दिल्ली में रविवार (23 नवंबर 2025) को एक प्रदूषण के खिलाफ एक प्रदर्शन हुआ लेकिन इसमें पुलिस पर हिंसा हुई, चिली स्प्रे तक इस्तेमाल किया गया। इस मामले में FIR दर्ज हुई और 15 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया।
ये प्रदर्शन साफ हवा के लिए था लेकिन जल्द ही सामने आ गया कि ये bsCEM (भगत सिंह छात्र एकता मंच) का लेफ्टिस्ट एजेंडा था। इसके लीडर जैसे रवजोत कौर और द हिमखंड ने कुछ दिनों पहले मारे गए नक्सली कमांडर माड़वी हिड़मा की तारीफ की थी।
इस पूरे प्रदर्शन में भी इसकी छाप दिखी और प्रदर्शनकारियों ने उसके पोस्टर लगाए और ‘कॉमरेड हिड़मा अमर रहे’ जैसे नारे लगाए। प्रदर्शन में सिर्फ नक्सलियों की तारीफ नहीं हुई बल्कि उनके टेरर ग्रुप्स को ‘लोगों की सरकार’ कहा गया।
Protest is on Delhi Pollution
— Ankur Singh (@iAnkurSingh) November 23, 2025
Slogans- "Comrade Hidma Amar Rahe"
The real protest is against Killing of Naxalite Hidma who has killed hundreds of our Jawans.
These "Laal Salam" Communists celebrated when Hidma led attack on on 75 CRPF Jawans in 2010.
These JNU Leftists are… pic.twitter.com/SO6lWWtbH0
ट्राइबल इलाकों में धमकियों, डर और हिंसा से अपनी बात मनवाने की कोशिश करने वाले नक्सलियों को देश की चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार का विकल्प बताया गया। इनके समर्थक ‘अर्बन नक्सलियों’ ने उस विचारधारा के समर्थकों द्वारा फैलाए गए आतंक को ‘अधिकारों और कल्याण’ की आड़ में बढ़ावा दिया है।
मजेदार बात ये है कि bsCEM और द हिमखंड ने 14 नवंबर को ‘साफ हवा के आंदोलन पर प्रेस कॉन्फ्रेंस’ नाम का इवेंट किया था। इसमें प्रशांत भूषण स्पीकर थे। ये प्रोग्राम दिल्ली यूनिवर्सिटी की AISA (ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन) और ‘साइंटिस्ट्स फॉर सोसाइटी’ ने होस्ट किया था।

रवजोत, दिल्ली प्रदर्शन और ‘कॉमरेड हिड़मा अमर रहे’
bsCEM की रवजोत इस इवेंट के पोस्टर में थी। वही रवजोत कल दिल्ली प्रदर्शन में आतंकी हिड़मा की तारीफ करती दिखी, भारतीय सरकार को बुरा भला कहा और ट्राइबल इलाकों में नक्सलों की हुकूमत को ‘आदर्श’ बताया।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, रवजोत गुरु गोबिंद सिंह इंदिरा प्रस्थ विश्वविद्यालय से कंप्यूटर साइंस ग्रेजुएट है और bsCEM की एक्टिव मेंबर है। वो दिल्ली में रेगुलर ‘आंदोलनजीवी’ है, और रविवार (23 नवंबर 2025) को उसे चिली स्प्रे लेकर पुलिस पर हमले का आरोपित बनाया गया।
According to this lady protesting in Delhi yesterday, air pollution is happening because of ‘profit-led development model’.
— Padmaja Joshi (@PadmajaJoshi) November 24, 2025
She wants it replaced with ‘people led development model practised by Maoists’.
