा विरोध नहीं हुआ।

इसी तरह उन्होंने अपनी पार्टी की विचारधारा के ख़िलाफ़ जाकर अज़ीबोग़रीब बयान देते हुए कहा था कि प्रसिद्ध धावक युसेन बोल्ट ने बीफ खाने के कारण इतने ओलिंपिक मेडल्स जीते हैं। उदित राज ने कहा था कि ‘ग़रीब’ बोल्ट ने दिन में 2 बार बीफ का सेवन कर ओलंपिक में 9 मेडल्स अपने नाम किया। उदित राज आरक्षण बढ़ाने और प्राइवेट सेक्टर में दलितों को आरक्षण देने के लिए भी काफ़ी मुखर रहे हैं। एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने दावा किया था कि दलित मतदाता भाजपा को लेकर संशय में हैं। उन्होंने कहा था कि रोहित वेमुला की मृत्यु और गोरक्षक के मुद्दे को लेकर दलित कन्फ्यूज्ड हैं। सार्वजनिक रूप से पार्टी को लेकर इस तरह के बयान देने के कारण दिल्ली भाजपा के एक धड़े में उनके प्रति नाराज़गी थी।

क्रिकेट में आरक्षण और दलित मुद्दा घुसाकर भी उन्होंने कुछ ऐसा ही विवादित बयान दिया था। उस दौरान उन्हें पूर्व भारतीय क्रिकेटर विनोद कांबली ने कड़ी डाँट पिलाई थी। उदित राज ने विनोद कांबली से कहा था कि उन्हें इस बात को स्वीकार करने से नहीं हिचकना चाहिए कि उन्हें दलित होने के कारण टीम इंडिया से निकाल बाहर किया गया था। इसके जवाब में विनोद कांबली ने उन्हें कहा था “मैं आपके किसी भी बयान का समर्थन नहीं करता। कृपया मेरा नाम लेने से बचें”। इसके बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने उदित राज का मज़ाक बनाया था। लोगों ने उस दौरान उदित से कहा था कि अगर वो चुनाव भी हार जाते हैं तो यही कहेंगे कि उन्हें दलित होने के कारण जीत नहीं मिली। भाजपा लगातार इस तरह के बयानों से परेशान हो चुकी थी।

इसी तरह एक बार वो भाजपा के फायरब्रांड नेता योगी आदित्यनाथ से भिड़ गए थे। योगी आदित्यनाथ ने जब भगवान हनुमान को दलितों से जोड़कर देखा था तब उदित ने उन पर निशाना साधते हुए सार्वजनिक रूप से कहा था, “हनुमानजी बन्दर हैं और योगी आदित्यनाथ के अनुसार, क्या दलित लोग बन्दर हैं?” भाजपा के एक बड़े नेता के बयान पर इस तरह के पलटवार से विरोधियों को भी मौक़ा मिल गया था। उदित राज ने केंद्र सरकार द्वारा कॉन्ट्रैक्ट पर की जाने वाली बहाली को आरक्षण के नियमों के विरुद्ध बताया था। हिन्दू से धर्मान्तरण कर बौद्ध बने उदित राज जजों की बहाली में आरक्षण की माँग करते हुए विरोध प्रदर्शन भी किया था। उन्होंने दलितों के बारे में तरह-तरह के बयान देकर पार्टी को असहज कर दिया था।

उन्होंने खुलेआम कहा था कि संविधान में अनुसूचित जाति एवं जनजाति को मिला आरक्षण ख़तरे में है। भाजपा को असहज करते हुए उन्होंने कहा था, “मैंने इस बात को बार-बार पार्टी फोरम पर उठाई है लेकिन मुझे अनसुना कर दिया गया।” उन्होंने आरक्षण को ख़तरे में बताते हुए बेरोज़गारी को लेकर सवाल खड़े किए थे। उनकी एक रैली में मोदी सरकार को उखाड़ फेंकने के नारे लगे थे। इन कारणों से मीडिया को चर्चा का मुद्दा मिल जाता था और विपक्षी भी भाजपा पर निशाना साधते थे। उदित राज ने साफ़ कह दिया था कि अगर उन्हें टिकट नहीं मिला तो वो पार्टी छोड़ देंगे। इसके उलट महेश गिरी ने गौतम गंभीर के लिए तुरन्त ट्वीट किया, जैसे ही ख़बर आई की उनकी सीट पर गिरी की जगह गंभीर लड़ेंगे।

बड़बोले उदित राज ने भाजपा को आड़े हाथों लेते हुए कहा, “पार्टी क्यों नहीं टिकट दे रही? मैंने इतना अच्छा काम किया है। पार्टी क्या दलित विरोधी है? पूरे देश में मुझसे बड़ा दलित नेता कौन है। जितने इनके कैंडिडेट लड़ रहे हैं, उनके जितनी मेरे अकेले की ताकत है।” उदित राज ने बिना इन्तजार किए ऐसे-ऐसे तेवर दिखाने शुरू कर दिए, जिससे शायद ही उन्हें भाजपा में आगे तरजीह मिले। ख़ुद को टिकट न दिए जाने को उन्होंने दलितों के साथ धोखा भी बताया। उनके संसदीय क्षेत्र के कुछ मतदाताओं ने ट्वीट के माध्यम से कहा कि उन्होंने पिछले 5 वर्षों में कभी अपने सांसद उदित राज की सूरत तक नहीं देखी, वो किस आधार पर अपने आप को सबसे अच्छा परफॉर्म करने वाला सांसद बता रहे हैं?

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