Thursday, October 1, 2020
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आचार संहिता उल्लंघन के नाम पर चुनाव चिह्नों के इस्तेमाल पर रोक की बात हास्यास्पद

उम्मीद की जाती है कि ये नेता जनता हित में कुछ ऐसे समझदारी वाले फ़ैसले लें जिससे उनका कुछ भला हो सके। लेकिन इनकी सोच अभी, पंखा चलाना बंद कर दो, मूर्तियों को ढक दो और कमल के तलाबों को छुपा दो जैसी माँगों से ऊपर ही नहीं उठ सकी है।

लोकसभा चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ ही चुनावी दंगल चालू हो चुका है। इस चुनावी दंगल में एक ऐसी अजीबोगरीब माँग की गई है जिसमें हँसी आना तो लाज़मी है ही साथ ही ऐसी माँग करने वाले की मानसिकता भी स्पष्ट होती है। चलिए आपको बताते हैं कि आख़िर इस हँसी की असल वजह क्या है।

दरअसल, चुनाव आयोग के पास राजनीतिक पार्टियों की एक के बाद एक कई शिक़ायतें पहुँच रही हैं इसमें एक शिक़ायत यह की गई है कि सभी सरकारी दफ़्तरों से छत वाले पंखे हटवा दिए जाएँ क्योंकि इससे चुनाव प्रचार होने की संभावना है। बता दें कि छत वाला पंखा YSRC पार्टी का चुनाव चिह्न है और यदि चुनावी दौर में छत वाले पंखे चलेंगे तो उससे आचार संहिता का उल्लंघन होगा।

चुनाव आयोग में यह अजीबोगरीब शिक़ायत आंध्र प्रदेश में चित्तूर ज़िले से की गई है जहाँ रामाकुप्पम मंडल में तेलगू देशम पार्टी (TDP) के एक प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि हर सरकारी दफ़्तर से जल्द से जल्द छत वाले पंखे हटवाए जाएँ।

TDP द्वारा की गई इस शिक़ायत के बाद तहसीलदार जनार्दन रेड्डी ने ज़िला प्रशासन को रिपोर्ट भेजकर शिक़ायत पर उचित फैसला लेने को कहा। चुनाव आयोग इस पर क्या फ़ैसला लेगा यह देखना बाक़ी है, फ़िलहाल इसका तो केवल इंतज़ार ही किया जा सकता है।

अगर राजनीतिक पार्टियों की इस तरह की मूर्खतापूर्ण माँगों को अगर गंभीरता से लिया जाए तो उसके परिणाम कितने भयंकर हो सकते हैं इसका तो केवल अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है। राजनीतिक पार्टियों को मिले तमाम चुनाव चिह्नों की बात करें तो उनका इस्तेमाल हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जुड़ा हुआ है। उदाहरण के लिए उगता हुआ सूरज, हाथ, साईकिल, हंसिया, हथौड़ा, बाली, झाड़ू, लालटेन, घड़ी, शंख और छत का पंखा इत्यादि तमाम ऐसे चिह्न हैं जिनका हम दैनिक रूप से इस्तेमाल करते हैं। इन चीज़ों के इस्तेमाल पर रोक लगाने की माँग अगर उठती है तो ये किसी चुटकुले से अधिक और कुछ नहीं हो सकता।

इससे पहले भी चुनाव आयोग के समक्ष ऐसी शिक़ायतें आई थीं जिन पर चुनाव आयोग ने गंभीरता से निर्देश जारी किया था। साल 2012 उत्तर प्रदेश में आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू होने के मद्देनजर राजधानी लखनऊ तथा गौतमबुद्ध नगर में जगह-जगह लगी तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती और उनकी पार्टी के चुनाव चिह्न हाथी की मूर्तियों को ढकने का निर्देश जारी किया गया था, जिसपर काफी राजनीति भी गरमाई थी।

साल 2013 में कॉन्ग्रेस ने भी ऐसी ही अनोखी माँग चुनाव आयोग से की थी कि चुनावी दौर में खिले हुए कमल के तालाबों को ढका जाए क्योंकि कमल बीजेपी का चुनाव चिह्न है और इससे प्रचार होने की संभावना है। प्रचार होने की संभावना से आचार संहिता का उल्लंघन होता है।

ऐसा ही एक मामला तब सामने आया था जब तेलंगाना में विधानसभा चुनाव के दौरान इस्तेमाल किए जाने वाले गुलाबी बैलेट पेपर को लेकर विवाद हो गया था। दरअसल, कॉन्ग्रेस पार्टी ने गुलाबी रंग के बैलट पेपर के इस्तेमाल पर आपत्ति उठाई थी और उसकी वजह ये बताई थी कि तेलंगाना राष्ट्रीय समिति पार्टी का चुनाव चिह्न गुलाबी रंग का है। तेलंगाना राष्ट्रीय समिति अपनी सभी प्रचार सामग्री गुलाबी रंग का इस्तेमाल करती है। टीआरएस प्रमुख के चंद्रशेखर राव सहित तेलंगाना राष्ट्रीय समिति के सभी नेता गले में गुलाबी रंग का स्कार्फ़ पहनते हैं। गुलाबी रंग के इस्तेमाल से आचार संहिता का उल्लंघन हो जाता इसलिए कॉन्ग्रेस ने चुनाव आयोग से इसके इस्तेमाल पर रोक लगाने की माँग उठाई गई।

वर्तमान समय में चुनावी माहौल के इस महासंग्राम में राजनीतिक पार्टियाँ पता नहीं कब किस चुनाव चिह्न को मोहरा बनाकर आम जन-जीवन अस्त-व्यस्त कर दें इस पर कुछ कहा नहीं जा सकता। इस तरह की माँग राजनीतिक पार्टियों और उनके नेताओं की बचकानी सोच को उजागर करता है जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि भले ही इन्हें भोली-भाली जनता अपना प्रतिनिधि चुनकर सत्ता के आसन पर बैठा दे लेकिन इनकी सोच जस की तस ही रहती है। जबकि जनता के इन नुमाइंदों से ये उम्मीद की जाती है कि ये जनता हित में कुछ ऐसे समझदारी वाले फ़ैसले लें जिससे उनका कुछ भला हो सके। लेकिन अफ़सोस होता है कि इनकी सोच अभी, पंखा चलाना बंद कर दो, मूर्तियों को ढक दो, गुलाबी रंग की पर्चियों के इस्तेमाल को रोक दो और कमल के तालाबों को छुपा दो जैसी माँगों से ऊपर ही नहीं उठ सकी।

अनायास ही एक सवाल मन में घर करता है कि ऐसी बेहूदी माँगों पर चुनाव आयोग का कितना समय नष्ट होता होगा, ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए न जाने कितने स्तरों पर विचार किया जाता होगा? इन परिस्थितियों में तो सिर्फ़ सलाह ही दी जा सकती है जिसपर अमल करना बेहद ज़रूरी है, वो ये कि जितना दिमाग इस तरह की माँगों पर लगाया जाता है, बेहतर होता कि उतना दिमाग जनता के हित पर लगाया होता तो लाइमलाइट में आने के लिए इन बेकार की हरक़तों का रुख़ न करना पड़ता।

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