(Protest had posters lionising Maoist commander Hidma)
Delhi Police has… pic.twitter.com/WYp9fcEdCd
4 पुलिसवाले आँखों से घायल हुए और RML हॉस्पिटल में भर्ती हैं। इधर, इन रैडिकल ग्रुप्स का ओवरव्यू देखें तो पता चलता है कि वो रेड टेरर की खुली तारीफ करते हैं। हर बंदूकधारी नक्सली, जो देश के खिलाफ जंग लड़ता है, उनके लिए या तो ट्राइबल हक का फाइटर है या बेकसूर।
‘चुनावों का बहिष्कार करो और देश के खिलाफ हिंसा करो’
पिछले साल लोकसभा चुनावों से पहले bsCEM ने दिल्ली यूनिवर्सिटी की दीवारों पर ग्राफिटी लिखी, जिसमें लोगों से वोट न डालने को कहा। उन्होंने लिखा, एक ही रास्ता नक्सलबाड़ी (नक्सलबाड़ी ही एकमात्र रास्ता है), वो जगह जहाँ भारत में रेड टेरर की शुरुआत हुई।
दूसरे नारे जैसे चुनावों का बहिष्कार करो, न्यू डेमोक्रेसी जॉइन करो लिखे और इलेक्शन कमीशन पर हमला बोला। फिर डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस (नॉर्थ) सागर सिंह कलसी ने कहा, “डिफेसमेंट एक्ट के तहत दो FIR दर्ज हुई हैं और जाँच चल रही है।” ये 23 मई को हुआ, जब bsCEM ने यूनिवर्सिटी के नॉर्थ कैंपस पर मैसेज पेंट किए।
जब अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने शिकायत की, तो आरोपित पकड़े गए। ग्रुप ने दावा किया कि नारे लिखना “देश के स्टूडेंट मूवमेंट्स की हिस्ट्री में हमेशा डेमोक्रेटिक तरीका रहा है।”
bsCEM की मेंबर गुरकीरत ने कहा, “1947 के बाद भारत में इम्पीरियलिस्ट एक्सप्लॉइटेशन जारी रहा, जब देश कॉलोनियल से सेमी-कॉलोनियल हो गया। हम सोचते हैं चुनाव धोखा हैं, कोई असली बदलाव नहीं होगा। आदिवासी हर पार्टी के हाथों पीड़ित रहेंगे।”
उन्होंने आरोप लगाया, “भारत की डेमोक्रेसी सिर्फ स्टेटस क्वो (मौजूदा स्थिति) बनाए रखने के लिए है। असली स्ट्रगल के लिए कोई जगह नहीं, इसलिए हमारे खिलाफ इतनी तेज कार्रवाई हुई।” ये विशुद्ध हिपोक्रिसी है। ये लोग भारत की डेमोक्रेटिक सिस्टम को यूज करके उसे नक्सलवाद से बदलना चाहते हैं और बेशर्मी से अपना हक बताते हैं। डेमोक्रेसी में खामियाँ हैं लेकिन वो लोगों की इच्छा दिखाती है।
हर कम्युनिटी, ट्राइबल्स, माइनॉरिटीज सब संविधान के मुताबिक अपना गवर्नमेंट चुन सकती हैं। लेकिन ये लोग हिंसा और खूनखराबे की आइडियोलॉजी को रोमांटिक बनाते हैं, जहाँ बंदूक की धमकी से लोगों की आवाज दब जाती है और वे इसे चुनावों से बेहतर बताते हैं।
ब्राह्मणिकल हिंदुत्व की बकवास और माओइस्टों को हीरो बनाना
जैसा उम्मीद थी, bsCEM ने पुलिस की कार्रवाई को ‘ब्राह्मणिकल हिंदुत्व फासीस्ट RSS-BJP (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ-भारतीय जनता पार्टी)’ का बताया और पुलिस पर हमले जैसी अपनी गलतियों को ढकने की कोशिश की है।
उन्होंने अपने ‘कॉमरेड्स’ और आइडियोलॉजी शेयर करने वालों को बड़ी तादाद में इकट्ठा होने का सिग्नल दिया, साफ तौर पर और बवाल भड़काने का इरादा। ये प्रदर्शन 2020 के दिल्ली के एंटी-हिंदू दंगों की शुरुआत जैसा था लेकिन इसे रेगुलर आंदोलन बताया गया, न कि नक्सलिजम को मेनस्ट्रीम करने और भारत के दुश्मनों को सेलिब्रेट करने का प्रोग्राम।
ग्रुप ने हिड़मा के मारे जाने को फेक एनकाउंटर कहा और भारतीय सरकार पर सेंट्रल इंडिया के मिनरल रिच इलाकों को ‘अपने बेटे-बेटियों के खून से रंगने’ का आरोप लगाया। जो नक्सली सुरक्षाबलों पर लगातार हमले करते हैं, लोकतंत्र को निशाना बनाते हैं और लोगों को स्थानीय या समानांतर सरकार के नाम पर बरगलाते हैं, उन्होंने हीरो दिखाने की कोशिश की गई है।
दूसरी तरफ, एडमिनिस्ट्रेशन और अथॉरिटीज़, जो इन अत्याचारों को खत्म करने और गरीब इलाकों को डेवलपमेंट के लिए भारत से जोड़ने की कोशिश करते हैं, उन्हें विलेन बनाकर बेवकूफ जनता को धोखा देने और सहानुभूति बटोरने की कोशिश की गई।
इसी तरह, बार-बार सरकार पर ट्राइबल कम्युनिटीज के हक के लिए लड़ने वालों की मौत का आरोप लगाने के बाद, bsCEM ने नक्सली कमांडर मल्लौजुला वेणुगोपाल राव उर्फ सोनू के सरेंडर को बड़ी कंपनियों को खुश करने वाला बताया है।
फिर सरकार से जिनेवा कन्वेंशन का पालन करने को कहा, जो नॉन-इंटरनेशनल आर्म्ड कॉन्फ्लिक्ट के लिए है। साथ ही कई डिमांड्स रखीं, जैसे ऑपरेशन कागार बंद करना, जो नक्सलियों के खिलाफ है।
ऑपरेशन कागार का जिक्र साफ बताता है कि ये कितना सफल रहा है माओइस्ट थ्रेट को खत्म करने में। इसी तरह, ब्राह्मणिकल हिंदुत्व फासीस्ट RSS-BJP पर पहले हिड़मा की टॉर्चर और किलिंग का आरोप लगाया गया, जिसे साधारण आदिवासी बताया है।
हिंसा से चलने वाले नक्सलियों को निरस्त्र क्रांतिकारी कहा और सरकार के खिलाफ हथियार उठाने को डेमोक्रेटिक डिसेंट बताया। माओवाद को आम लोगों के दमन और शोषण का हल बताया गया। बैन कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) को लोगों की वैध आवाज कहा।
सभी पोस्ट्स सिर्फ नक्सलियों के लिए सहानुभूति और याद करने के लिए, बिना एक शब्द उनके टारगेट्स के, जिसमें ट्राइबल पॉपुलेशन शामिल है। ये दिखाता है कि bsCEM और ऐसे ग्रुप्स लोकल पॉपुलेशन को कितना महत्व देते हैं। उनकी लॉयल्टी सिर्फ खूनखराबे वाली आइडियोलॉजी की तरफ है, अनगिनत बेकसूर जिंदगियों की कीमत पर।
भारतीय राज्य का डेमोनाइजेशन, और फिलिस्तीन का सपोर्ट
bsCEM ने भारतीय राज्य को ‘अपने बच्चों को मारने वाली रिपब्लिक’ कहा, ये भूलकर कि माओवादी न बच्चों को मानते हैं, न भारत को अपना देश। इसलिए वे हथियार उठाते हैं। इसीलिए ‘ऑपरेशन कागार’ बंद करने की पोस्ट्स ग्रुप शेयर करता रहता है।
इसके अलावा, कई पोस्ट्स दिल्ली यूनिवर्सिटी के पूर्व इंग्लिश प्रोफेसर GN साईंबाबा को समर्पित है, जिन्हें माओवादियों से रिश्तों के चलते उम्रकैद की सजा मिली थी। बाद में उन्हें बरी कर दिया गया और इस फैसले के जिम्मेदार बॉम्बे हाईकोर्ट के जज रोहित बी डियो ने 2023 में व्यक्तिगत कारणों से रिजाइन कर दिया था।
साईंबाबा की मौत पिछले साल 12 अक्टूबर को हुई। उनकी डेथ एनिवर्सरी को bsCEM ने उनके शहादत का मेमोरियल मीट के रूप में मनाया, जिसमें मौजूदा सरकार के खिलाफ बकवास दोहराई है।
ग्रुप ने मुंबई पुलिस द्वारा TISS (टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज) के कम से कम 10 स्टूडेंट्स के खिलाफ FIR पर गुस्सा जताया, जो साई बाबा की ‘डेथ एनिवर्सरी’ मना रहे थे। महत्वपूर्ण ये कि इन छात्रों ने इंस्टीट्यूशन या अथॉरिटीज से परमिशन नहीं ली थी और प्रोग्राम में दिल्ली दंगों के आरोपित उमर खालिद और शरजील इमाम के पक्ष में नारे लगाए।
जैसे bsCEM ने भारत में माओवादी हिंसा को रेवोल्यूशनरी बताया, वैसे ही प्रो-हमास प्रोपगैंडा फैलाया और फिलिस्तीन के समर्थन में प्रदर्शन आयोजित किए। सिर्फ bsCEM और देश में ऐसे एलिमेंट्स के एंटी-इंडिया और कट्टरपंथी मानसिकता की एक झलक है, जो संविधान और देश की आजादी का फायदा उठाकर सरकार हथियाना चाहते हैं और क्रांति व आइडियोलॉजी के नाम पर बड़े पैमाने पर खूनखराबा फैलाना चाहते हैं।
लाल किले पर प्रदर्शन के दौरान पुलिस पर हमला इसका साफ सबूत है। ये लोग अपने खतरनाक एजेंडा के लिए हर भारतीय संस्था को कमजोर करने की कोशिश करते हैं और जब रोका जाता है तो विक्टिम बन जाते हैं।


